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झूठे शपथपत्र मामले में तेज प्रताप के खिलाफ मुकदमा, सदस्यता समाप्त करने और सात साल तक की सजा का है प्रावधान

Updated at : 13 Sep 2017 5:15 PM (IST)
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झूठे शपथपत्र मामले में तेज प्रताप के खिलाफ मुकदमा, सदस्यता समाप्त करने और सात साल तक की सजा का है प्रावधान

पटना : राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव द्वारा औरंगाबाद में 53 लाख 34 हजार में खरीदी गयी 45.24 डिसमिल जमीन का विवरण 2015 में चुनाव आयोग को दिये गये शपथपत्र में छिपाने और जनता को धोखा देने के आरोप में भाजपा के विधान पार्षद सूरजनंदन […]

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पटना : राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव द्वारा औरंगाबाद में 53 लाख 34 हजार में खरीदी गयी 45.24 डिसमिल जमीन का विवरण 2015 में चुनाव आयोग को दिये गये शपथपत्र में छिपाने और जनता को धोखा देने के आरोप में भाजपा के विधान पार्षद सूरजनंदन प्रसाद ने लगाया है. साथ ही उन्होंने पटना के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में मुकदमा संख्या 3838(सी)/2017 दर्ज करा कर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-125 (ए) और आईपीसी की धारा-193 के अंतर्गत संज्ञान लेने और राजद विधायक के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर कोर्ट में उपस्थित कराने व सुनवाई प्रारंभ कर उन्हें कड़ी से कड़ी सजा देने का निवेदन किया है. इस मामले में भाजपा विधायक अरुण कुमार सिन्हा और सुमन कुमार झा गवाह हैं.

भाजपा विधान पार्षद ने की शिकायत

भाजपा विधान पार्षद सूरजनंदन प्रसाद ने अपनी शिकायत में कहा है कि महुआ (वैशाली) के राजद विधायक तेज प्रताप यादव ने औरंगाबाद में 16 जनवरी, 2010 को सात लोगों से अलग-अलग डीड के जरिये आईआईसीआई, बैंक की कनॉट प्लेस, नयी दिल्ली ब्रांच के चेक से 53 लाख 34 हजार रुपये का भुगतान कर 45.24 डिसमिल जमीन खरीदा, लेकिन वर्ष 2015 में चुनाव आयोग को दिये गये संपत्ति के ब्योरा में जान-बूझ कर इस संपत्ति को छिपा लिया. जबकि, इस जमीन पर फिलहाल लारा डिस्ट्रीब्यूटर्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से बाइक का शो रूम चल रहा है. दरअसल, जान-बूझ कर संपत्ति के ब्योरे को छिपाना न केवल चुनाव आयोग को धोखा देना है, बल्कि लोक प्रतिनिधित्व की धारा-125 (ए) का भी उल्लंघन है.

क्या है सजा का प्रावधान

लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-125 (ए) के अंतर्गत जान-बूझ कर तथ्य छिपाने व झूठे शपथपत्र दाखिल करने पर सदस्यता समाप्त की जा सकती है. वहीं, आईपीसी की धारा-193 के अंतर्गत सात साल तक की सजा का प्रावधान है.

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