बिहार चुनाव में नरेंद्र मोदी की रैली और उसके असर पर पढ़िये प्रभात खबर के स्थानीय संपादक की विशेष टिप्पणी

Published at :17 Aug 2015 8:21 PM (IST)
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बिहार चुनाव में नरेंद्र मोदी की रैली और उसके असर पर पढ़िये प्रभात खबर के स्थानीय संपादक की विशेष टिप्पणी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी बिहार में हो रही रैलियों के असर पर पढ़ें प्रभात खबर के स्‍थानीय संपादक पंकज मुकाती की विशेष टिप्‍पणी. बिहार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का थिंक टैंक कमजोर दिख रहा है. होमवर्क, रिसर्च और दूरदर्शिता की कमी साफ़ झलकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुजफ्फरपुर और गया में हुई […]

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी बिहार में हो रही रैलियों के असर पर पढ़ें प्रभात खबर के स्‍थानीय संपादक पंकज मुकाती की विशेष टिप्‍पणी.

बिहार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का थिंक टैंक कमजोर दिख रहा है. होमवर्क, रिसर्च और दूरदर्शिता की कमी साफ़ झलकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुजफ्फरपुर और गया में हुई परिवर्तन रैली पर इसका असर साफ़ दिखा.

प्रचार सामग्री, रैली की भीड़, झंडे, बैनर,समर्थकों का जूनून के हिसाब से देखेंगे तो रैली सफल रही. पर राजनीतिक दूरदर्शिता, जनता पर असर के मामले में बेहद कमजोर रही.बड़े-बड़े पोस्टर, झंडे, ट्विटर, फेसबुक से मिले बुलावे भीड़ जुटाते हैं, माहौल खड़ा करते हैं. जनता को रैली तक खीच कर लाते हैं, बीजेपी का प्रचार तंत्र मजबूत है, वो लोगों को खीचने में सफल रहा. दोनों ही रैली में नरेंद्र मोदी को देखने लोग उमड़े, उनका उत्साह लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा दिखा. ये भीड़ रैली की सफलता या पार्टी की ताकत नहीं कही जा सकती है. रैली की सफलता होती है उसका भाषण,उसकी भाषा, मारक शब्द, मारक हो पर संतुलित, विरोधियों के आलोचना हो पर थोड़ा मखमल में लपेटकर.

कुछ ऐसा हो जिसे जनता घर लेकर जाए, वोट के लिए उसका विचार पुख्ता हो. पार्टी के नेताओं पर भरोसा हो. उसकी चर्चा हो. याद रखिये चर्चा और चौराहे पर गप्प मारने में अंतर होता है. दोनों ही रैलियों इस मामले में सिरे से खाली रही. लोग खाली हाथ, नाउम्मीद लौटे. वे कोई विचार बिहार बीजेपी के बारे में नहीं बना सके. बिहार में पार्टी ने थोथा भाषण, कमजोर होमवर्क से एक बड़ा मौका गवां दिया. मोदी जैसे बड़े नेता को जाया कर दिया. अगर ऐसा ही आगे भी रहा तो अब तक लोगों की चर्चाओं में बढ़त लेती दिख रही बीजेपी मुश्किल में आ सकती है.

मोदी के चुनाव प्रबंधंकों को समझना होगा कि मोदी अब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं, ओहदेदार हैं. एक उम्मीदवार और ओहदेदार केभाषण में अंतर होता है. मोदी के भाषणों ने नीतीश कुमार को नई ताकत दे दी. जीत की राह तलाशते, लालू से अपने रिश्तों को लेकर हैरान, परेशान से दिख रहे नीतीश अचानक सक्रिय हो गए. ये सक्रियता सिर्फ उन्हें ही नहीं मिली, बिहारी समाज ने भी नीतीश के प्रति सहनुभूति का भाव भर दिया.
कारणमोदी के मुजफ्फरपुर भाषण में नीतीश कुमार को खूब कोसा गया. उनके ट्विटर पर आने से लेकर, अपने स्वागत तक को मोदी ने बड़े अहंकार से बताया.एक तरह से वो भाषण काम निजी खीझ ज्यादा दिखाई दिया. इसके बाद डीएनए के सवाल ने और बड़ा दिया. निश्चित तौर पर इन भाषणों ने मुकाबला मोदी बनाम नीतीश कर दिया. और नीतीश को मुकाबले में खुद बीजेपी ने ला दिया. इसके बाद गया में भी ये सिलसिला जारी रहा. निश्चित ही मोदी विकास पुरुष हैं, पर बिहार में नीतीश की जो छवि है, वो मोदी पर भारी है. जरुरी है कि बिहार बीजेपी अभी भी अपनी रणनीति में सुधार कर ले, वरना रेत का किला कब बिखर जायेगा पता भी नहीं चलेगा,
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