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सावधान! भोजन की थाली में घुस रहा जानलेवा कैंसर

Updated at : 24 Sep 2018 8:55 AM (IST)
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सावधान! भोजन की थाली में घुस रहा जानलेवा कैंसर

खुशबूदार और चटकदार खाना धीमा जहर, रसोई में धड़ल्ले से पहुंच रहा घातक केमिकल पटना : हाल ही में देश में दूध के उत्पादन से कहीं ज्यादा दूध की खपत से जुड़ी खबर सामने आयी. इस आधिकारिक रिपोर्ट में बताया गया कि यह सब खतरनाक मिलावट का नतीजा है. इसी संदर्भ में प्रभात खबर ने […]

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खुशबूदार और चटकदार खाना धीमा जहर, रसोई में धड़ल्ले से पहुंच रहा घातक केमिकल
पटना : हाल ही में देश में दूध के उत्पादन से कहीं ज्यादा दूध की खपत से जुड़ी खबर सामने आयी. इस आधिकारिक रिपोर्ट में बताया गया कि यह सब खतरनाक मिलावट का नतीजा है. इसी संदर्भ में प्रभात खबर ने बाजार की पड़ताल की, तो पता चला कि रसोई में यूज किया जाने वाला शायद ही ऐसा कोई पदार्थ हो, जिसकी गुणवत्ता संदिग्ध न हो. सूबे में कैंसर मरीजों की संख्या छह लाख से अधिक हो चुकी है.
सीधे तौर पर रसायनयुक्त खान-पान को कैंसर की वजह बेशक न माना जा सके, लेकिन यह एक सच्चाई है कि रसायन युक्त भोजन कैंसर के विस्तार के लिए जिम्मेदार जरूर है. चिकित्सकों की राय है कि हमारे खाद्य पदार्थों में बढ़ रहे केमिकल की मात्रा हमें कैंसर का शिकार बना रही है. फिलहाल रसोई में खतरनाक रसायन का प्रवेश खतरनाक साबित हो रहा है. खाद्य पदार्थों में कम लागत में अधिक प्रोडक्ट बनाने की कोशिश में खतरनाक केमिकलों की मिलावट की जा रही है.
केमिकल का उपयोग बढ़ा रहा कैंसर!
ये हैं रसोई के खलनायक
लिक्विड फॉर्म में आने वाले एसेंस या रेजिन मिर्च, हल्दी, धनिया, लौंग, दालचीनी, तेजपत्ता सहित सभी मसालों के आते हैं. कीमत है लगभग 1200 रुपये किलो. एक किलो रेजिन से 50 किलो घटिया मसाला शुद्ध मसाले की तरह खुशबू और तीखापन देता है. रेजिन दो तरह के आते हैं, ऑयल बेस्ड और वाटर बेस्ड. ऑयल बेस्ड ज्यादा देर तक टिका रहता है, जबकि वाटर बेस्ड का असर कम समयावधि के लिए होता है.
जानिए मसालों की नकली खुशबू का सच
तीखे और सुगंधित मसाले स्वास्थ्य के लिए धीमे जहर का काम कर रहे हैं. बाजार में ऐसे रेजिन, अर्क और एसेंस आ गये हैं, जो मसालों को नकली खुशबू से महका देते हैं. उसे चटकदार बना देते हैं. यह खुशबू मसालों से उठने वाली नेचुरल खुशबू से मिलती-जुलती है.
मिलावट की पहचान
रेजिन मिले मसाले की पहचान यह है कि इसे जुबान में रखते ही पूरा मुंह तीखा या कड़वा हो जाता है. असली मिर्च या दालचीनी, जैसे मसाले जुबान को तीखा करते हैं, न कि पूरे मुंह को. हल्दी में पिसे हुए चावल का आटा मिलाया जाता है, जिसे पीला करने के लिए लेड क्रोमेड रंग को धड़ल्ले से मिलाया जा रहा है.
धनिया में लकड़ी का बुरादा और चावल का भूसी मिलाया जाता है. खास बात यह है कि जांच में भी इसे नहीं पकड़ा जा सकता, क्योंकि मक्का और भूसी दोनों ही खाने योग्य वस्तुओं की फेहरिस्त में आते हैं. मिलावटी मसालों के पैकेट पर किसी ब्रांड का नाम नहीं लिखा होता है. इनकी कीमत कम होती है. यह छोटे पैकेटों में दिया जाता है, ताकि जल्द खत्म हो.
