Patna College : 160 साल का हुआ पटना कॉलेज, कई ऐतिहासिक घटनाओं का रहा है साक्षी

बिहार, झारखंड, ओड़िशा और नेपाल का एकमात्र सबसे पुराना माना जानेवाला पटना कॉलेज के कीर्तिमानों का एक लंबा इतिहास रहा है. आज इस कॉलेज ने 160 साल पूरे कर लिए हैं. स्थापना के 161 वें वर्ष में प्रवेश करने पर आयोजित समारोह के दौरान कुछ नया इतिहास रचे जाने की उम्मीद है.
अनुराग प्रधान, पटना: परंपरा व प्रगति के विभिन्न पड़ावों को पार करता हुआ पटना कॉलेज आज 160 वर्ष का हो गया है. बिहार, झारखंड, ओड़िशा और नेपाल का एकमात्र सबसे पुराना माना जानेवाला पटना कॉलेज के कीर्तिमानों का एक लंबा इतिहास रहा है. भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, सच्चिदानंद सिन्हा, जयप्रकाश नारायण समेत कई महापुरुषों के व्यक्तित्व निर्माण में पटना कॉलेज की प्रमुख भूमिका रही है. बिहार के शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक गतिविधियों का यह कॉलेज न सिर्फ केंद्र रहा है, बल्कि उत्प्रेरक भी रहा है. स्थापना के 161 वें वर्ष में प्रवेश करने पर आयोजित समारोह के दौरान फिर से कुछ नया इतिहास रचे जाने की उम्मीद है.
पटना कॉलेज का 161वां स्थापना दिवस समारोह सोमवार को धूमधाम से मनाया जायेगा. समारोह का उद्घाटन एमएलसी डॉ रामवचन राय करेंगे. कार्यक्रम को लेकर कॉलेज ने पूरी तैयारी कर ली है. कार्यक्रम का आयोजन सेमिनार हॉल में किया जायेगा. समारोह को लेकर परिसर को सजाया गया है. लाइंटिंग से भी पटना कॉलेज चमक रहा है. कार्यक्रम में कुलपति प्रो गिरीश कुमार चौधरी के साथ प्रतिकुलपति, यूनिवर्सिटी व कॉलेज के सभी अधिकारी व शिक्षक रहेंगे. इनके अलावा इस कॉलेज में पढ़े कई पूर्ववर्ती स्टूडेंट्स भी भाग लेंगे. उद्घाटन समारोह 11:30 बजे से शुरू होगा. पटना कॉलेज के प्राचार्य डॉ तरुण कुमार ने कहा कि यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हम कॉलेज का 161वां स्थापना दिवस मना रहे हैं. कॉलेज पुरानी परंपरा की जीवंत करने में लगा हुआ है. नये-नये काम होंगे. कई सुविधाएं स्टूडेंट्स को दी जायेगी. आगे कॉलेज को बेहतर करना है. बतातें चलें कि नौ जनवरी 1863 को कॉलेज की स्थापना की गई थी. 1863 से लेकर 1917 तक यह कलकत्ता यूनिवर्सिटी से संबद्ध रहा था.
कॉलेज बिहार का सबसे पुराना और देश का पांचवां प्राचीनतम कॉलेज है. कॉलेज की स्थापना अंग्रेजों ने भारतीयों के सहयोग से की थी. जुलाई 1835 में पटना में पहली बार हाइस्कूल की स्थापना हुई. 1839 में गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैंड के आदेश से पटना में एक केंद्रीय कॉलेज खोलने की योजना बनी. 26 सितंबर 1844 को इस स्कूल को कॉलेज का दर्जा प्राप्त हुआ, लेकिन ढाई वर्ष के बाद ही यह कॉलेज बंद हो गया. 1856-57 में फिर से कॉलेज खोलने की योजना बनी, जो असफल रही. कारण आपसी मतभेद रहा. बिहार में आधुनिक शिक्षा की स्थापना दिवस के अवसर पर 28 अप्रैल, 1858 को पटना हाइस्कूल के बदले पटना में एक जिला स्कूल खोलने की योजना बनी. पटना हाइस्कूल का नाम बदल कर पटना जिला स्कूल कर दिया गया. पटना जिला स्कूल को पटना कॉलेज के रूप में स्थापित करने का सरकारी आदेश 15 नवंबर, 1861 को जारी हुआ. आदेशानुसार जिला स्कूल अगस्त, 1862 में पटना कॉलेजिएट स्कूल का रूप ले लिया. इस कॉलेजिएट स्कूल को 9 जनवरी, 1963 को कॉलेज का दर्जा मिला.
