Patna News : इमारत-ए-शरिया ने पश्चिम बंगाल के हालात और वंदे मातरम की अनिवार्यता पर जताई चिंता, परिपत्र वापस लेने की मांग

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मौलाना सैयद अहमद वली फैसल रहमानी

पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था की स्थिति और वंदे मातरम को अनिवार्य किए जाने पर इमारत-ए-शरिया के अमीर शरीयत मौलाना सैयद अहमद वली फैसल रहमानी ने गहरी चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय पर उसकी आस्था के खिलाफ कोई चीज थोपना संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है.

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Patna News (अजीत) : इमारत-ए-शरिया की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बिहार, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल के अमीर शरीयत मौलाना सैयद अहमद वली फैसल रहमानी ने पश्चिम बंगाल की मौजूदा स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि राज्य में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद से मुसलमानों के जीवन, संपत्ति, मान-समामन और धार्मिक स्थलों पर खतरा बढ़ता जा रहा है. पश्चिम बंगाल में भड़की हिंसा के कारण भाईचारे की जगह नफरत ने ले ली है और आम नागरिक भय के माहौल में जी रहे हैं.

शांति व्यवस्था और सुरक्षा बहाल करने की मांग

अमीर शरीयत ने पश्चिम बंगाल सरकार से राज्य में शांति और कानून व्यवस्था कायम रखने, अशांति व नफरत फैलाने वाली ताकतों पर सख्त कार्रवाई करने तथा सभी नागरिकों को न्याय और समान अधिकार सुनिश्चित करने की मांग की है. उन्होंने कहा कि मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न की घटनाओं पर सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए ताकि हालात सामान्य हो सकें और देश की गंगा-जमुनी संस्कृति सुरक्षित रह सके.

वंदे मातरम को अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा वंदे मातरम को लेकर जारी परिपत्र पर भी अमीर शरीयत ने कड़ी आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि वंदे मातरम का मूल भाव देवी और तीर्थस्थल की स्तुति से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे अनिवार्य बनाना धार्मिक एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है. भारत का संविधान सभी धर्मों को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है, ऐसे में किसी गीत को अनिवार्य रूप से गाने के लिए बाध्य करना कतई उचित नहीं है.

लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक भावना के विपरीत निर्देश

इमारत-ए-शरिया के नाजिम मौलाना मुफ्ती मुहम्मद सईद अल-रहमान कासमी ने कहा कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने भी राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में ऐसे मुद्दों को संवेदनशील बताया था. अदालतों ने भी धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के संदर्भ में इस पर विचार रखे हैं. इसके बावजूद सरकार द्वारा जारी यह निर्देश लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत प्रतीत होता है. उन्होंने मांग की है कि सरकार इस परिपत्र को तत्काल वापस ले ताकि सौहार्द का माहौल बना रहे.

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निखिल अनुराग

लेखक के बारे में

By निखिल अनुराग

मूलतः निखिल अनुराग. पेशे से पत्रकार. बुद्ध की धरती पर जन्म. बिहार का सबसे नवीनतम जिला (अरवल) से ताल्लुक. पढ़ाई की शुरूआत गांव से ही. फिर गंगा के तट पटना पहुंचा. ज्ञान की धरती से कुछ तालीम हासिल कर राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच. पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट. नोएडा की धरती पर विद्वतजन से कुछ न कुछ सीखा. करंट अफ़ेयर्स, राजनीति, खेल, अंतरराष्ट्रीय संबंध, गाँव, खेत-किसान पसंदीदा टॉपिक. स्कूल, कॉलेज युनिवर्सिटी में यूथ से गपशप करना एनर्जी का अतिरिक्त स्रोत. साल 2020 में नोएडा से शुरू हुई इस लेखन यात्रा कलम, डेस्कटॉप, लैपटॉप के की-बोर्ड से होते हुए स्मार्ट फोन तक पहुंच गयी. ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ रही है, सीखने, पढ़ने, लिखने की भूख भी बढ़ रही है.

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