फल और सब्जियां भी अछूती नहीं
बाजार में फल और सब्जियाें में खतरनाक रसायनों का उपयोग किया जा रहा है. सब्जी के आकार को जल्दी बड़ा करने के लिए दवा का प्रयोग होता है.
बासी सब्जियों को मेलाथियाॅन के घोल में 10 मिनट तक डाला जाता है, ताकि सब्जी 24 घंटे तक ताजा दिखे. इसका प्रयोग भिंडी, गोभी, मिर्च, लौकी, पत्ता गोभी में होता है. परवल, तुरई, लौकी, भिंडी आदि को ताजा बनाये रखने के लिए इन्हें रासायन युक्त पानी से धोते हैं. इससे सब्जी दिखने में अधिक ताजा और हरी-भरी दिखाई देती है. कुछ लोग तो रासायनिक रंग भी इस्तेमाल करते हैं.
खुले मसाले न खरीदें. नमक पर विशेष ध्यान देने की बात यह है कि वह आयोडिन युक्त हो. जहां तक संभव हो ब्रांडेड तेल का प्रयोग करें. बिना रंग वाली मिठाई का सेवन करें. मेटानिल यानी चंपई रंग वाले लड्डू को खाने से परहेज करें. इसके लगातार सेवन से कैंसर की प्रबल आशंका रहती है. सब्जी धोकर इस्तेमाल करें. मसाला मिलावटी है, तो इसकी शिकायत कार्यालय में की जा सकती है.
—डॉ महेंद्र प्रताप सिंह, खाद्य विश्लेषक
रसायनयुक्त सब्जियों को खाने से फेफड़ों में इन्फेक्शन, अल्सर, कैंसर और एलर्जी जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं. रसायनों की सहायता से संरक्षित की हुई बेमौसम की सब्जियां पथरी, अल्सर, डायबिटीज, थायराॅइड, पाइल्स आदि बीमारियों को जन्म दे रहीं हैं.
—डॉ अमित कुमार, डायबिटीज विशेषज्ञ
कृत्रिम दूध से पूरी की जा रही मांग
जिले में लगभग चालीस लाख मीट्रिक टन दूध का उत्पादन किया जाता है. यह जरूरत या मांग का करीब पचास फीसदी है. गर्मियों में यह आपूर्ति 25 फीसदी तक सिमट जाती है. पटना रेलवे जंक्शन के पास स्थित दूध मंडी में अकेले 50 हजार मीट्रिक टन पनीर का उत्पादन किया जाता है. इतने पनीर में करीब आपूर्ति का पचास फीसदी खर्च हो जाता है.
बात साफ है कि मिलावट या कृत्रिम दूध के जरिये मांग की आपूर्ति की जा रही है. राजधानी में दूध व संबंधित वस्तुओं का उत्पादन सीधे गाय व भैंस के अलावा कानपुर, सहारनपुर व अन्य जगहों से आये पाउडर के पैकेट से किया जाता है. पैक्ड पाउडर में मेलामिन नाम का खतरनाक केमिकल पाया जाता है. जानकारी के अनुसार यह केमिकल चाइना से अाता है, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसान वाला है.
खाद्य तेल
विभागीय सूत्रों के मुताबिक इन दिनों विभिन्न ब्रांड के सरसों तेल में मिलावट की जा रही है. इस तेल में सस्ता पाम आयल, पामोलिन के अलावा रंग व झाग के लिए खतरनाक केमिकल मिलाये जा रहे हैं. इससे आयोडिन वैल्यू 111 और रंग मिलाने से सैप वैल्यू बढ़ जाता है.
घी
घी में वनस्पति ऑयल मसलन सीसम ऑयल का प्रयोग किया जाता है. कई बार इसमें रिफाइन ऑयल भी मिला दिया जाता है. इससे घी का रैम वैल्यू 28 से बढ़ जाता है. आज कल घी में गंध के लिए भी बाहर से केमिकल मिलाये जा रहे हैं.
रिफाइन ऑयल
रिफाइन ऑयल में रंग-गंध के लिए कई तरह के केमिकल मिलाया जा रहा है. जिससे इसका आयोडिन वैल्यू 120 से 142 के बीच में नहीं रहता है. इसके अलावा इसके एसिड वैल्यू और सैप वैल्यू में भी अंतर आने लगाता है.
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