अब पर्व पर बाजार से लाते हैं गन्ना

Updated at : 09 Nov 2016 8:13 AM (IST)
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अब पर्व पर बाजार से लाते हैं गन्ना

वारिसलीगंज में दर्जनों एकड़ में ईख की उपज पैदा करनेवाले किसान कट्ठों में सिमटे वारिसलीगंज : ईख की पटी रहनेवाली वारिसलीगंज इलाके की भूमि को अब ईख का पतुहल भी मयस्सर नहीं है. ईख की हरियाली ने किसानों के जीवन में ऐसा रंग पिरोया था कि इन्हें कभी आर्थिक तौर पर मुश्किलों का सामना नहीं […]

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वारिसलीगंज में दर्जनों एकड़ में ईख की उपज पैदा करनेवाले किसान कट्ठों में सिमटे
वारिसलीगंज : ईख की पटी रहनेवाली वारिसलीगंज इलाके की भूमि को अब ईख का पतुहल भी मयस्सर नहीं है. ईख की हरियाली ने किसानों के जीवन में ऐसा रंग पिरोया था कि इन्हें कभी आर्थिक तौर पर मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता था. वैसे तो नहरी इलाका होने के कारण इस क्षेत्र को धान का कटोरा कहा जाता है.
परंतु किसान अपने खेतों में उतने ही धान की फसल लगाते थे, जितना जरूरी होता था. बाकी खेतों में ईख लगाया जाता था. लेकिन, स्थिति ऐसी हो गयी है कि ईख की खेती अब सपना हो गया है. पर्व-त्योहार में भी ईख अब लोगों को बाहर से लाना पड़ता है. वर्ष,1993 में चीनी मिल बंद होने के बाद किसान ईख की खेती से मायूस होने लगे. दर्जनों एकड़ में ईख की उपज करनेवाले किसान कट्ठों में सिमट गये. बदलते परिवेश में ईख की मिठास से नयी पीढ़ी वंचित हो गयी.
कैसे खत्म हुई खेती: चीनी मिल के बंद होने के कुछ वर्षों बाद भी यहां के किसानों ने ईख की खेती से नाता नहीं तोड़ा. उनके जेहन ने इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया कि आनेवाले दिनों में चीनी मिल नहीं खुलेगी. इसी उम्मीद से कई वर्षों तक किसान ईख की खेती से जुड़े रहे.
चीनी मिल के रंगत रहने की स्थिति में किसान इस फसल की कटाई कर चीनी मिल में वजन करवा देते थे. बंद होने के बाद किसानों को ईख की खेती घाटे के सौदे में तब्दील हो गयी. अधिक परिश्रम से किसान परेशान दिखने लगे. पहले तो डनलप गाड़ी से ईख चीनी मिल में पहुंचाया जाता था. अनिश्चितकालीन बंद होने की दिशा में ईख कटाई के बाद पेराई कार्य भी करना पड़ता था. इसमें श्रमदोहन के साथ मुनाफा में भी कमी होने लगा. फलत: कृषक इस खेती से मुंह फेर लिया.
संयुक्त खेती की थी परंपरा: चीनी मिल बंद होने से ईख की खेती से किसान को चौतरफा घाटे का सामना करना पड़ा. जबकि, संयुक्त खेती की प्रथा पर विराम लग गया. संपन्न व निम्न स्तरीय किसानों के बीच दूरी बढ़ती गयी. संयुक्त खेती होने से आर्थिक रुप से कमजोर किसानों का भी कार्य सुचारु रुप से चल रहा था. अपने खेतों में सिंचाई करनेवाले संपन्न किसान पास के खेतों में दूसरे किसानों की लगी ईख की सिंचाई आसानी से किया करते थे. पटवन खर्च संबंधित किसानों को ईख की बिक्री कर देने की परंपरा थी. यहां तक कि खेतों से चीनी मिल तक की ढुलाई में भी सहयोग हुआ करता था. ईख के अगला भाग में भी मिठास की प्रचुरता होने से वह पशुओं का पसंदीदा चारा था. इसको खाने से दूध में भी बढ़ोतरी होती थी. किसान भी अपने पशुओं को खल्ली, चोकर आदि के बजाय ईख का अगड़ा ही देना पसंद करते थे. ईख की खेती क्या गई, अमृत सदृश्य दूध पर भी ग्रहण लग गया.
रिश्तेदारों की पहली पसंद थी ईख : कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को मनाया जाने वाला जेठान पर्व में ईख अपने संबंधियों के यहां सौगात के तौर पर भेंट की जाती थी. रिश्तेदारों को इस पर्व पर वारिसलीगंज क्षेत्र के ईख आने की उम्मीद टिकी रहती थी. लेकिन, आज यहां के लोग ही जेठान पर्व के मौके पर सुदूरवर्ती इलाकों से ईख की खरीदारी कर पर्व मनाते हैं.
कम होता था पलायन : नकदी फसल ईख की खेती होने से इलाके के युवाओं का पलायन भी नहीं होता था. समाज के हर तबके के लोग ईख से ही अपने जीवन-यापन करने में लगे रहते थे. कोई कटाई व कोई ढुलाई के कार्य में लिप्त रहते थे. कुछ लोग ईख के अवशेष एकत्रित कर पूरे साल के जलावन की व्यवस्था कर लेते थे. इतना ही नहीं ईख की खेती के शुरुआती समय में इसकी कोड़ाई, सिंचाई की बात दिमाग में कोसों दूर रहती थी.
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