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घने कुहासे में भी बिहटा के नये एयरपोर्ट पर उतर सकेंगे विमान

Updated at : 30 Sep 2024 1:25 AM (IST)
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घने कुहासे में भी बिहटा के नये एयरपोर्ट पर उतर सकेंगे विमान

घने कुहासे मेंं भी बिहटा एयरपोर्ट पर विमान उतर सकेंगे और 100 मीटर दृश्यता पर भी वहां लैंडिंग होगी. ऐसा आइएलएस (इंस्ट्रूमेंट लैंडिग सिस्टम) कैट-3 सी के इंस्टॉलेशन के कारण संभव होगा.

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अनुपम कुमार, पटना : घने कुहासे मेंं भी बिहटा एयरपोर्ट पर विमान उतर सकेंगे और 100 मीटर दृश्यता पर भी वहां लैंडिंग होगी. ऐसा आइएलएस (इंस्ट्रूमेंट लैंडिग सिस्टम) कैट-3 सी के इंस्टॉलेशन के कारण संभव होगा, जिसका रास्ता अब रनवे विस्तार के लिए 191 एकड़ अतिरिक्त जमीन देने को स्वीकृति के बाद साफ हो गया है. 2017 में जब इसके निर्माण की योजना बनी थी, तो कैट-3सी आइएलएस लगाने का विचार था. लेकिन इसके लिए 900 मीटर अतिरिक्त एप्रोच फनल की जरूरत पड़ती, जिसके लिए 192 एकड़ और जमीन की जरूरत थी. लेकिन, इतनी जमीन के अधिग्रहण में समस्या के मद्देनजर राज्य सरकार ने एयरपोर्ट ऑथोरिटी को जमीन की जरूरत को कम करने के लिए कहा. इससे वहां आइएलएस कैट-3 के इंस्टॉलेशन की योजना रुक गयी था और पटना की तरह वहां आइएलएस कैट वन लगाने का विचार चलने लगा था.कम दृश्यता से न डायवर्ट होंगी और न ही रद्द कर करनी पड़ेंगी फ्लाइटें दिसंबर-जनवरी में हर वर्ष विशिष्ट लैंडस्केप और भौगोलिक पृष्टभूमि के कारण पटना और उसके आसपास के क्षेत्राे में न केवल भीषण ठंड पड़ती है, बल्कि घना कुहासा भी होता हैं. इसके कारण दोपहर 12 बजे के बाद ही यहां लैंडिंग शुरू हो पाती है, क्योंकि कम क्षमता का कैट वन आइएलएस लगे होने के कारण यहां विमानों के उतरने के लिए कम-से-कम 1000 मीटर की दृश्यता चाहिए और 12 बजे से पहले उतनी दृश्यता नहीं होती है. कई दिन, तो दोपहर एक-दो बजे के बाद लैंडिंग शुरू होती है और रात आठ बजे के बाद कुहासा घना होने से विमान उतर नहींं पाते. इसके कारण दर्जनों विमान लेट हो जाते हैं और लैंडिंग शुरू होने पर उनकी आसमान में कतार लग जाती है. लेकिन, बिहटा एयरपोर्ट पर आइएलएस कैट 3 सी के इंस्टॉलशन के बाद दिल्ली एयरपोर्ट की तरह घने कुहासे में भी वहां महज 100 मीटर की दृश्यता पर भी विमान उतर सकेेंगे. आइएलएस की पांचों श्रेणियों की अलग-अलग क्षमता है आइएलएस एक ऐसा सिस्टम है, जिसमें ग्राउंड पर लगे सेंसर की मदद से पायलट को उसके विंड स्क्रीन पर लगे डिस्प्ले में रनवे की वर्चुअल इमेज आती रहती है और आंख से प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखने के बावजूद उसे रनवे और एप्रोच फनल का पूरा मैप मिल जाता है, जिससे उसे घने धुंध में भी लैंडिंग में समस्या नहीं होती. आइएलएस की कुल पांच श्रेणियां होती हैं, जिनमें हरेक के लिए अलग-अलग लंबाई के रनवे, एप्रोच लाइट और आइएलएस सेंसर इंस्टॉलेशन की जरूरत पड़ती है. इसी के अनुरूप इनकी लैंडिंग क्षमता भी अलग-अलग है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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