पटना : पिछड़े-मुसलमान साथ देंगे, तभी चलेगा कांग्रेस का फारवर्ड कार्ड

Updated at : 27 Sep 2018 10:02 AM (IST)
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पटना : पिछड़े-मुसलमान साथ देंगे, तभी चलेगा कांग्रेस का फारवर्ड कार्ड

पिछड़े-मुसलमान साथ देंगे, तभी चलेगा कांग्रेस का फारवर्ड कार्ड कांग्रेस ने बिहार में सवर्ण नेताओं को नयी जिम्मेदारी सौंप करभाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की पटना : कांग्रेस ने बिहार में सवर्ण नेताओं को नयी जिम्मेदारी सौंप कर भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की है़ पार्टी ने यह भी […]

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पिछड़े-मुसलमान साथ देंगे, तभी चलेगा कांग्रेस का फारवर्ड कार्ड
कांग्रेस ने बिहार में सवर्ण नेताओं को नयी जिम्मेदारी सौंप करभाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की
पटना : कांग्रेस ने बिहार में सवर्ण नेताओं को नयी जिम्मेदारी सौंप कर भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की है़ पार्टी ने यह भी कहा है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस याचक की भूमिका में नहीं होगी.
पर, बिहार में कांग्रेस का सवर्ण कार्ड इस बार चल पायेगा, लाख टके का यह सवाल है. जानकारों का कहना है कि कांग्रेस का यह सवर्ण कार्ड तभी चल पायेगा, जब उसके साथ पिछड़े और अतिपिछड़े व मुस्लिम वोटरों की ताकत होगी. 2015 के विधानसभा चुनाव के नतीजे इसके गवाह रहे हैं. माना जा रहा है कि प्रदेश में लोकसभा की 40 सीटों पर एनडीए को पटखनी देने की योजना के तहत जो ताना बाना बुना गया है, उसी के तहत सवर्ण नेताओं को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी है.
प्रदेश कांग्रेस में हाल के दिनों में छह बड़ी नियुक्तियां हुई हैं. इनमें एक ब्राह्मण, दो भूमिहार, एक राजपूत, एक मुस्लिम और एक दलित नेता को बड़ी जिम्मेदारी मिली है. प्रदेश कांग्रेस की कमान विधान परिषद के सदस्य मदन मोहन झा को सौंपी गयी है. इनका कार्यकाल 2020 में खत्म हो रहा है. मिथिलांचल में ब्राह्मण मतदाताओं को पार्टी के साथ बांधे रखना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी.
मदन मोहन झा के पिता नागेंद्र झा कांग्रेस के दिग्गज नेता थे. डाॅ जगन्नाथ मिश्र के शासनकाल में नागेंद्र झा का आवास मिथिलांचल की राजनीति का एक प्रमुख केंद्र होता था. कांग्रेस को उम्मीद है कि हाल के दिनों में दिलीप कुमार चौधरी के जदयू में शामिल हो जाने के बाद मदन मोहन झा पुराने जनाधार को बांध पायेंगे. इसी उद्देश्य से प्रेमचंद मिश्रा काे भी इस बार विधान परिषद का सदस्य भी बनाया गया है.
बड़े वर्ग का साथ
विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ आया था. इसे मिथिलांचल की बेनीपट्टी विधानसभा की सीट के जरिये समझा जा सकता है. वहां कांग्रेस की भावना झा को ब्राह्मण मतदाताओं का समर्थन तब मिला जब भाजपा के विनोद नारायण झा उम्मीदवार थे. इसी प्रकार दरभंगा की बेनीपुर सीट पर जदयू के सुनील चौधरी चुनाव जीत गये.
महागठबंधन की ताकत
चंपारण की नरकटियागंज की सीट पर विनय वर्मा की जीत हुई. यहां भी उनकी बिरादरी के उम्मीदवार के मुकाबले कांग्रेस को अधिक वोट मिले. बक्सर की सीट पर कांग्रेस के मुन्ना तिवारी को भाजपा के प्रदीप दुबे के मुकाबले अधिक वोट मिले.
अल्पसंख्यकों पर नजर
डाॅ अशोक कुमार को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने को दलित वोटरों को गोलबंद करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है. डाॅ अशोक पुराने कांग्रेसी माने जाते हैं. डाॅ समीर कुमार सिंह को राजपूत कोटे से कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गयी है. कौकब कादरी के कार्यकारी अध्यक्ष का दर्जा बरकरार रखा गया है.
27 में से 11 हैं सवर्ण विधायक : विस चुनाव परिणाम के मुताबिक कांग्रेस के 27 विधायकों में 11 सवर्ण तबके हैं. इस चुनाव में सवर्णों ने अपने उस उम्मीदवार को भाजपा के मुकाबले अधिक तरजीह दिया जिसे महागठबंधन के टिकट पर चुनाव मैदान में भेजा गया था.
बोले पार्टी के अधिकारी
राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने बिहार के लिए जिन नेताओं का चयन किया है वह बहुत ही अच्छी टीम है. टीम के सभी सदस्य अनुभवी हैं. क्वालिटी लीडरशिप पर ध्यान दिया गया है. सभी लोगों का अपना जनाधार है. किसी के बीच कोई विवाद नहीं है. इसका निश्चित रूप से चुनाव में लाभ होगा.
– डॉ अशोक कुमार, कार्यकारी अध्यक्ष
कांग्रेस जाति की राजनीति नहीं करती. पार्टी को सभी वर्ग का समर्थन मिलता रहा है. इस बार भी मिलेगा. सभी वर्ग में पार्टी का जनाधार है. कभी भी जाति और धर्म की राजनीति कांग्रेस नहीं करती है.
– श्याम सुन्दर सिंह धीरज, कार्यकारी अध्यक्ष
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