पटना कॉलेज में बीए की पढ़ाई 1867 से शुरू हुई. उस समय वकालत, विज्ञान, इंजीनियरिंग और कला की पढ़ाई होती थी. बाद में सायंस कॉलेज, पटना लॉ कॉलेज, बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में इन विषयों की पढ़ाई होने लगी. ये सभी कॉलेज पटना कॉलेज से ही निकले. इसलिए पटना कॉलेज को मदर बोर्ड भी कहा जाता है. पटना यूनिवर्सिटी भी पटना कॉलेज से ही बनी.
शिक्षा के क्षेत्र में कॉलेज ने अनेक रत्न दिये. कलीमुद्दीन अहमद, अख्तर औरेनवी अहमद और एस सदरूद्दीन अहमद उर्दू के विद्वान थे. बंगला साहित्य के जानेमाने हस्ती थे सरदींदु बनर्जी. भवानीचरण भट्टाचार्या और अमीया चक्रवर्ती अंग्रेजी के प्रसिद्ध ज्ञाता थे. रामाधारी सिंह दिनकर. शसमसुद्दीन अहमद हफीद और सैयद हसन उर्दू के, इकवाल हुसैन फासरी के, हरि मोहन झा मैथिली के, जनार्दन झा हिंदी कविता के, रमानाथ झा मैथिली के इतिहास के क्षेत्र में, सुभद्र झा मैथिली आलोचना के लिए, प्राणनाथ महंती उड़ीया भाषा के क्षेत्र में, खड्गमन मल्ल नेपाली लेख में, उपन्यासकार कृपनाथ मिश्र, बंगला कवि कलिंदी चरण पाणिग्रही एवं बैकुंठ नाथ पटनायक, हिंदी के विश्वनाथ प्रसाद, बंगला साहित्यकार एवं कवि आनंद शंकर रे, बंगला पत्रकार मनिंद्र चंद्र समाद्दार, हिंदी ड्रामा विशेषज्ञ देवेंद्र नाथ वर्मा, हिंदी कवि नलिन विलोचन शर्मा, साहित्यकार दिवाकर प्रसाद विद्यार्थी, साहित्यकार धर्मेंद्र ब्रह्मचारी, उर्दू के साहित्यकार अब्दुल बदूद आदि विद्यानों ने पटना कॉलेज का नाम जिस रूप में रौशन किया है वह कॉलेज के लिए अब तक गौरव की बात है. जानेमाने इतिहासकार प्रो रामशरण शर्मा, प्रो सय्यद हसन अस्करी, प्रो केके दत्त, राजनीति शास्त्र के विद्वान प्रो मेनन, प्रो फिलिप्स और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बाथेजा जैसे शिक्षक यहां की गरिमा में चार चांद लगाते थे.
इतिहासकार केके दत्त 1958 में, 1959 में अनंत सदाशिव अल्तेकर और 1975 में रामशरण शर्मा इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस के अध्यक्ष हुए. ज्ञानचंद्र 1938 में इंडियन इकोनॉमिक्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष हुए. बीबी मजुमदार 1951 में और विश्वनाथ वर्मा 1968 में इंडियन पॉलिटीकल कांग्रेस के अध्यक्ष थे.
पटना कॉलेज ने सैकड़ों विद्वान, प्रशासक, देशभक्त, अधिकारी, वकील, जज, पत्रकार, लेखक पैदा किये हैं. बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण, जयप्रकाश नारायण, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’, अनुग्रह नारायण सिन्हा, सच्चिदानंद सिन्हा, डॉ टीपी सिंह, सर सुल्तान अहमद, इतिहासकार राम नारायण शर्मा, सैयद हसन अस्करी, योगेंद्र मिश्र, जगदीश चंद्र झा, गोरखनाथ सिंह, पंडित राम अवतार शर्मा, बलिराम भगत, टीपी सिंह, मुचकुंद दूबे, आरएस शर्मा, यशवंत सिन्हा, प्रो पी दयाल, अंजनी कुमार सिंह, डॉ अजीमुद्दीन अहमद, अरबी सर यदुनाथ सरकार, डॉ सुविमल चंद सरकार, डॉ डीएम दत्त, जेपी नड्डा व अन्य कई.
