मिट्टी के दीये की चमक हो रही फीकी

नवादा (नगर) : दीपावली में घरों की रौनक चाइनीज लाइट की लरियों से होगी. रोशनी की त्योहार दीपावली को लेकर बाजारों में सैकड़ों प्रकार के नये प्रोडक्ट उपलब्ध है. मोमबत्ती व मिट्टी के दीये जैसी आकृतियों की रंग-बिरंगी लाइटें बिक रही हैं. बाजार में चाइनीज लाइटों की मांग भी अधिक है. बिजली की उपलब्धता के […]
नवादा (नगर) : दीपावली में घरों की रौनक चाइनीज लाइट की लरियों से होगी. रोशनी की त्योहार दीपावली को लेकर बाजारों में सैकड़ों प्रकार के नये प्रोडक्ट उपलब्ध है. मोमबत्ती व मिट्टी के दीये जैसी आकृतियों की रंग-बिरंगी लाइटें बिक रही हैं. बाजार में चाइनीज लाइटों की मांग भी अधिक है.
बिजली की उपलब्धता के कारण इसकी बिक्री बढ़ी है. एक अनुमान के मुताबिक दो करोड़ रुपये से अधिक का इलेक्ट्रॉनिक सामग्रियों का कारोबार होता है. खास कर दशहरा से छठ तक चाइनीज बल्व व लरियों की सबसे अधिक डिमांड रहती है. डिस्को लाइट कर रहा प्रभावितबाजार में तरह-तरह के चाइनीज लाइट हैं. लोकल मार्केट में 25 रुपये लरी से लेकर सौ रुपये लरी तक के प्रोडक्ट मिल रहे हैं. डिस्को लाइट की डिमांड सबसे अधिक है. रंग-बिरंगी रोशनी फेंकते हुए यह बल्व काफी प्रभावित करता है. बल्व की रोशनी इस तरीके से फैलती है कि मानों असली डिस्को हॉल का मजा देती है. सीएफएल व एलइडी की भी डिमांड बाजार में दीपावली को लेकर बल्व का डिमांड भी बढ़ी है.
खासकर लोग पीले बल्व की जगह अब सीएफएल व एलइडी अधिक पसंद कर रहे हैं. सीएफएल व एलइडी अब विभिन्न कंपनियों के अलावा चाइनिज प्रोडक्ट भी उपलब्ध है, जिसकी कीमत कम होने से मांग अधिक है. शहर के पुरानी बाजार, कलाली रोड, गोला रोड, आदि जगहों पर कई छोटे हॉलसेल दुकानदार भी चाइनिज लाइट बेच रहे हैं. घरों में अब लोग चारों तरफ रंग-बिरंगे लाइट की लरियां लगाते है, ताकि यह स्थायी रूप से रात में भी जलता रहे. घरों में दीपावली के पहले लगने वाली यह लरियां छठ के बाद ही खुलती है. एक रंग के लरियों के बजाय लोग रंग-बिरंगे रोशनी देनेवाली लरियों की ज्यादा डिमांड कर रहे हैं. इलेक्ट्रॉनिकबाजार में पूरी तरह से चाइनिज उत्पादों का प्रभाव है.
स्थानीय दुकानदार जो माल बेच रहे है वह भले ही दिल्ली व कोलकाता जैसे शहरों से मार्केटिंग करके लाये है. लेकिन, इन में से अधिकतर प्रोडक्ट्स चाइना के ही हैं. मिट्टी के दीये 50 रुपये सैकड़ाआधुनिकता के बढ़ते दौर में पारंपरिक मिट्टी के दीये धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं. महज औपचारिकता निभाने के रूप में मिट्टी के दीयों का इस्तेमाल हो रहा है. पूजा-पाठ अथवा दिखावा के लिए लोग अब मिट्टी के दीये खरीदते हैं. यही कारण है कि बाजार में मिट्टी के दीये से अधिक चाइनीज लरियां व डिब्बा बंद मोमबत्तियां अधिक दिखाई देती है.
मिट्टी के दीये 50 से 70 रुपये सैकड़े की दर से मिल रहा है. बावजूद खरीदारों की कमी देखी जाती है. आधुनिकता में खो रही परंपराभारतीय संस्कृति में रोशनी का बड़ा महत्व है. हर शुभ कार्य की शुरुआत दीप जला कर किया जाता है. लेकिन, आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोग पारंपरिक दीयों के बजाय केमिकल युक्त मोमबत्ती व इलेक्ट्रॉनिक चकाचौंध बाली बल्व जलाना पसंद करते हैं. मिट्टी के दीये जलाने से प्रदूषण तो कम होता ही है साथ ही इस मौसम में होने वाले कई कीट पतंगों को नष्ट करने में यह पारंपरिक दीये अहम भूमिका निभाते है. लोगों को इन पारंपरिक रीति-रिवाजों को भी बढ़ावा देने की जरूरत है.
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