मॉब लिचिंग : : न्यायिक निर्देशों पर अमल नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र और राज्यों को नोटिस

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Jul 2019 2:45 PM

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नयी दिल्ली :उच्चतम न्यायालय ने भीड़ की हिंसा और लोगों को पीट-पीट कर मारने की घटनाओं पर अंकुश के लिए दिये गये निर्देशों पर अमल नहीं करने के आरोपों पर शुक्रवार को केंद्र से जवाब मांगा. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने ‘एंटी करप्शन काउन्सिल आफ इंडिया ट्रस्ट‘ नामक संगठन […]

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नयी दिल्ली :उच्चतम न्यायालय ने भीड़ की हिंसा और लोगों को पीट-पीट कर मारने की घटनाओं पर अंकुश के लिए दिये गये निर्देशों पर अमल नहीं करने के आरोपों पर शुक्रवार को केंद्र से जवाब मांगा. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने ‘एंटी करप्शन काउन्सिल आफ इंडिया ट्रस्ट‘ नामक संगठन की याचिका पर गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किये. इस ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनुकूल चंद्र प्रधान ने कहा कि भीड़ द्वारा लोगों को पीट-पीट कर मार डालने की घटनाओं में वृद्धि हो रही है और सरकारें इस समस्या से निबटने के लिए शीर्ष अदालत द्वारा जुलाई 2018 में दिये गये निर्देशों पर अमल के लिये कोई कदम नहीं उठा रही हैं.

ट्रस्ट ने कहा कि शीर्ष अदालत ने 17 जुलाई, 2018 को सरकारों को तीन तरह के उपाय-एहतियाती, उपचारात्मक और दंडात्मक-करने के निर्देश दिये थे, लेकिन इन पर अमल नहीं किया गया है. शीर्ष अदालत ने कांग्रेस कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला की याचिका पर ये निर्देश दिये थे. यही नहीं, शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि भीड़ की हिंसा में शामिल होनेवाले लोगों में कानून के प्रति भय का भाव पैदा करने के लिए विशेष कानून बनाये जाने की आवश्यकता है. न्यायालय ने संसद से भी भीड़ हिंसा और गौ रक्षकों द्वारा कानून अपने हाथ मे लेने की बढ़ती प्रवृत्ति से सख्ती से निबटने के लिए उचित कानून बनाने पर विचार करने का आग्रह किया था.

क्या है मामला?

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मॉब लिंचिंग और गायों को लेकर हिंसा पर निर्देश दिये थे. साथ ही केंद्र समेत अन्य राज्यों को शीर्ष अदालत के निर्देशों को लागू करने को लेकर रिपोर्ट फाइल करने को कहा था. तीन सदस्यीय पीठ में तत्कालीन चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस एएम खनविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ भी शामिल थे. बेंच ने कहा था कि ‘लोगों को इस संबंध में एहसास होना चाहिए कि भीड़ की हिंसा और कानून हाथ में लेने से आप कानून के प्रकोप को आमंत्रित कर रहे हैं.’

शीर्ष अदालत ने जागरूकता अभियान चलाने का दिया था निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से निर्देश का पालन करने को लेकर जवाब दाखिल करने को कहा था. इसमें केंद्र और अन्य राज्यों को मॉब लिंचिंग और गायों के नाम पर हिंसा को लेकर टीवी, रेडियो समेत प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जागरूकता अभियान चलाना था.

किसने दाखिल की याचिका?

कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा की कजिन मोनिका वाड्रा के पति तहसीन पूनावाला पुणे के एक बड़े बिजनेसमैन हैं. राजनीति में गहरी रूचि रखनेवाले तहसीन पूनावाला ने वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर गोमुख प्रथा पर सख्ती बरतने और गोजातीय प्रजातियों के कथित उत्पीड़कों के खिलाफ हिंसा का सहारा लेने के लिए सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए याचिका दायर की थी.

मॉब लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी की थी गाइडलाइन

वर्ष 2018 में तहसीन पूनावाला की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग पर रोक के लिए गाइडलाइन जारी की थी. यह गाइडलाइन केंद्र और राज्य सरकारों के लिए जारी की गयी है. …जानें सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन की मुख्य बातें-

सभी राज्य सरकारें भीड़ हिंसा और मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर रोक के लिए हर जिले में नोडल अधिकारी की नियुक्ति करें. यह नोडल अधिकारी पुलिस अधीक्षक (एसपी) या उससे ऊपर के रैंक का होना चाहिए. नोडल अधिकारी के साथ डीएसपी रैंक के एक अधिकारी को भी तैनात करना है. ये अधिकारी जिले में मॉब लिंचिंग रोकने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स का गठन करेंगे, जो ऐसे अपराधों में शामिल लोगों, भड़काऊ बयान देनेवाले और सोशल मीडिया के जरिये फेक न्यूज को फैलानेवालों की जानकारी जुटायेगी और कार्रवाई करेगी.

सभी राज्यों के गृह सचिव ऐसे इलाकों के पुलिस स्टेशन के प्रभारियों और नोडल अधिकारियों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने का निर्देश जारी करें, जहां हाल में मॉब लिंचिंग की घटनाएं देखने को मिली हैं.

स्थानीय खुफिया ईकाई और थाना प्रभारियों के साथ नोडल अधिकारी नियमित बैठक कर ऐसी वारदातों को रोकने के लिए कदम उठायेंगे. साथ ही जिस समुदाय या जाति को मॉब लिंचिंग का शिकार बनाये जाने की आशंका हो, उसके खिलाफ माहौल ठीक करने की कोशिश करेंगे.

जिलों के नोडल अधिकारियों और पुलिस इंटेलीजेंस के प्रमुखों के साथ राज्यों के डीजीपी और गृह विभाग के सचिव नियमित रूप से बैठक करेंगे. अगर दो जिलों के बीच का मामला हो तो उत्पन्न होनेवाली परेशानियों को रोकने के लिए कदम उठायेंगे.

पुलिस अधिकारी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा-129 में प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल कर भीड़ तितर-बितर करने का प्रयास करेंगे.

मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर रोक के लिए राज्य सरकारों के बीच तालमेल बैठाने के लिए केंद्रीय गृह विभाग भी पहल करेंगे.

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या फिर सोशल साइट के जरिये लोगों को बताने की कोशिश करेंगे कि अगर किसी ने कानून तोड़ने और मॉब लिंचिंग में शामिल होने की कोशिश करेंगे, तो उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जायेगी.

केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि सोशल मीडिया से अफवाह फैलानेवाले पोस्ट और वीडियो समेत सभी आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए कदम उठाएं.

पुलिस को मॉब लिंचिंग के लिए भड़काने या उकसाने के लिए मैसेज या वीडियो को फैलानेवालों के खिलाफ आईपीसी की धारा-153 (ए) समेत अन्य संबंधित कानूनों के तहत प्राथमिकी दर्ज करें और कार्रवाई करें.

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