Durga Puja : मां कालरात्रि की पूजा विधि और महत्व, जानें पटना के इस काली मंदिर में कैसे होती है पूजा
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 02 Oct 2022 3:02 PM
शारदीय नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है. पटना के दरभंगा हाउस स्थित काली मंदिर में मां कालरात्रि की विशेष पूजा होती है. यहां जानें मां कालरात्रि की पूजा विधि, मंत्र, प्रिय भोग और महत्व के बार में...
पटना के दरभंगा हाउस परिसर स्थित काली मंदिर लगभग 160 साल पुराना है. यहां दक्षिण मुखी स्थापित मां काली की प्रतिमा काले संगमरमर की बनी है. यहां काली की पूजा तांत्रिक विधि से होती है. इस मंदिर की स्थापना दरभंगा के महाराजाधिराज सर रामेश्वर सिंह ने की थी. प्रारंभ के दिनों में इस मंदिर में केवल महाराज परिवार के ही लोग पूजा-पाठ किया करते थे, लेकिन जब पटना विश्वविद्यालय को महाराज ने यह परिसर दान दे दिया तब से यहां आम भक्त जुटने लगे. आज इस मंदिर में रोज सैकड़ों भक्त अपनी मुराद लेकर आते हैं.
शारदीय नवरात्र के सातवें दिन यहां मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है. मां कालरात्रि का स्वरूप शत्रुओं में भय पैदा कर देता है. मां दुर्गा ने रक्तबीज के वध के समय कालरात्रि का स्वरूप धारण किया था. मां कालरात्रि की पूजा करने से भय दूर होता है एवं संकटों से रक्षा होती है. मां की पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है. इसी कारण से इनका एक नाम शुभंकरी भी है.
ज्वाला कराल अति उग्रम शेषा सुर सूदनम।
त्रिशूलम पातु नो भीते भद्रकाली नमोस्तुते।।
कालरात्रि देवी का प्रिय रंग लाल है. इसी कारण से इनकी पूजा में लाल फूल अर्पित करना चाहिए. मां कालरात्रि की पूजा में गुड़ का भोग लगाने से भी मां कालरात्रि प्रसन्न होती है.
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मां कालरात्रि शुभ फल देने वाली हैं.
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मां कालरात्रि से काल भी भयभीत होता है
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मां कालरात्रि अपने भक्तों क भय से मुक्ति दिलाती है
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मां कालरात्रि भक्तों की अकाल मृत्यु से भी रक्षा करती है
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मां कालरात्रि की पूजा शत्रुओं के दमन के लिए भी की जाती है
स्नान करने के बाद व्रत और मां कालरात्रि के पूजन का संकल्प लेने के बाद मां कालरात्रि को जल, फूल, अक्षत्, धूप, दीप, गंध, फल, कुमकुम, सिंदूर आदि अर्पित करें. इस दौरान मंत्र उच्चारण करते हुए मां को गुड़ का भोग लगाएं. इसके बाद कथा का पाठ करें और आरती के साथ पूजा का समापन करें. पूजा के बाद अपने मन की मनोकामना मां से कह दें.
भगवान शंकर के सीने पर चढ़ी मां काली की रौद्र रूप वाली इस प्रतिमा के वाहिनी और बटुक भैरव और बायीं ओर गणेश की प्रतिमा है. नीचे एक कलश है, जो हर वर्ष नवरात्र के प्रथम दिन बदला जाता है. यहां आग की बलि देने की प्रथा कायम है. मंदिर प्रतिदिन प्रात: 6:30 बजे से दोपहर 11:30 बजे तक और शाम चार बजे से 6:30 बजे तक खुला रहता है.
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