सम्राट चौधरी के सर ‘कांटों का ताज’, केवल ‘3C’ नहीं! इन्हें कैसे साधेंगे मुख्यमंत्री बिहार?

सम्राट चौधरी, मुख्यमंत्री बिहार. AI जनित तस्वीर
Samrat Choudhary : बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने '3C' को लेकर बड़ी चुनौती है. साथ ही उन राजनीतिक समीकरणों को भी साधने की चुनौती है, जो बीजेपी, जेडीयू और संघ के नीतिगत एजेंडों में शामिल है.
Samrat Choudhary : सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. इसके साथ ही अब चुनौतियों का असली खेल शुरू हो गया है. उनके सामने केवल पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विकास मॉडल की लकीर नहीं बल्कि ‘3C’ मॉडल वाली चुनौती भी है. सम्राट चौधरी के कंधे पर इससे भी बड़ी जिम्मेदारी ‘परिवर्तन काल’ को पहचान देने की है. वर्ना यह ‘परिवर्तन काल’ केवल ‘पावर शिफ्ट’ बनकर रह जाएगा.
Corruption : सिस्टम में गहराई तक जड़ें
पूर्व मुख्यमंत्री Nitish Kumar ने 20 साल जबरदस्त काम किए. बिहार का विकास भी किया. लेकिन इस दौरान उनके शासनकाल की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि यहां बेलगाम भ्रष्टाचार देखने को मिला. नतीजा ये रहा कि बिहार में जमीनों के रेट दिल्ली जैसे महानगरों से ज्यादा हैं. वहीं, दूसरी ओर जमीनों की खरीद फरोख्त मनमाने ढंग से की जा रही है. इधर, हाल के वर्षों में निगरानी एजेंसियों और छापेमारी में जो संपत्ति के जो खुलासे हुए हैं, उन्होंने प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. सरकारी कर्मचारियों बेतहाशा संपत्ति के खुलासे इस बात के प्रमाण हैं.
भ्रष्ट सिस्टम से जनता परेशान
एक तरफ अधिकारियों का भ्रष्टाचार तो वहीं, हर सरकारी दफ्तर में भ्रष्ट कार्य प्रणाली ने नीतीश कुमार की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है. बिहार की राजनीति को समझने वालों का मानना है कि नीतीश कुमार का विकल्प न होना बहुमत की एक बड़ी वजह है. वर्ना जनता भ्रष्टाचार से परेशान है. रमाकंत चंदन बताते हैं कि बिहार में कदम-कदम पर भ्रष्टाचार है. भ्रष्ट अधिकारियों से बहुत परेशान है. भ्रष्टाचारियों से नाराज जनता सीधे सरकार को दोषी मानती थी. ऐसे में सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकारी विभाग में हर कदम पर फैले भ्रष्टाचार, बाबूगिरी और अफसरशाही को समाप्त करना होगा.
सिस्टम तोड़ने की चुनौती
बिहार निगरानी विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई में लगातार बड़े केस सामने आए. इस दौरान ये पाया गया है साल 2023-25 के बीच डिसप्रोपोर्शनट एसेट (DA) केस में दर्ज मामलों की संख्या में विभागीय रिपोर्ट्स के अनुसार बढ़ोतरी हुई है. ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर टेंडर सिस्टम तक, सब में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में सम्राट चौधरी के सामने चुनौती सिर्फ कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि उस ‘सिस्टम’ को तोड़ने की है, जो सालों से बना हुआ है.
Crime : आंकड़े और सख्ती
बिहार में अपराध का मुद्दा हमेशा हमेशा से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, हत्या, लूट और अपहरण जैसे मामलों में बिहार शीर्ष राज्यों में बना हुआ है. ये अलग बात है कि साल दर साल इसमें कमी जरूर आ रही है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जनसंख्या के आधार पर बिहार में आपराधिक ग्राफ कम है लेकिन अक्सर ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, जो Bihar Crime और Law And Order सवाल खड़े कर देता है. इनमें पटना में NEET Student की मौत मामला अब तक साफ नहीं हो सका है. खगड़िया में सिर काटने वाले अपराधी की भीड़ ने हत्या कर दी. वहीं, अभी कल ही पटना के बिहटा में नाबालिग से रेप के बाद हत्या और पोस्टमार्टम में पुष्टी का न होना सवालों के घेरे में है.
पुलिस और सरकार का डर दिखाना जरूरी!
नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने खुद को मजबूत मुख्यमंत्री साबित करने की चुनौती होगी. रमाकांत चंदन बताते हैं कि लगातार इस तरह की घटनाएं पुलिस और सरकार पर सवाल उठातीं हैं. ऐसे में जरूरी है कि अपराधियों में पुलिस का डर हो. ताकि अपराधियों के मन में ये संदेश साफ हो कि वो गलत कर बच नहीं सकते हैं. हालिया घटनाएं विपक्ष को बोलने का मौका देती हैं जो बिहार में फेल ‘लॉ एंड ऑर्डर फेल’ के नैरेटिव को सेट करती हैं.
