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3 जनवरी बिहार की सियासत के लिए बड़ा दिन, लालू की सजा अवधि का भी होगा एलान

Updated at : 02 Jan 2018 3:15 PM (IST)
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3 जनवरी बिहार की सियासत के लिए बड़ा दिन, लालू की सजा अवधि का भी होगा एलान

पटना : पूरे देश की सियासत चाहे जिस करवट बैठे लेकिन तीन जनवरी 2018 को बिहार की सियासत में कुछ बदलाव देखने को जरूर मिलेगा. जी हां, सबकी निगाहें लालू को लेकर कोर्ट के फैसले और सजा की अवधि पर टिकी हुई है. क्या होगा ? कितनी सजा होगी ? बिहार में राजद का क्या […]

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पटना : पूरे देश की सियासत चाहे जिस करवट बैठे लेकिन तीन जनवरी 2018 को बिहार की सियासत में कुछ बदलाव देखने को जरूर मिलेगा. जी हां, सबकी निगाहें लालू को लेकर कोर्ट के फैसले और सजा की अवधि पर टिकी हुई है. क्या होगा ? कितनी सजा होगी ? बिहार में राजद का क्या होगा ? क्या बिहार में पार्टी को संभाल पायेंगे तेजस्वी और तेज प्रताप ? बेनामी संपत्ति के आरोपों से दो-चार हो रहे परिवार पर लालू का खुलकर आशीर्वाद नहीं रहेगा. झारखंड में जेल है और वहां भाजपा की सरकार है, इसलिए लालू से मुलाकात में भी परेशानी हो रही है. यह तमाम सवाल पार्टी के साथ बिहार की राजनीतिक गलियारों में गूंज रहे हैं. एनडीए के नेताओं का अभी से लालू परिवार पर हमला जारी है. पार्टी में टूट फूट की संभावनाओं को लेकर जदयू के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ नेता आरसीपी सिंह पहले ही बड़ा बयान दिया है.

पार्टी के अंदर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि लालू यादव को ज्यादा समय के लिए सजा होती है, तो क्या उनके दोनों बेटे बिहार में पार्टी को बचा पायेंगे. लालू का अपना एक अलग अंदाज है और पार्टी को हांकने का अलग तरीका है. लालू के बगैर पार्टी को संभालने और साथ ही असंतुष्टों को एकजुट रखने की चुनौती बहुत बड़ी होगी और इससे निबटना भी आसान नहीं होगा. उधर, सजा से पहले राजद नेता शिवानंद तिवारी ने कहा है कि लालू को बार-बार इसलिए तंग किया जा रहा है कि लालू यादव हैं, लालू मिश्रा नहीं. लगभग बीस वर्षों बाद राजद फिर उसी दोराहे पर खड़ा है. लालू ने राजनीति में भी परिवार को हमेशा सर्वोपरि रखा है. लालू ने इससे पहले भी चारा घोटाला में लालू प्रसाद के जेल जाने की नौबत आने के बाद मुख्यमंत्री का ताज राबड़ी देवी को सौंप दिया था. हालांकि, उस समय भी पार्टी में कई सारे योग्य नेता थे और उन्होंने लालू की राजनीतिक आभा के सामने अपने को नतमस्तक कर लिया.

राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें, तो अब वक्त के साथ राजनीति और उसका मिजाज भी बदला है. राजनेताओं में पद को लेकर एक अलग तरह की चेतना आयी है. तेजस्वी यादव ने हाल में लालू के सामने कई बार सार्वजनिक मंच पर अपने राजनीतिक कौशल को साबित किया है, लेकिन यह समझना होगा कि तेजस्वी यादव लालू नहीं बल्कि उनके बेटे हैं. वरिष्ठ पत्रकार और बिहार की राजनीति को नजदीक से समझने वाले प्रमोद दत्त कहते हैं कि पार्टी के अंदर असंतुष्टों को संभालना तेजस्वी के बस की बात नहीं होगी. तेजस्वी और तेज प्रताप पूरी पार्टी और प्रदेश स्तर के नेताओं को संभालने में कामयाब होंगे, यह संभव नहीं दिखता है.

कुछ महीने पूर्व राजद की राजगीर में आयोजित कार्यकारिणी की बैठक में लालू ने मंच से यह कहकर सबको एक संदेश जरूर दे दिया था कि उनकी राजनीतिक विरासत के मुखिया तेजस्वी यादव ही होंगे. पार्टी के अंदर उसके बाद से ही चर्चाओं का दौर शुरू हुआ, लेकिन लालू के निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद उस पर विराम लग गया. उस बैठक के बाद से तेजस्वी ने कई जगहों का अकेले दौरा किया और फ्रंट फूट पर आकर मीडिया में बयान देने लगे और विरोधियों से अपना बचाव करने भी लगे. सियासी जानकार मानते हैं कि विरोधियों से लड़ने के लिए सिर्फ इतना भर ही काफी नहीं है, इसके लिए तेजस्वी यादव को लालू यादव की तरह अक्रामक राजनीति करनी होगी और इस तरह की राजनीति के लिए जातिगत समीकरणों के अलावा राष्ट्रीय मुद्दों पर कुछ बोलने में भी माहिर होना जरूरी है.

अब राजद के अलावा बिहार के बाकी राजनीतिक दलों की निगाहें लालू परिवार पर टिकी रहेंगी. खासकर बड़ी बेटी मीसा भारती, तेजस्वी यादव और तेज प्रताप की ओर पूरी पार्टी आशा भरी निगाहों से देखेगी. कुछ लोगों का मानना है कि लालू के पास आज भी उनके चाहने वालों की एक खास जमात है, जो इस घड़ी में तेजस्वी और तेज प्रताप के साथ डंटकर खड़ी रहेगी. साथ ही, लोग तेजस्वी यादव की काबिलियत भी परखेंगे, क्योंकि पहली बार पार्टी की कमान बिना लालू के तेजस्वी के हाथों में होगी.

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