27 साल से पत्नी की अस्थियों को सहेज कर रखने वाले बुजुर्ग पति की चाहत जानकर हैरान रह जायेंगे आप
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 02 Sep 2019 8:23 PM
पूर्णिया: पर्व चाहे वट सावित्री का हो या फिर तीज का अमूमन हर महिला अपने पति के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम का इजहार करती हैं. हालांकि, पति भी ऐसी ही भावनाएं रखते हैं पर ऐसा बहुत कम सुनने को मिलता है कि पति ने भी अपनी पत्नी के प्रति श्रद्धा और प्रेम का इजहार […]
पूर्णिया: पर्व चाहे वट सावित्री का हो या फिर तीज का अमूमन हर महिला अपने पति के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम का इजहार करती हैं. हालांकि, पति भी ऐसी ही भावनाएं रखते हैं पर ऐसा बहुत कम सुनने को मिलता है कि पति ने भी अपनी पत्नी के प्रति श्रद्धा और प्रेम का इजहार किया हो. मगर, पूर्णिया में एक ऐसे बुजुर्ग हैं जिनकी पत्नी नहीं हैं पर वे अंतिम सांसें भी पत्नी के साथ ही लेना चाहते हैं. वे पिछले 27 सालों से पत्नी की अस्थियों को इसी चाहत के लिए सहेज कर रखे हुए हैं. चाहत सिर्फ इतनी है कि जीवन की अंतिम यात्रा में पत्नी की अस्थियां उनके कलेजे से सटी रहें.
जी हां, वे बुजुर्ग हैं कवि, साहित्यकार भोला नाथ आलोक जिन्हें लोग पूर्णिया के अन्ना के रुप में भी जानते हैं पर बहुत कम लोगों को पता है कि पूर्णिया के आवाम अवाम के सुख-दुख में हमदर्द बनने वाले भोलानाथ आलोक के सीने में भी एक दर्द दफन है. वह दर्द है पत्नी की असमय मृत्यु का जिसके प्रति उनका प्यार आज भी आंसुओं के रुप में छलक पड़ता है.
सन् 1947 में उनकी शादी तब हुई थी जब देश आजाद हुआ था. तब उनकी उम्र काफी कम थी पर पद्मा रानी से परिणय सूत्र में बंधने के बाद साथ जीने साथ मरने के वायदे एक दूसरे से किए थे. पत्नी पद्मा पूजा-पाठ में काफी विश्वास रखती थीं. जिंदगी बड़ी संजीदगी से कट रही थी. भरा पूरा परिवार था. घर में खुशहाली भी थी. करीब 27 साल पहले पत्नी बीमार हुईं. इलाज और दवा में कोई कमी नहीं हुई पर कहते हैं, पर होनी को टालना संभव नहीं था. इसी बीमारी में वे चल बसी. श्री अलोक पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. बच्चों के लालन-पालन की जिम्मेवारी अचानक बढ़ गई पर इससे वे कभी पीछे नहीं हटे. अपनी जिम्मेवारियों का निष्ठा से निर्वाह किया.
अपने जीवन की बानगी बयां करते-करते श्री आलोक सिसक पड़ते हैं. वे कहते हैं कि पत्नी के साथ छोड़ जाने का गम वे नहीं भूल पाये. उनकी यादें साथ रहें और साथ जीने साथ मरने के वायदे याद रहें, यह सोच कर उनकी अस्थियों की राख को अंत्येष्टि के तुरंत बाद कलश में समेट लिया था. उन अस्थियों की राख को उन्होंने आज तक अपने कैम्पस में आम के पेड़ पर सहेज कर रखा है. बच्चों और परिवार के सभी सदस्यों को यह कह रखा है कि जब उन्हें मौत आए तो यह अस्थिकलश भी उनके कलेजे से सटा हुआ अंतिम यात्रा में जाए. रुंघे हुए स्वर में श्री आलोक कहते हैं कि साथ भले ही नहीं जी सका पर साथ मरने का सुकून तो जरूर मिलेगा.
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