Communalism : सबसे संवेदनशील तीसरा ‘C’
तीसरा ‘C’ यानी कम्युनलिज्म ये बिहार ही ने पूरे देश में सबसे संवेदनशील मामला है. इसी को लेकर पूरे देश में राजनीति नेरेटिव सेट किए जाते हैं. जो सबसे जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामला है. बिहार में पिछले कुछ वर्षों में छिटपुट सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं सामने आईं हैं. लेकिन बीजेपी के लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं होने वाली है.
‘C’ के साथ ‘समीकरण’ भी
महत्वपूर्ण बात ये है कि नीतीश कुमार इसे राजनीतिक रूप से इफ्तार पार्टी और टोपी के जरिए साधने में सफल रहे हैं. मगर, सम्राट चौधरी के हाथ में तीन धारी तलवार होगी. यानी इसकी मूठ में भी धार है. उन्हें एक तरफ साम्प्रदायिक सौहार्द्र कायम रखना होगा. वहीं, दूसरी ओर संघ और बीजेपी को भी संतुष्ट रखना होगा. तीसरी तरफ जेडीयू के सत्ता समीकरण को भी साधना बड़ी चुनौती होगी.
इन्हें कैसे साधेंगे सम्राट?
सम्राट चौधरी के लिए बीजेपी के ‘हिंदुत्व बनाम विकास’ के बीच संतुलन स्थापित करना भी चुनौती से कम नहीं होने वाला. ऐसे में दूसरी ओर जरा सा झुकाव भी गठबंधन और समीकरण को प्रभावित कर सकता है. सरकार में नीतीश कुमार के 84 विधायक हैं. जो अहम भूमिका निभा रहे हैं. ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि सम्राट इसे कैसे साधते हैं.
‘बुलडोजर मॉडल’ बनाम ‘बिहार मॉडल’
बिहार के डिप्टी सीएम बनने के बाद सम्राट चौधरी का बुलडोजर एक्शन देखने को मिला था. अब वो मुख्यमंत्री हैं. इस बुल्डोजर ने सम्राट चौधरी की छवि को आक्रामक बनाया है. वहीं, अब देखने वाली बात ये होगी कि अब बिहार में बुल्डोजर एक्शन कैसा दिखाई देता है. पिछली बार ये एक्शन अवैध निर्माण पर दिखा था. अब ये बुल्डोजर दिल्ली, असम और उत्तर प्रदेश की तरह सीमावर्ती इलाकों के अवैध निर्माण पर भी नजर आता है? बड़ा सवाल ये है कि क्या बिहार ‘बुलडोजर मॉडल’ को अपनाता है या ‘नीतीश मॉडल’ की प्रशासनिक स्थिरता को पसंद करता है?
‘लकीर’ लंबी करने की होगी चुनौती
बिहार के नए सीएम सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो नीतीश कुमार की वो ‘लकीर’ होगी, जिसे वो 2005 से 2026 तक खींचकर लंबा करते आए हैं. उन्होंने बिहार में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो बुनियादी ढांचा खड़ा किया. आज वही ‘बिहार मॉडल’ के रूप में पहचाना जाता है. अब सम्राट चौधरी के सामने दोहरी चुनौती है. एक तरफ उस मॉडल को बनाए रखना, जिसके आधार पर नीतीश ने बिहार का विकास किया. वहीं, दूसरी ओर बीजेपी और संघ की छाप छोड़ना, जिसके जरिए बीजेपी बिहार में ‘सम्राट मॉडल’ के नाम से अपनी नई पहचान कायम कर सके.
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लेखक के बारे में
By Keshav Suman Singh
बिहार-झारखंड और दिल्ली के जाने-पहचाने पत्रकारों में से एक हैं। तीनों विधाओं (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और वेब) में शानदार काम का करीब डेढ़ दशक से ज्यादा का अनुभव है। वर्तमान में प्रभात खबर.कॉम में बतौर डिजिटल हेड बिहार की भूमिका निभा रहे हैं। इससे पहले केशव नवभारतटाइम्स.कॉम बतौर असिसटेंट न्यूज एडिटर (बिहार/झारखंड), रिपब्लिक टीवी में बिहार-झारखंड बतौर हिंदी ब्यूरो पटना रहे। केशव पॉलिटिकल के अलावा बाढ़, दंगे, लाठीचार्ज और कठिन परिस्थितियों में शानदार टीवी प्रेजेंस के लिए जाने जाते हैं। जनसत्ता और दैनिक जागरण दिल्ली में कई पेज के इंचार्ज की भूमिका निभाई। झारखंड में आदिवासी और पर्यावरण रिपोर्टिंग से पहचान बनाई। केशव ने करियर की शुरुआत NDTV पटना से की थी।
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