पटना हाइकोर्ट का फैसला : भागलपुर दंगे का आरोपित कामेश्वर यादव हुआ बरी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 30 Jun 2017 6:55 AM
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पटना : पटना हाइकोर्ट ने भागलपुर दंगे के आरोपित कामेश्वर यादव को बरी कर दिया है. जस्टिस अश्विनी कुमार सिंह की एकलपीठ ने दो जजों के खंडित निर्णय के बाद गुरुवार को तीसरे जज के रूप में कामेश्वर यादव को निर्दोष ठहराते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को निरस्त कर दिया. कामेश्वर प्रसाद यादव ने […]
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पटना : पटना हाइकोर्ट ने भागलपुर दंगे के आरोपित कामेश्वर यादव को बरी कर दिया है. जस्टिस अश्विनी कुमार सिंह की एकलपीठ ने दो जजों के खंडित निर्णय के बाद गुरुवार को तीसरे जज के रूप में कामेश्वर यादव को निर्दोष ठहराते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को निरस्त कर दिया. कामेश्वर प्रसाद यादव ने सश्रम उम्रकैद की सजा देने के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट में क्रीमिनल अपील दायर की थी. 2009 में इस याचिका पर सुनवाई शुरू हुई. दो जजों की खंंडपीठ में से एक जस्टिस धरणीधर झा ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया. वहीं, इसी खंडपीठ के दूसरे जज जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कामेश्वर यादव को मिली सश्रम उम्रकैद की सजा को सही मानते हुए इसे जारी रखने का आदेश दिया था.
हाइकोर्ट ने खंडित फैसले के बाद तीसरे जज जस्टिस अश्विनी कुमार सिंह के कोर्ट में इसकी सुनवाई निर्धारित की. लंबी सुनवाई के बाद जस्टिस सिंह ने कामेश्वर यादव की अपील याचिका को स्वीकार कर उन्हें बरी करते हुए भागलपुर की निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया. कामेश्वर प्रसाद यादव पर आरोप था कि वह भागलपुर दंगे में दो सौ लोगों के साथ 24 अक्तूबर , 1989 के दिन बम फोड़ते हुए इंफॉर्मेंट नसीरुद्दीन के घर आये और गोली चलाते हुए इंफॉर्मेंट के 15 वर्ष के बेटे कयामुद्दीन को लेकर चले गये. बाद में कयामुद्दीन की हत्या हुई और उसे गोली मारने के बाद कहीं फेंक दिया गया.
पुलिस के अनुसार पहले इन्वेस्टिगेशन के बाद इस अपराध के लिए कामेश्वर यादव को छोड़ दिया गया. लेकिन, तीन महीने बाद सात फरवरी, 1990 को उनके खिलाफ फिर एफआइआर दायर की गयी. भागलपुर एसपी ने नसीरुद्दीन के बयान पर भागलपुर के ततारपुर (कोतवाली) थाने में प्राथमीकी दर्ज की.
अपने फैसले में जस्टिस अश्विनी कुमार सिंह ने ऑब्जर्वेशन दिया कि कथित दूसरी एफआइआर घटना के तीन महीने 13 दिन बाद एसपी के सामने दायर हुई. उसके लिए कोई भी विश्वसनीय स्पष्टीकरण पुलिस और प्रॉसक्यिूशन द्वारा नहीं दिया गया. शुरुआती पुलिस रिपोर्ट मिलने के 16 वर्ष बाद इस केस की तहकीकात शुरू हुई. बहुत सारे खास गवाहों को वापस कर लिया गया. प्रॉसक्यिूशन विश्वसनीय सबूत नहीं दे पाया.
न्यायमूर्ति श्री सिंह ने फैसले में यह भी कहा कि यहां तक डीआइजी, पुलिस, जिसने इस केस का पर्यवेक्षण किया, उसने केस डायरी में माना कि घटनास्थल, जहां कथित अपराध हुआ था, उसका कोई जिक्र नहीं किया गया. न्यायमूर्ति सिंह ने आगे फैसले में लिखा कि इन्वेस्टिगेशन अफसर ने केस ट्रायल के दौरान यह माना कि उसने सभी गवाहों की गवाही एक दिन में ही ले ली थी और इसके अलावा प्रॉसक्यिूशन के एक और गवाह ने माना कि गवाही कहां रेकॉर्ड की गयी, उस जगह का नाम अंकित नहीं है.
जस्टिस श्री सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह समय सिद्ध है कि दोषी को छोड़ देना बेहतर है, किसी निर्दोष को सजा देने से. इस केस में अभियोग सिद्ध करने में प्रॉसक्यिूशन पीछे रह गया, इसलिए शक के बिना पर कामेश्वर प्रसाद यादव को बरी किया जाता है.
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