डॉर्क्‍टस डे पर विशेष : हम वही करें, जिसके लिए हमने डॉक्टर बनना तय किया था

Updated at : 01 Jul 2019 9:22 AM (IST)
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डॉर्क्‍टस डे पर विशेष : हम वही करें, जिसके लिए हमने डॉक्टर बनना तय किया था

चिकित्सक का दर्जा हमेशा ईश्वर के बाद माना जाता है. यह संबंध युग–युगांतर तक चलता रहेगा. ईश्वर के मुख्य दो गुण होते हैं- सबका भला और किसी का नुकसान नहीं करना. व्यक्ति ईश्वर को सिर्फ उन परिस्थितियों में याद करता है– जब वह कष्ट में हो या दर्द से पीड़ित हो. चिकित्सा शास्त्र की नीति […]

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चिकित्सक का दर्जा हमेशा ईश्वर के बाद माना जाता है. यह संबंध युग–युगांतर तक चलता रहेगा. ईश्वर के मुख्य दो गुण होते हैं- सबका भला और किसी का नुकसान नहीं करना. व्यक्ति ईश्वर को सिर्फ उन परिस्थितियों में याद करता है– जब वह कष्ट में हो या दर्द से पीड़ित हो. चिकित्सा शास्त्र की नीति है मरीज के कष्टों को कम करना और उसके दुखों को कम करना. चिकित्सक का काम भी आपातकालीन परिस्थितियों में कष्टों को कम करना ही है.
कोई भी मरीज चिकित्सक के पास में इमरजेंसी या आपातकालीन परिस्थिति में इसलिए आता है कि अफोर्डेबल तरीके से उसके दर्द का निवारण हो, इसलिए इमरजेंसी सर्विस का व्यवसायीकरण नहीं होना चाहिए. यही व्यवसायीकरण मरीज और चिकित्सक के बीच असंतोष का बड़ा कारण बनता है. जब मरीज और उसके परिजनों की अपेक्षा पूरी नहीं होती, तब क्रोध और हिंसा जन्म लेती है.
भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 62 में भी यही बात भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जब किसी की अपेक्षा पूरी नहीं होगी, क्रोध उत्पन्न होगा –
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।
जब निजी क्षेत्र में आपातकालीन सेवाओं का व्यवसायीकरण नहीं था, हिंसा की घटनाएं सुनने में नहीं आती थीं. चिकित्सा के व्यवसायीकरण का मुख्य कारण है सरकारी संस्थानों में चिकित्सीय सेवाओं की कमी और अस्पष्ट नीति.
सरकारी अस्पतालों में निजी अस्पतालों से वेंटीलेटर पर रेफर हुए मरीज को न भर्ती करना, अपने संस्थान के अलावा प्राइवेट अस्पताल में पैदा होनेवाले नवजात शिशु के लिए नर्सरी उपलब्ध न होना, पहले से पंजीकृत गर्भवती महिला का इमरजेंसी सिजेरियन ऑपरेशन न करना, बीमार मरीज को एक्यूट टर्मिनल केयर के लिए नहीं लेना आदि कई कारण हैं, जिनसे असंतोष पैदा होता है.
सरकारी अस्पतालों में हार्ट अटैक वाले मरीजों के लिए आइसीयू में अक्सर 8 बेड्स होते हैं, बाकी के मरीजों का ज्यादातर इलाज इमरजेंसी विभाग में ही किया जाता है. यदि मरीज के रिश्तेदार इमरजेंसी विभाग में ही इलाज करवाने के लिए तैयार नहीं होते, तो उन्हें दूसरे सरकारी अस्पताल के लिए रेफ़र कर दिया जाता है. वहां भी अक्सर यही हालात होते हैं.
इस समय परिजनों के पास दो विकल्प होते हैं- या तो वह इमरजेंसी विभाग में ही इलाज करवाये या किसी प्राइवेट अस्पताल में जाकर 2-3 लाख रुपये खर्च करे. इस स्थिति में बेचारा डॉक्टर मरीज के परिजनों का कोपभाजन बन जाता है.
