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बिहार की वर्तमान राजनीति में कांग्रेस बनी ‘लूजर’, सत्ता से हुई बेदखल, सपने चकनाचूर

Updated at : 27 Jul 2017 2:51 PM (IST)
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बिहार की वर्तमान राजनीति में कांग्रेस बनी ‘लूजर’, सत्ता से हुई बेदखल, सपने चकनाचूर

आशुतोष कुमार पांडेय @ पटना पटना : बिहारके ताजा राजनीतिक हालात के आईने में सियासी विशेषज्ञ कांग्रेस को खोज रहे हैं. महागठबंधन में मचे बवाल के बीच से बहुमत की लकीर खींचते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोबारा सत्ता तक पहुंच गये. नीतीश ने स्वयं मीडिया को बताया कि इस बीच उन्होंने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं […]

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आशुतोष कुमार पांडेय @ पटना

पटना : बिहारके ताजा राजनीतिक हालात के आईने में सियासी विशेषज्ञ कांग्रेस को खोज रहे हैं. महागठबंधन में मचे बवाल के बीच से बहुमत की लकीर खींचते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोबारा सत्ता तक पहुंच गये. नीतीश ने स्वयं मीडिया को बताया कि इस बीच उन्होंने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की और यह आस लगायी कि कहीं मामला सलट जाये, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. महागठबंधन में हुए बिखराव को राजद के एक विधायक ने लालू का पुत्र मोह करार दिया, वहीं जानकारों की मानें तो कांग्रेस का मौन बनकर रहना भी महागठबंधन में पलीता लगा गया. अब अगर आंकड़ों की तस्वीर को टटोला जाये, तो बिहार में एनडीए के सहयोग से सरकार बनने के बाद देश की कुल आबादी के करीब 67 फीसदी पर भाजपा ने सहयोगियों के साथ कब्जा जमा लिया है. बिहार में सत्तासीन होने के बाद भाजपा के नेता स्पष्ट कहते हैं कि यह कांग्रेस मुक्त भारत की ओर बढ़ता पार्टी का एक और कदम है.

कांग्रेस का स्टैंड सिफर

बिहार में हुए सत्ता परिवर्तन और नीतीश कुमार की नीति पर तंज कसते हुए बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी ने मीडिया से कहा कि हम महागठबंधन में एक जगह पर इकट्ठा हुए थे, देश में आरएसएस औरभाजपा को रोकने के लिए, लेकिन इस मुहिम के बीच से ही नीतीश जी निकल पड़े. कांग्रेस नेता ने अपने बयान में स्वयं को सबसे बड़ा ‘लूजर’ बताते हुए कहा कि सही मायने में यह आनेवाला वक्त तय करेगा कि ‘विनर’ कौन है और लूजर कौन है. बिहार में नीतीश के अचानक लिए गये इस फैसले से यदि किसी की जमीनखिसक गयी है, तो वह कांग्रेस है, मात्र 14 से 16 घंटे के अंदर ही नीतीश ने छठी बार मुख्यमंत्री की शपथ ले ली. राजद नेता की तात्कालिक टिप्पणी को देखें, तो वह कहते हैं कि नीतीश हे राम से अचानक जय श्री राम का नारा लगाने लगे.

बिहार में कांग्रेस की जमीन

सबसे पहले बिहार में कांग्रेस की उर्वर हुई जमीन को देखें, तो यह पहला मौका था, जब कांग्रेस जैसे-तैसे बिहार में खड़ी हो पायी थी. बाकी देश में जो पार्टी का हाल है, वह किसी से छुपा हुआ नहीं है. महागठबंधन टूटने का सबसे बड़ा असर कांग्रेस पर पड़ा है. पार्टी पूरी तरह से सत्ता से बेदखल हो गयी है. भाजपा के घुसपैठ से कांग्रेस को होने वाला नुकसान भी डबल हो गया है. राजनीतिक पंडित कहते हैं कि यह महागठबंधन ही है जिसके बूते कांग्रेस बिहार में जैसे तैसे खड़ी हो गयी थी. बाकी देश का जो हाल है, वह तो सबके सामने है. अब महागठबंधन टूटने का पहला असर, तो यही होगा कि कांग्रेस राज्य की सत्ता से पूरी तरह बेदखल हो जायेगी. इससे पूर्व, राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार चुनने की चूक और जीएसटी मुद्दे पर विपक्ष को, खासकर नीतीश को अपने पाले में नहीं करने का मलाल कांग्रेस को जरूर रहेगा. जानकार मानते हैं कि अब कोई फायदा नहीं है. कांग्रेस ने बिहार के मामले में भी अपने रोल को नहीं निभाया और देर कर दी.

नीतीश ने की थी कोशिश

हाल में नीतीश कुमार ने उपराष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष के उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी पर अपनी सहमति जाहिर की थी, उसके बाद सोनिया गांधी ने नीतीश को फोन कर धन्यवाद कहा था. लोगों ने इस समर्थन के अलग-अलग मायने निकाले. नीतीश नेनयीदिल्ली में जाकर सोनिया और राहुल से मुलाकात भी की, इंतजार करते रहे, लेकिन कांग्रेस की ओर से कोई पहल नहीं की गयी. प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी कहते हैं कि मैंडेट महागठबंधन को मिला था, लेकिन वह भाजपा के साथ चले गये, यह जनता अब तय करेगी. चौधरी ने कहा कि सबकुछ पहले से फिक्स था. अचानक भाजपा के संसदीय बोर्ड का बैठक होना, पटना में राज्यपाल का पहुंचना, रातों-रात समर्थन की बात होना, यह क्या दर्शाता है.

भगवान भरोसे रही पार्टी

जानकारों की मानें तो कांग्रेस यह चाहती थी कि तेजस्वी का मुद्दास्वयं बहुत जल्द शांत हो जायेगा और महागठबंधन यूं ही चलता रहेगा. कांग्रेस नेतृत्व नीतीश को खुश रखने के साथ लालू को भी नाराज नहीं करना चाहता था. कांग्रेस को यह पता था कि नीतीश विपक्ष की एकता की मजबूत कड़ी हैं और पिछड़े,मुस्लिम और दलित वोटों का सपोर्ट लालू को ताकतवर बनाता है. कांग्रेस बिहार की राजनीति में सेफ गेम खेल रही थी. वह आज भी फ्रंट फुट पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है. कांग्रेस को मालूम था बस राजद और जदयू का रिश्ता बरकरार रहे और वह सत्ता पर काबिज रहे. इसी के सहारे आगामी लोकसभा चुनाव में राजद-जदयू के साथ मिलकर विपक्ष के रूप में एक बड़ी कड़ी का निर्माण हो, जिसमें कांग्रेस आगे रहे, लेकिन नीतीश के कदम ने कांग्रेस के सपने को चकनाचूर कर दिया है.

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