प्रदूषण का असर : नवंबर महीने में भी नहीं है ठंड का असर
Updated at : 06 Nov 2019 8:16 AM (IST)
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सहरसा : साल में तीन-तीन महीने की चार ऋतुओं के होने की बात अब काफी पुरानी हो गई है. वसंत, गर्मी, बरसात और ठंड में से वसंत और ठंड का महीना गायब ही होता जा रहा है. बरसात अपने मूल समय से बिल्कुल भटक चुका है. गर्मी के महीने का लगातार प्रसार होता जा रहा […]
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सहरसा : साल में तीन-तीन महीने की चार ऋतुओं के होने की बात अब काफी पुरानी हो गई है. वसंत, गर्मी, बरसात और ठंड में से वसंत और ठंड का महीना गायब ही होता जा रहा है. बरसात अपने मूल समय से बिल्कुल भटक चुका है.
गर्मी के महीने का लगातार प्रसार होता जा रहा है. अमूमन कार्तिक माह के शुरुआत से मौसम करवट लेना शुरू कर देता था. अमावस्या यानी दीपावली के बाद पूर्ण रूप से ठंड का प्रवेश हो जाता था. लोग स्वेटर, कंबल और रजाई का उपयोग शुरू कर देते थे. लेकिन अब तक कार्तिक अपने आखिरी समय की ओर बढ़ रहा है, तब भी ठंड का नहीं आना चिंताजनक है.
बज चुकी है खतरे की घंटी: मौसम में यह बदलाव प्रकृति के लिए ठीक नहीं है और जब प्रकृति के लिए ठीक नहीं है तो, मनुष्य सहित किसी भी सजीव के लिए ठीक नहीं है. इसका मुख्य कारण प्रदूषण का लगातार बढ़ना है. प्रदूषण के कारण ही ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ती जा रही है.
वायुमंडल इतना जहरीला हो चुका है कि जिस एयर क्वालिटी इंडेक्स को 50 के नीचे रहना चाहिए, वह न्यूनतम 160 और अधिकतम 500 तक है. भारत के किसी भी शहर का एक्यूआई औसत मानक के अनुरूप नहीं है. एयर क्वालिटी इंडेक्स का लगातार बढ़ता अंक खतरे की घंटी बजा चुका है.
शिकागो यूनिवर्सिटी और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने भी यह चेतावनी दे ही दी है कि प्रदूषण के कारण लोगों की उम्र औसतन सात वर्ष तक कम हो रही है. इसके अलावे वे इस कम उम्र में भी असमय और विभिन्न बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं. इन बीमारियों में कई जानलेवा हैं तो कई ताउम्र रहने वाली है.
निजी वाहन और नप भी है जिम्मेदार: स्थिति खतरनाक होने के बाद सुप्रीम कोर्ट सख्त हुआ है तो बिहार सरकार भी गंभीर होती दिख रही है. बिहार सरकार ने 15 साल पुराने सरकारी वाहनों पर प्रतिबंध और खेतों में पुआल जलाने पर पाबंदी तो लगा दी है.
लेकिन वायुमंडल में जहर घोलते पुराने व खराब निजी वाहनों पर कोई एक्शन नहीं लिया है. केंद्र सरकार द्वारा नये वाहन अधिनियम लागू होने के बाद लोग अपने साथ पॉल्यूशन सर्टिफिकेट तो रखने लगे हैं, लेकिन उस पर अंकित प्रदूषण की स्थिति पर कोई ध्यान नहीं देता.
इसी तरह शहर को प्रदूषित करने में सबसे बड़ा जिम्मेवार नगर परिषद है जो घर-घर से कचरे का उठाव कर घनी आबादी के बीच ही फेंकता जा रहा है. नप उन कचरों में आग लगा वायुमंडल में लगातार जहर घोल रहा है. लेकिन कचरा निस्तारण का कोई स्थायी समाधान नहीं कर रहा.
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