हर बार मिला सिर्फ दिलासा कभी पूरी नहीं हुई आशा
Updated at : 13 Mar 2019 8:26 AM (IST)
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वारिसलीगंज : वर्ष 1993 से ही बंद पड़ा वारिसलीगंज चीनी मिल अब चुनावी वायदों में बदलता जा रहा है. करीब ढाई दशक से हर लोकसभा व विधानसभा का चुनावों में यह एक मुद्दा बनता आ रहा है. तमाम हारे व जीते प्रत्याशी वारिसलीगंज चीनी मिल को फिर से चालू कराने व वारिसलीगंज को अनुमंडल बनाने […]
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वारिसलीगंज : वर्ष 1993 से ही बंद पड़ा वारिसलीगंज चीनी मिल अब चुनावी वायदों में बदलता जा रहा है. करीब ढाई दशक से हर लोकसभा व विधानसभा का चुनावों में यह एक मुद्दा बनता आ रहा है. तमाम हारे व जीते प्रत्याशी वारिसलीगंज चीनी मिल को फिर से चालू कराने व वारिसलीगंज को अनुमंडल बनाने जैसे पुरानी मांगों को पूरा करने का दिलासा दिलाते रहे हैं.
परंतु ना तो चीनी मिल खुली और ना ही अनुमंडल का दर्जा मिल पाया. अब तो क्षेत्रीय लोगों ने इन दोनों मांगों की चर्चा करना भी बंद कर दिया है. प्रदेश के कद्दावर नेता रहे दिवंगत विधायक रामाश्रय प्रसाद सिंह इस वादे को पूरा करने में सफल नहीं हो पाये. चार-चार बार विधायक रहे स्थानीय दिवंगत नेता देवनंदन प्रसाद, दो बार विधायक रहे प्रदीप कुमार भी इस ज्वलंत समस्या का निबटारा नहीं करा सके.
नजरों से भी रहा ओझल
बिहार के चौमुखी विकास की नींव रखनेवाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नजरों से भी वारिसलीगंज चीनी मिल ओझल होते रहा है. सबसे दुखद तो यह है कि नालंदा व नवादा की सीमा पर रहे वारिसलीगंज क्षेत्र की महज एक भी समस्या का निबटारा नहीं हो सका, जबकि पड़ोसी जिला नालंदा में विकास की गंगा बहा दी गयी.
चुनावी वर्ष 2010 में माफीगढ़ स्थित एक सभा के दौरान अपने संबोधन में आमजनों ने नारेबाजी कर चीनी मिल चालू कराने की मांग की थी. लेकिन हामी भरने के बाद भी सीएम ने इसकी सुध नहीं ली.
मांगें हो गयीं गुम
लगातार चीनी मिल चालू कराने की मांग करनेवाली वारिसलीगंज की जनता अब किसी भी पार्टी के कद्दावर नेता या जनप्रतिनिधि से क्षेत्र की समस्या रखने में उत्साहित नहीं दिख रहे हैं चूंकि लगातार प्रयास के बाद ही इनकी समस्या जड़वत बनी हुई है. वादे हैं वादों का क्या की तर्ज पर वोट लेनेवाले नेताओं से विश्वास उठ चुका है. ऐसी स्थिति में है अब पता चल गया है कि मृतप्राय हो चुकी चीनी मिल को अब संजीवनी देनेवाला कोई नहीं है.
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