दिल्ली में दो बड़े ट्रॉमा सेंटर्स हैं, जहां एक्सीडेंट वाले मरीजों का इमरजेंसी इलाज होता है. केवल ट्रॉमा सेंटर होने की वजह से यहां बेड्स की संख्या पर्याप्त है और ट्रॉमा केसेस में विवाद सुनने में नहीं आता. पर हर राज्य में ट्रॉमा सेंटर न होने के कारण मरीज के रिश्तेदारों और डॉक्टर्स के बीच हिंसा की घटनाएं अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल जाती हैं.
सरकारी संस्थानों की इन नकारात्मक नीतियों के कारण निजी क्षेत्रों ने चिकित्सा सेवाओं को अत्यधिक महंगा करके आम जनता की पहुंच के बाहर कर दिया है. यह सही नहीं है. समय है हम जागें और इमरजेंसी में मरीज और उसके परिजनों का शोषण न होने दें. हमारा कर्तव्य है कि हम डॉक्टर इमरजेंसी चिकित्सा का व्यवसायीकरण न होने दें.
हाल ही में अमेरिका का एक शोध आया है, जिसमें यह देखा गया है कि हॉस्पिटल के नॉन डॉक्टर सीइओ की सैलरी करोड़ों में होती है. उसके अलावा मार्केटिंग डिपार्टमेंट के ऊपर बहुत ज्यादा खर्चा किया जाता है. अगर हम वाकई में अफोर्डेबल हेल्थ केयर चाहते हैं, तो हमें अस्पताल चलाने के लिए बड़े-बड़े सीइओ क्यों चाहिए? क्यों नहीं डॉक्टर अस्पताल चलाते हैं? हमें अस्पताल चलाने के लिए पेशेंट के पीछे क्यों भागना पड़ रहा है.
अगर आपकी नीयत और अस्पताल अच्छा है, तो पेशेंट अपने आप आयेंगे. डॉक्टरों को तो वैसे भी एडवरटाइजिंग और ब्रांडिंग की न आवश्यकता है, न ही उन्हें इसकी अनुमति है. आज समय है कि जब भी मरीज आपातकाल में हमारे पास में दर्द या पीड़ा लेकर आता है, तो हम उसका इलाज फौरन बिना भेदभाव और अफोर्डेबल तरीके से करें और वही काम करें, जिसके लिए हमने डॉक्टर बनना तय किया था.
डॉ याग्नादत्ता रथ
वर्ष 2012 में भुवनेश्वर इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड एसयूम (SUM) हॉस्पिटल से एमबीबीएस कर चुके डॉ रथ को दुर्गम परिस्थिति में जाकर गर्भवती की जान बचाने का श्रेय जाता है.
डॉ रथ ने ओडिशा के कंधमाल जिले में एक आदिवासी महिला की जान ऐसी हालत में बचायी, जब वह महिला स्वयं अस्पताल की ओर बढ़ रही थी, लेकिन दुर्गम रास्तों के कारण उसकी हिम्मत जवाब दे गयी और वह रास्ते में निढाल होकर गिर गयी. इसी बीच अस्पताल और मरीज की दूरी को पाटकर डॉ रथ वहां पहुंचे और मानवता की रक्षा की. उनके इस बहादुरी भरे कार्य के लिए उन्हें आइएमए डॉ सीटी ठाकर अवार्ड (IMA Dr CT Thakar) से नवाजा जा चुका है. आज वे ओडिसा के हेल्थ केयर सिस्टम में एक पोस्टर ब्वॉय बनकर उभरे हैं, जिन्हें स्थानीय लोगों का बेशुमार प्यार व सम्मान मिल रहा है.
डॉ प्रियांजलि दत्ता
24 वर्षीया युवा डॉक्टर प्रियांजलि दत्ता ने स्तन कैंसर को हराने की जिद में आरोग्य संस्था की स्थापना की. आर्मी स्कूल से शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली के इएसआइसी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया.
यहीं से उन्हें लोगों में जागरूकता की कमी का अंदाज़ा हुआ और आरोग्य स्कीम की शुरुआत हुई. इस स्कीम के तहत लोगों में बीमारियों के प्रति जागरूकता का प्रसार करना, उनका इलाज करना और स्तन कैंसर के मरीजों तक प्राथमिक सुविधाएं पहुंचाना है. अपने इस नेक कार्य के लिए उन्होंने 12 स्वयंसेवकों की एक टीम बनायी है, जिसकी मदद से पंजाब, पश्चिम
बंगाल और मेघालय में यह स्कीम संचालित की जाती है. अब तक 1,759 लोगों को सफल उपचार मिल चुका है. डॉ दत्ता खुद सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर महिलाओं के स्वास्थ्य का जायजा लेती हैं.
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