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पटना : पैसा बहाने की सालाना रस्म बनी है नाला उड़ाही

Updated at : 03 Jul 2018 8:39 AM (IST)
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पटना : पैसा बहाने की सालाना रस्म बनी है नाला उड़ाही

प्रभात रंजन पानी निकासी में लगे पंप सेटों को डीजल से चलाने में खर्च होते हैं बीस लाख से अधिक पटना : शहर में नाला उड़ाही पैसा कमाई का जरिया बन गयी है. हर साल बरसात से पहले इस काम में औसतन चार से पांच करोड़ और पिछले चार साल में 18 करोड़ से अधिक […]

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प्रभात रंजन
पानी निकासी में लगे पंप सेटों को डीजल से चलाने में खर्च होते हैं बीस लाख से अधिक
पटना : शहर में नाला उड़ाही पैसा कमाई का जरिया बन गयी है. हर साल बरसात से पहले इस काम में औसतन चार से पांच करोड़ और पिछले चार साल में 18 करोड़ से अधिक खर्च हो चुके हैं. इसके बावजूद यह काम हर साल होता है. साफ है कि नाला उड़ाही में जानबूझ कर कसर छोड़ दी जाती है. इसके अलावा जल जमाव की निकासी के लिए शहर के विभिन्न इलाकों में करीब 70 से अधिक डीजल पंप चलते हैं. इनके संचालन में 20 लाख से अधिक खर्च हो जाते हैं.
रस्म अदायगी का ताजा उदाहरण :
इस साल कहा गया कि जून माह के दूसरे सप्ताह तक 80 प्रतिशत नालों की उड़ाही कर दी गयी है. इस कार्य पर करीब पौने चार करोड़ खर्च भी हो गये. जबकि जमीन हकीकत के मुताबिक नाले की 10 प्रतिशत भी सफाई नहीं की गयी थी.
शहर में 10 से 12 हजार हेक्टेयर मीटर का जलजमाव : पटना शहर में जलजमाव विकराल समस्या है. शहर का क्षेत्रफल करीब 25 हजार हेक्टेयर है. एक्सपर्ट के मुताबिक 1200 मिमी की औसत बारिश में शहर में करीब बारह हजार हेक्टेयर मीटर जल जमाव हो सकता है. इसमें करीब एक हजार हेक्टेयर मीटर पानी माॅनसून सत्र में भू-जल में तब्दील हो पाता है. शेष पानी नालों के जरिये नदी में या शहर में ही जमा रह जाता है जिससे स्थानीय लोगों को परेशानी होती है.
एक तिहाई हिस्सा पानी ही एक हफ्ते में निकाल पाते हैं
शहर में जमा इस जल संग्रह का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही सौ डीजल पंप मिल कर एक हफ्ते में निकाल पाते हैं. क्योंकि एक डीजल पंप सेट की क्षमता 24 घंटे में 150-200 हेक्टेयर मीटर पानी निकालने की होती है.
इतनी निकासी भी तभी संभव हो पाती है, जब पानी निकासी की जगह पर ढाल हो. अगर 70 डीजल पंप सेट अगर राउंड द क्लॉक चले तो दस हजार हेक्टेयर पानी को निकालने में आठ से दस दिन से अधिक का समय लगेगा. पिछले वर्षों में बमुश्किल से ढाई से तीन हजार हेक्टेयर मीटर पानी ही निकाला जा सका है. डीजल पंप वहीं चलते हैं, जहां संप हाउस नहीं है.
करीब तीन हजार हेक्टेयर से अधिक पानी संप हाउस से निकलता है. शेष पानी बरसात के पूरे दाे माह अपने आप निकलता है या वाष्पीकरण में तब्दील हो जाता है. हर साल निकाले जाने वाला पानी शहर में रह जाये तो निचला हिस्सा दलदल में तब्दील हो जाये. हालांकि निगम के पास जल निकासी का अपना आंकड़ा नहीं है. ऐसा वह सुनियोजित तरीके से करता है.
मिसिंग नाले अब तक नहीं हो सके दुरुस्त
गंगा में ही बहाया जा सकता है बारिश का पानी : पुनपुन नदी शहर के पूरबी छोर पर है. उसके पानी का बहाव भी शहर की तरफ है. इसलिए पानी निकासी दूसरी दिशा में संभव नहीं हो पाती. केवल गंगा नदी में निकासी संभव है, उसकी भी अपनी क्षमता है.
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