बदलते दौर में बदल रही है पुराने ‘पुरणिया’ की तस्वीर

बैलगाड़ी से रेलगाड़ी और फिर उड़नखटोला तक का सफर आखिर पूर्णिया ने तय कर लिया. इस सफर में पूर्णिया को कई उतार-चढ़ाव झेलने पड़े.
बैलगाड़ी से उड़नखटोला तक का सफरअखिलेश चंद्रा, पूर्णिया. बैलगाड़ी से रेलगाड़ी और फिर उड़नखटोला तक का सफर आखिर पूर्णिया ने तय कर लिया. इस सफर में पूर्णिया को कई उतार-चढ़ाव झेलने पड़े. इस दौरान पूर्णिया ने अगर बहुत कुछ खोया तो इससे अधिक पाया भी है. याद कीजिये कि उस जमाने में आवागमन का जरिया लकड़ी की बैलगाड़ी ही थी, मगर आज अपने शहर ने आसमान की ऊंचाइयों को छू लिया है. कभी बैलगाड़ी पर चलने वाला पूर्णिया पहले तो रिंच व सीरींज वाला शहर बना, फिर आज हवाई जहाज में सफर करने लगा. बैलगाड़ी से हवाई जहाज तक का यह सफर सही मायने में नये दौर और बदलते पूर्णिया की एक झलक है. वक्त चाहे जो लग गया पर आज पूर्णिया के लोग इसे सपनों का शहर बनाने में जुट गये हैं. आज यहां से देश के महानगरों के लिए बस और रेलगाड़ियां ही नहीं हवाई जहाज भी उड़ने लगे हैं. बदलते दौर में पुराने ‘पुरणिया’ की तस्वीर बदल गयी है और आज एक विकसित पूर्णिया सामने खड़ा है. जहां महानगर की संस्कृति पनप रही है. अलबत्ता, पूर्णिया में अभी भी विकास की असीम संभावनाएं हैं. पिछले दो दशकों में आबादी बढ़ी है और मुहल्ले भी विकसित हुए हैं पर महानगरों की तरह घनी आबादी अभी नहीं बसी है. यह अलग बात है कि गांवों से निकल लोग शहर में बस रहे हैं. समझा जाता है कि आने वाले दस सालों के बाद पूर्णिया की तस्वीर अलग होगी.
कभी ‘कालापानी’ कहा जाता था
यह वही पूर्णिया है जिसे कभी ‘कालापानी’ कहा जाता था-यानी मौत का घर. कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है. चूंकि उस जमाने में मलेरिया जैसे रोग का आतंक था जिसके इलाज के लिए ‘सीरींज’ यानी डाक्टरों का यह बसेरा बना. कालांतर में शहर का लाइन बाजार मेडिकल हब के रूप में विकसित हुआ. जहां बड़ी संख्या में निजी अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर, नर्सिंग होम और दवा की दुकानें हैं. अब तो इसी लाइन बाजार में मेडिकल कालेज भी हो गया है. बदलते दौर में अंतरराज्यीय व अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे होने के कारण सड़क परिवहन का अप्रत्याशित विकास हुआ. आज यहां कृषि उपकरणों, गाड़ियों की मरम्मत और स्पेयर पार्ट्स का बड़ा बाजार विकसित है जो इसे रिंच वाले शहर का नाम दे गया. कालांतर में सकरी सड़कें चौड़ी फोरलेन सड़कों में बदल गईं, रात की चमक-दमक शहर को महानगर का लुक देने लगीं, मल्टीनेशनल कंपनियों ने अपने ब्रांड के शोरूम खोल लिए और एयरपोर्ट भी बन गया पर पूर्णिया की चाहत यहीं पूरी नहीं हुई.हवाई सेवा शुरू होने से बढ़ी नयी संभावनाएं
दरअसल, हवाई सेवा शुरू होने से पूर्णिया का इन्फ्रास्ट्रक्चर बदला है तो नयी संभावनाएं भी बढ़ी हैं. हालिया सालों में यहां मखाना उत्पादन की नवीनतम तकनीक विकसित की गयी है जिसके जरिये मखाना के एक नये उद्योग को बढ़ावा मिला है. अब इस उद्योग को वृहत रूप देने के लिए मखाना बोर्ड और कृषि अनुसंधान केंद्र की स्थापना की जरूरत महसूस की जा रही है. आयात-निर्यात के लिए विदेशों की सीधी उड़ान पूर्णिया की चाहत है. कृषि यहां का आधार स्तंभ है. मक्का और मखाना के साथ जूट इस इलाके का ‘कैश क्रॉप है और इस दृष्टि से कृषि आधारित उद्योग पूर्णिया के पूर्ण विकास के सपनों को नया आयाम दे सकता है.
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