कैलाश चंद्र बंधोपाध्याय प्रथम छात्र थे, जिन्होंने 1869 में यहां से एमए पास किया. शोभना गुप्ता 1925 में बीए की परीक्षा पास की. वह बीए करनेवाली पहली छात्र थीं. उनके पिता अनुकूल चंद्र गुप्ता ‘बिहार हेराल्ड’ के प्रथम संपादक थे. 1921 में नीलमणि सेनापति और रशिदुज जमन तथा 1922 में अभयपद मुखर्जी आइसीएस पास किये. ये भी पटना कॉलेज के छात्र थे.
एक अक्टूबर 1917 में कोलकाता विवि से अलग होकर पटना विवि की स्थापना हुई. पटना विवि बनाने में पटना कॉलेज की अहम भूमिका रही है. 1863 में स्थापित इस कॉलेज के प्रथम प्राचार्य जेके रोजर्स अंग्रेज थे.1934 में राम प्रसाद खोसला पहले भारतीय प्राचार्य बने. 1935 में एम आर्मर अंतिम अंग्रेज प्राचार्य थे. जबकि 1952 में मो कलीमुद्दीन अहमद पहले मुसलिम प्राचार्य बने. जबकि प्रो स्नेहलता प्रसाद 2006 में पहली महिला प्राचार्य बनीं. वहीं, हिंदी विभाग के पहले शिक्षक डॉ तरुण कुमार हैं, जो एक जनवरी 2023 को पटना कॉलेज के प्राचार्य बने हैं.
1963 में भारत के राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधकृष्णन 100वीं वर्षगांठ पर आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि थे. कॉलेज के 100 वर्ष पूरे होने पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कॉलेज में कहा था कि मुझे कोई शक नहीं कि इस कॉलेज ने कई उम्दा लोगों को जन्म दिया है. जब आप किसी शैक्षिक संस्थान की बात करते हैं, तब आपके मन में कई बातें रहती हैं. इसको आप किस प्रकार लेते हैं, यह आपकी मानसिकता पर निर्भर है.
पटना कॉलेज बिहार, झारखंड, ओड़िशा और नेपाल का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित कॉलेज रहा है. पटना सायंस कॉलेज, लॉ कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और पीएमसीएच भी यहीं से निकले हैं. बिहार में लोकतंत्र की संस्थानिक शुरुआत पटना कॉलेज से हुई थी. बंगाल से अलग राज्य बनने के बाद बिहार विधान परिषद का सेशन पटना कॉलेज कैंपस में ही चलता था. बीते साल राज्य के सौ साल पूरे होने पर राज्य सरकार के तमाम मंत्री समेत पूरा अमला यहां पहुंचा था. शैक्षिक, सांस्कृतिक व लोकतांत्रिक गतिविधियों की शुरुआत यहीं से हुई थी.
बिहार में बड़े कॉलेज के रूप में पटना कॉलेज था जिसकी स्थापना 1862-63 में की गयी थी. इस कॉलेज में बंगाली वर्चस्व इतना अधिक था कि 1872 में जॉर्ज कैम्पबेल ने यह निर्णय लिया कि इसे बंद कर दिया जाये. वे इस बात से क्षुब्ध थे कि 16 मार्च 1872 को कलकत्ता यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में उपस्थित ‘बिहार’ के सभी स्टूडेंट्स बंगाली थे! यह सरकारी रिपोर्ट में उद्धृत किया गया है कि ‘‘हम बिहार में कॉलेज सिर्फ प्रवासी बंगाली की शिक्षा के लिए खुला नहीं रखना चाहते’’. इस निर्णय का विरोध बिहार के बड़े लोगों ने किया. इन लोगों का कथन था कि इस कॉलेज को बंद न किया जाये क्योंकि बिहार में यह एकमात्र शिक्षा केंद्र था जहां बिहार के स्टूडेंट्स डिग्री की पढ़ाई कर सकते थे.
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