Bihar News: बिहार में पूजा-त्योहारों के थाली में परदेशी फूलों का जलवा

Flower plate during festivals
Bihar News: छठ से लेकर दुर्गा पूजा तक, बिहार के हर आंगन में सजने वाली आरती थालियां और मंदिरों की चौखटें भले ही स्थानीय भावनाओं से जुड़ी हों, लेकिन इन्हें महकाने वाले फूल ज़्यादातर परदेश से आते हैं. गेंदा छोड़ दें तो बाकी फूलों की खुशबू बंगाल और यूपी से ही बिहार तक पहुंच रही है.
Bihar News: बिहार की धरती उपजाऊ है, लेकिन जब बात फूलों की आती है तो तस्वीर उतनी रंगीन नहीं दिखती. राज्य में गेंदा को छोड़कर किसी भी अन्य फूल का उत्पादन बेहद कम है.
हालत यह है कि बड़े पैमाने पर होने वाले पूजा और त्योहारों में इस्तेमाल होने वाले फूल दूसरे राज्यों से मंगाने पड़ते हैं. पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से प्रतिदिन ट्रक भरकर गेंदा, गुलाब और अन्य फूल पटना और आसपास के बाजारों में पहुंचते हैं.
गेंदा ही सहारा, बाकी फूल नदारद
बिहार में फिलहाल गेंदा ही ऐसा फूल है जिसकी खेती और उत्पादन संतोषजनक स्तर पर हो रहा है. अभी बिहार में गेंदा का उत्पादन 12.798 हजार टन तक पहुंच चुका है, जबकि इससे पहले यह 11.065 हजार टन था. यानी करीब एक हजार टन की वृद्धि हुई है. यही वजह है कि छठ, दीवाली और दुर्गा पूजा जैसे बड़े पर्वों में स्थानीय बाजारों में गेंदा की माला आसानी से उपलब्ध हो जाती है.
इसके उलट गुलाब, ट्यूबरोज और जास्मिन जैसे फूलों की स्थिति बेहद कमजोर है. गुलाब का उत्पादन बीते दो वर्षों में केवल 0.166 हजार टन हुआ है. खेती का दायरा भी नगण्य है—सिर्फ 0.025 हजार हेक्टेयर में गुलाब उगाया जा रहा है. इसी तरह ट्यूबरोज का उत्पादन 0.0269 हजार टन और जास्मिन का महज 0.031 हजार टन पर सिमटा हुआ है.
पूजा-त्योहारों फूलों की बढ़ती मांग, पर खेती पिछड़ी
बिहार धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों की भूमि है. यहां का सालभर का कैलेंडर त्योहारों से भरा रहता है. छठ महापर्व से लेकर सावन और बसंत पंचमी तक, हर उत्सव में फूलों का विशेष महत्व है. लेकिन मांग और आपूर्ति के बीच भारी अंतर बना हुआ है.
कृषि विभाग की मानें तो राज्य में कुल मिलाकर 13.323 हजार हेक्टेयर में ही फूलों की खेती हो रही है. यह आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं है, खासकर तब जब बिहार की आबादी और त्योहारों की मांग को देखा जाए. यही कारण है कि ज्यादातर दुकानदार बंगाल और यूपी से फूल मंगवाने पर निर्भर हैं.
गुलाब की खेती में हल्की बढ़ोतरी
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है. गुलाब की खेती में पिछले दो सालों में थोड़ी वृद्धि दर्ज की गई है. 2023 में गुलाब का उत्पादन 0.014 हजार टन था, जो 2024 में बढ़कर 0.152 हजार टन हो गया. खेती का दायरा भी 0.07 हजार हेक्टेयर से बढ़ा है. हालांकि यह अभी भी जरूरत की तुलना में बेहद कम है, लेकिन विशेषज्ञ इसे सकारात्मक संकेत मान रहे हैं.
फूलों की खेती में जोखिम और लागत दोनों अधिक है. सिंचाई, रखरखाव और बाजार तक पहुंच की दिक्कतें किसानों को इसे बड़े पैमाने पर अपनाने से रोकती हैं. सब्जी और अनाज की खेती में उन्हें स्थायी बाजार और सुनिश्चित दाम मिल जाते हैं. यही वजह है कि फूलों का उत्पादन आज भी छोटे पैमाने तक सीमित है.
भविष्य की राह और चुनौतियां
बिहार में फूलों की खेती का दायरा बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं. कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर राज्य सरकार किसानों को प्रोत्साहन और बेहतर बाजार उपलब्ध कराए तो फूलों की खेती तेजी से बढ़ सकती है. इससे न सिर्फ स्थानीय मांग पूरी होगी, बल्कि रोजगार और आय के नए अवसर भी खुलेंगे.
तस्वीर यही कहती है कि गेंदा के अलावा बाकी फूल पटना और अन्य जिलों के बाजारों में बाहर से आ रहे हैं. त्योहारों की रौनक इन्हीं परदेशी फूलों से सजती है. सवाल यही है कि क्या आने वाले वर्षों में बिहार अपने फूलों से ही अपनी पूजा और उत्सवों को सजा पाएगा, या फिर हमेशा बंगाल और यूपी के सहारे रहना पड़ेगा.
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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