Research: डॉ राजेंद्र प्रसाद कृषि विवि ने किया शोध, मशरूम के अवशेष दोगुनी बढ़ेगी किसानों की उपज

Updated at : 20 Sep 2022 5:57 AM (IST)
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Research: डॉ राजेंद्र प्रसाद कृषि विवि ने किया शोध, मशरूम के अवशेष दोगुनी बढ़ेगी किसानों की उपज

किसानों को धान व गेहूं की खेती के साथ मशरूम का उत्पादन दोहरा मुनाफा देगा. कृषि अवशेष का उपयोग मशरूम उत्पादन में करने के लिए अब तक किसानों को प्रेरित किया जाता रहा है. लेकिन, अब मशरूम के अवशेष का उपयोग धान व गेहूं की खेती में करके किसान बड़ी बचत कर सकते हैं.

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किसानों को धान व गेहूं की खेती के साथ मशरूम का उत्पादन दोहरा मुनाफा देगा. कृषि अवशेष का उपयोग मशरूम उत्पादन में करने के लिए अब तक किसानों को प्रेरित किया जाता रहा है. लेकिन, अब मशरूम के अवशेष का उपयोग धान व गेहूं की खेती में करके किसान बड़ी बचत कर सकते हैं. साथ ही खेत की उर्वरा शक्ति भी क्षीण नहीं होगी, क्योंकि उसमें किसी तरह के केमिकल के प्रयोग की जरूरत नहीं होगी.

डा‍ॅ राजेेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के सहयोग से मुजफ्फरपुर के कमतौल निवासी किसान नृपेंद्र शाही ने किसानों को दोहरे बचत की राह दिखायी है. विश्वविद्यालय के एडवांस सेंटर ऑफ मशरूम रिसर्च के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ दयाराम ने बताया कि धान व गेहूं का अवशेष किसान जला देते थे, जिससे पर्यावरण को भी नुकसान होता था. अब उसका उपयोग मशरूम उत्पादन में हो रहा है. वहीं, एक अवधि के बाद मशरूम का प्रोडक्शन बंद हो जाता है, तो उसका अवशेष फेंक दिया जाता है. उसमें मिट्टी के लिए तमाम पोषक तत्व होते हैं. उसका उपयोग खेती में उर्वरक के रूप में करके किसान उर्वरक व रसायनों का खर्च बचा सकते हैं.

चार साल के परिश्रम के बाद बदली खेत की रंगत

कमतौल के रहने वाले किसान नृपेंद्र शाही ने बताया कि चार साल के परिश्रम के बाद खेत की रंगत बदली है. करीब 35 एकड़ में धान की खेती करने वाले शाही ने पांच एकड़ खेत में मशरूम का अवशेष उर्वरक के रूप में प्रयोग किया. बताते हैं कि तीन साल तक कोई रिजल्ट नहीं आया, तो भी निराश नहीं हुए. लेकिन, इस साल धान की फसल लहलहा रही है. जिन खेतों में उर्वरक का प्रयोग किये हैं, उनसे अच्छी पैदावार की उम्मीद मशरूम के अवशेष वाले खेत से है.

ऐसे समझें मुनाफे का गणित

धान या गेहूं की खेती के बाद एक बीघा खेत से करीब 60 क्विंटल वेस्टेज निकलता है. इससे बटन मशरूम के लिए खाद तैयार करने पर करीब 45 क्विंटल उत्पादन मिलता है. इसकी कीमत थोक बाजार में करीब साढ़े सात लाख रुपये होगी, जबकि खर्च एक से डेढ़ लाख रुपये आता है. वहीं, मशरूम प्रोडक्शन बंद होने के बाद उसके वेस्टेज का उपयोग खेत में उर्वरक के रूप में करने से उर्वरक व रसायन का खर्च भी बच जाता है.

बर्बाद हो जाता है सैकड़ों टन अवशेष

मशरूम प्रोडक्शन में बिहार देशभर में तीसरे स्थान पर है. मुजफ्फरपुर सहित अन्य जिलों में पांच दर्जन से अधिक इकाइयां काम कर रही हैं. मशरूम उत्पादन करने वाले अधिकतर लोग ऐसे हैं, जिनके पास खेत नहीं है. वे विकल्प के रूप में मशरूम की खेती करते हैं. ऐसे में इन इकाइयों से निकलने वाला सैकड़ों टन अवशेष बर्बाद हो जाता है.

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