डेंगू का कहर : कहीं फिर से कालापानी तो नहीं बनने जा रहा पूर्णिया

By Prabhat Khabar Digital Desk
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पूर्णिया : जहर खाओ न माहुर खाओ, मरना है तो पूर्णिया जाओ. वर्ष 1955 में तत्कालीन मद्रास में आयोजित स्वास्थ्य सेमिनार में कुछ इस अंदाज में पूर्णिया को दुनिया के सामने पेश किया गया. उस वक्त तक मलेरिया के साए में पूर्णिया का जनजीवन था. यही वजह थी कि पूर्णिया को कालापानी कहा जाता था जहां सेहत को सही सलामत रखने के लिए जद्दोजहद थी. कालांतर में मलेरिया के उन्मूलन के बाद पूर्णिया क्षेत्र में आबादी का विकास हुआ.

मगर इस साल जिस तरह से डेंगू ने पांव पसारा है, उससे यही आशंका है कि 60 साल के अंतराल के बाद मलेरिया की जगह डेंगू ले लेगा. इस वक्त जिले के सभी 14 प्रखंड को डेंगू का डंक लग चुका है. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की ओर से लगातार जागरूक किया जा रहा है कि साफ-सफाई समेत ऐसे हालात कायम करें जिससे डेंगू रोग के वाहक मच्छर को पनपने का ही मौका नहीं मिले.
इस संबंध में सिविल सर्जन डॉ. मधुसूदन प्रसाद बताते हैं कि डेंगू रोग फैलने का कारण उसके वाहक मच्छर का मौजूद होना है. डेंगू को टालने के लिए खासतौर से साफ-सफाई पर ध्यान देने की जरूरत है. जबकि प्रभावित इलाकों में लोग मच्छरदानी समेत स्वास्थ्य विभाग की ओर से दिये गये मार्गदर्शन का पालन करें. सदर अस्पताल का संक्रामक वार्ड फिलहाल डेंगू के मरीजों से फुल है. सोमवार को दोपहर तक 8 मरीजों का उपचार डेंगू वार्ड में चल रहा था.
वार्ड के बरामदे पर भी मच्छरदानी के अंदर मरीजों को देखा जा रहा था. पिछले 48 घंटे में जिले के अमारी कुकरौन धमदाहा की भारती कुमारी, रानीपतरा के मो़ मेहरबान, भवानीपुर के बबलू मंडल व कामिनी कुमारी, खुश्कीबाग की नैना कुमारी, सहरसा के शिवा पासवान और कटिहार के मसूद आलम में डेंगू के लक्षण पाए जाने के बाद उन्हें भर्ती किया गया.
जिले में 100 पहुंच गया मरीजों का आंकड़ा
इस साल डेंगू ने जिले में भयावह स्थिति पैदा कर दी है. अभी तक डेंगू के मामले सामने आ रहे हैं. भर्ती मरीजों की अगर बात करें तो यह आंकड़ा 100 पर पहुंच गया है. अभी तक इनमें से एक-चौथाई से अधिक मरीजों की एलीजा टेस्ट रिपोर्ट भी आ चुकी है जिसमें डेंगू की पुष्टि हो गई है.
पहली बार पूर्णिया जिले में डेंगू के मरीज इतने अधिक तादाद में मिले हैं. इससे पहले बड़े शहरों में बीमार होने के बाद पूर्णिया लौटने पर मरीज भर्ती होते थे. एक-दो साल ऐसा जरूर हुआ कि आधा दर्जन से एक दर्जन मरीजों के बारे में स्थानीय स्तर पर बीमार होने का पता चला. इस बार तो लगता है कि हम पूरी तरह से डेंगू की जद में आ गये हैं.
बचाव के उपाय
  • घर या ऑफिस के आसपास पानी जमा न होने दें, गड्ढों को मिट्टी से भर दें, रुकी हुई नालियों को साफ करें
  • अगर पानी जमा होने से रोकना मुमकिन नहीं है तो उसमें पेट्रोल या केरोसिन ऑयल डालें
  • रूम कूलरों, फूलदानों का सारा पानी हफ्ते में एक बार बदल दें
  • पक्षियों को दाना-पानी देने के बर्तन को रोज पूरी तरह से खाली करें, उन्हें सुखाएं और फिर भरें
  • डेंगू के मच्छर साफ पानी में पनपते हैं, इसलिए पानी की टंकी को अच्छी तरह बंद करके रखें
  • अगर मुमकिन हो तो खिड़कियों और दरवाजों पर महीन जाली लगवाकर मच्छरों को घर में आने से रोकें
  • ऐसे कपड़े पहनें, जिससे शरीर का ज्यादा-से-ज्यादा हिस्सा ढका रहे. खासकर बच्चों के लिए यह सावधानी बहुत जरूरी है.
  • रात को सोते समय मच्छरदानी लगाएं
लक्षण
  • तेज़ बुखार: डेंगू में 102-103 डिग्री तक बुखार आना आम बात है
  • बदन टूटना: डेंगू में ज़्यादातर जोड़ों, मांसपेशियों और हड्डियों में दर्द होता है
  • जी मिचलाना: यह भी एक लक्षण है. घबराहट महसूस होती है.
  • चकत्ते या रैशेस: डेंगू में छोटे लाल चकत्ते या रैशेस हो जाते है. इन रैशेस में कभी कभी खुजली भी होती है.
  • आंख के पीछे दर्द: ज्यादातर डेंगू से पीड़ित लोग आंख के पीछे दर्द
भवानीपुर प्रखंड डेंगू से सर्वाधिक प्रभावित
जिले का भवानीपुर प्रखंड डेंगू से इस वक्त सर्वाधिक प्रभावित है. डेंगू रोग का लक्षण पाए जाने के बाद भवानीपुर के एक हार्डवेयर व्यवसायी को निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां पिछले हफ्ते उसकी मौत हो गयी. उसके बाद से प्रखंडवासियों में काफी भय का माहौल है. सिविल सर्जन डॉ. मधुसूदन प्रसाद भी मानते हैं कि भवानीपुर प्रखंड में डेंगू का सर्वाधिक प्रकोप है. उन्होंने बताया कि प्रभावित इलाकों में फॉगिंग करायी जा रही है.
उपचार की अवधि
एलीजा जांच से बीमारी की गंभीरता का पता चलता है. इसमें आपके रक्त की जांच होती है जिससे प्लेटलेट्स काउंट और ऐसे ही कई मापदंडों पता चलता है. टेस्ट के मुताबिक और डॉक्टर के सुझाव अनुसार डेंगू का उपचार घर पर या हॉस्पिटल में हो सकता है. दातर लोग घर पर ही सही आराम, अधिक से अधिक जल सेवन से और डॉक्टर द्वारा बतायी गयी दवाओं से ही ठीक हो जाते हैं. यह अवधि सामान्य तौर पर 7 से 10 दिन की होती है.
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