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बिहार कांग्रेस का बड़ा प्लान, RJD के अंदर सियासी सेंधमारी की तैयारी में जुटी है पार्टी, जानें पूरी बात

Updated at : 02 Feb 2018 2:31 PM (IST)
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बिहार कांग्रेस का बड़ा प्लान, RJD के अंदर सियासी सेंधमारी की तैयारी में जुटी है पार्टी, जानें पूरी बात

पटना : राजस्थान के उपचुनाव में कांग्रेस को मिली जीत का असर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में दिखा. कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी और उनके समर्थक गुरुवार को राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की तस्वीर को मिठाई खिलाते नजर आये. होली से पहले ही सदाकत आश्रम में होली नजर आने लगी. कौकब कादरी के नेतृत्व […]

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पटना : राजस्थान के उपचुनाव में कांग्रेस को मिली जीत का असर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में दिखा. कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी और उनके समर्थक गुरुवार को राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की तस्वीर को मिठाई खिलाते नजर आये. होली से पहले ही सदाकत आश्रम में होली नजर आने लगी. कौकब कादरी के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी की बड़ी सी तस्वीर के साथ जीत को सेलिब्रेट किया और एक दूसरे को मिठाइयां भी खिलायी. उधर, बिहार में आमंत्रण यात्रा की तैयारी में जुटी कांग्रेस के अंदर से खबर मिल रही है कि पार्टी इस यात्रा के बहाने अपने पुराने कांग्रेसी नेताओं को हर दल से खींचकर बाहर लाने और दोबारा कांग्रेस में शामिल कराने के प्रयास में जी-जान से लग गयी है. पार्टी सूत्रों की मानें, तो यात्रा से पहले ही कई पुराने कांग्रेसी नेताओं से संपर्क साधा जा रहा है और उन्हें यात्रा के दौरान पार्टी में शामिल किया जायेगा. वहीं एक पुराने कांग्रेसी नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कांग्रेस की निगाहें, अपनी ही सहयोगी पार्टी राजद पर ज्यादा टिकी हुई है, क्योंकि राजद में उन्हें असंतुष्ट नेताओं की फौज नजर आ रही है.

बिहार प्रदेश कांग्रेस के नेता आमंत्रण यात्रा के जरिये पुराने कांग्रेसियों से संपर्क कर उनके सामने घर वापसी का प्रस्ताव रखेंगे. हालांकि, यह भी तय है कि कांग्रेस ने अभी ये स्पष्ट तो नहीं किया है कि उसकी नजर किन नेताओं पर है. नजर घुमाकर देंखे, तो जदयू नेता और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष विजय चौधरी भी पुराने कांग्रेसी हैं, लेकिन कहा जा रहा है कि जदयू के नेता कहीं नहीं जाने वाले कांग्रेस की नजर राजद के उन नेताओं पर है, जो लालू के जेल जाने के बाद तेजस्वी के नेतृत्व में असहज महसूस करते हैं या फिर कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा पारिवारिक पार्टी होने के चलते घुटन महसूस कर रहे हों. इन नेताओं के जरिये कांग्रेस भले ही कोई बड़ा काम न कर सके, लेकिनजबचुनाव के वक्त सीटों पर बंटवारे का समयआयेगा,तोकम से कम उसकी हालत यूपी जैसी तो नहीं होगी, जब उसे समाजवादी पार्टी की कृपा का मोहताज रहना पड़ा था. कांग्रेस चाहती है कि वह किसी की कृपा की मोहताज नहींबनी रहे और वह अपने पैरों पर खड़ी हो. राजनीतिक जानकारों की मानें, तो बिहार विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को प्रसाद में जो भी मिला वो भी तो नीतीश कुमार की कृपा से ही हासिल हुआ था.

कांग्रेस की राजनीति को नजदीक से समझने वाले जानकार मानते हैं कि लालू यादव के चारा घोटाले में जेल जाने के बाद राजद पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. हाल में पार्टी के जनरल सेक्रेटरी अशोक सिन्हा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. अपने इस्तीफे के बाद अशोक सिन्हा ने मीडिया को बताया कि वह पार्टी की कमान संभालने वाले तेजस्वी यादव की कार्यशैली से नाखुश हैं. कांग्रेस अशोक सिन्हा के उस बयान में अपना फायदा देख रही है, जिसमें उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में आरजेडी अप्रासंगिक हो गयी है इसलिए बेहतर है कि समय बर्बाद करने की जगह पार्टी छोड़ दी जाये. तेजस्वी यादव लालू जी की तरह पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकते. कांग्रेस को पता है कि राजद के अंदर उपजी कलह को तेजस्वी खत्म नहीं कर पायेंगे और उनके सामने बिहार में पार्टी के परंपरागत वोट को साथ बनाये रखने के साथ पुराने राजद नेताओं को संभाल पाना भी मुश्किल है. यदि इस बीच वह राजद के अंदर आमंत्रण यात्रा के बहाने ही सही पुराने नेताओं को कांग्रेस में लौटने का प्रस्ताव दे, तो वह तुरंत स्वीकार कर लेंगे.

उधर, राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कांग्रेस के सामने राजद के असंतुष्ट नेताओं पर नजर गड़ाने के अलावा और कोई चारा नहीं है. भाजपा और जदयू के नेता पहले ही कांग्रेस से अलर्ट हैं, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में दो गुट बन जाने की वजह से आमंत्रण यात्रा की सफलता परप्रश्न चिह्न लगा हुआ है. जानकार मानते हैं कि पूर्व शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी को अध्यक्ष पद से हटाये जाने के बाद पार्टी दो फाड़ में बंटी हुई है. अशोक चौधरी का गुट अलग है और वह अपने हिसाब से अपना फैसला लेते हैं. जदयू के प्रदेश अध्यक्ष की ओर से आयोजित दही-चूड़ा भोज में शामिल होकर और नीतीश कुमार के पक्ष में कई बार बयान देकर अशोक चौधरी ने यह जता दिया है कि वह कांग्रेस की जदयू से दूरी बनाये रखने वाली नीति के पक्ष में नहीं हैं. इन परिस्थितियों के बाद कांग्रेस के बाद सिवाय राजद के असंतुष्ट नेताओं पर निगाह डालने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है.

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