कूड़े पर फेंकी मिलीं बच्चों को कुपोषण से बचानेवाली दवाइयां
Updated at : 12 Mar 2015 7:25 AM (IST)
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बिहारशरीफ (नालंदा) : अस्पतालों में अक्सर दवाइयां उपलब्ध नहीं रहने की शिकायतें मिलती रहती है. अस्पताल में दवाइयां उपलब्ध भी हो तो वह सही लोगों तक पहुंच पा रहा है या नहीं इसे देखनेवाला कोई नहीं है. लोगों की सेहत खास कर बच्चों व गर्भवती महिलाओं को कुपोषण व बीमारियों से बचाने के लिए सरकार […]
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बिहारशरीफ (नालंदा) : अस्पतालों में अक्सर दवाइयां उपलब्ध नहीं रहने की शिकायतें मिलती रहती है. अस्पताल में दवाइयां उपलब्ध भी हो तो वह सही लोगों तक पहुंच पा रहा है या नहीं इसे देखनेवाला कोई नहीं है. लोगों की सेहत खास कर बच्चों व गर्भवती महिलाओं को कुपोषण व बीमारियों से बचाने के लिए सरकार द्वारा कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं.
इसके लिए सरकार द्वारा दवाएं मुफ्त उपलब्ध करायी जा रही हैं. मगर इसकी जमीनी हकीकत क्या है? इसके बारे में न तो अस्पताल प्रबंधन और न ही सरकार को पता है. एनएच 31 के किनारे स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, गिरियक के समीप ही बुधवार को इसका नजारा देखने को मिला. अस्पताल के सामने कूड़े के ढेर के पास आयरन सीरप के सात काटरून पैक फेंके मिले. स्थानीय लोगों ने बताया कि होली के पूर्व से ही कार्टनों में पैक दवाइयां यहां फेंके हुई हैं.
फोटो खींचे जाने की खबर के बाद चौकस हुए कर्मी : कूड़े के ढेर पर दवाइयां फेंके होने और उनका फोटो खींचे जाने की खबर मिलते ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, गिरियक के कर्मी सक्रिय हुए और आनन-फानन में वहां पहुंच कार्टनों में बंद इन दवाइयों को अपने साथ ले गये. यह खबर गिरियक बाजार में आग की तरह फैल गयी और स्थानीय लोग तरह-तरह की चर्चा करते देखे गये.
तीन मार्च को बांटी गयी थीं दवाइयां : कूड़े के ढेर के पास फेंकी गयीं इन दवाइयों को अस्पताल प्रबंधन द्वारा होली के पूर्व तीन मार्च को बांटी गयी थी. सभी दवाइयों के कार्टनों पर आशा का नाम लिखा हुआ था. इससे मालूम पड़ता है कि अस्पताल से दवाइयां उठाने के बाद इन दवाइयों को बच्चों व गर्भवती महिलाओं के बीच बांटने की जगह कूड़े के ढेर पर फेंक दिया गया.
आयरन सिरप का क्या है उपयोग : बच्चों को कुपोषण से बचाने व महिलाओं में खून की कमी को देर करने (एनिमिया) में इस्तेमाल किया जाता है. सरकार द्वारा इन दवाओं को आशा व सेविका के माध्यम से जरूरतमंदों के बीच बंटवायी जा रही है. बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए सप्ताह में दो बार एक एमएल दवा दी जाती है.
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