मुजफ्फरपुर: मॉडल अस्पताल में जांच रिपोर्ट के चक्कर में धूल फांक रहीं आइ ड्रॉप, बाहर से दवा खरीदने को मजबूर मरीज

Edited by SUMIT KUMAR
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जांच रिपोर्ट के चक्कर में धूल फांक रहीं आइ ड्रॉप(AI IMAGE)

Muzaffarpur Model Hospital: मुजफ्फरपुर के मॉडल अस्पताल में छह महीने से एंटीबायोटिक आइ ड्रॉप डंप हैं. बीएमआइसीएल की रोक और गुणवत्ता रिपोर्ट न आने से गरीब मरीज बाहर से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं, जबकि दवाओं के एक्सपायर होने का खतरा बढ़ गया है.पढे़ं पूरी खबर…

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मुजफ्फरपुर से विनय की रिपोर्ट

Muzaffarpur Model Hospital: स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने और मरीजों को मुफ्त दवा देने के दावों की जमीनी हकीकत देखनी हो, तो मुजफ्फरपुर जिले के मॉडल अस्पताल का रुख कर लीजिए. यहां मोतियाबिंद के ऑपरेशन और आंख की अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए आई एंटीबायोटिक आइ ड्रॉप पिछले छह महीने से स्टोर रूम में डंप पड़ीहैं. हैरान करने वाली बात यह है कि इन दवाओं को मरीजों में इसलिए नहीं बांटा जा रहा है क्योंकि इनकी गुणवत्ता जांच की रिपोर्ट अब तक नहीं आई है. आपूर्ति करने वाली एजेंसी बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BMICL) ने फिलहाल इन दवाओं के वितरण पर रोक लगा रखी है. ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि जब दवाओं की गुणवत्ता की जांच पहले से नहीं हुई थी, तो उन्हें अस्पताल के स्टोर में सप्लाई ही क्यों कर दिया गया और अगर सप्लाई हो भी गई तो छह महीने बीत जाने के बाद भी जांच रिपोर्ट क्यों दबी बैठी है.

मॉडल अस्पताल

अस्पताल के बाहर से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर मरीज

मॉडल अस्पताल में रोज सैकड़ों मरीज आंखों के इलाज और ऑपरेशन के लिए पहुंचते हैं. डॉक्टरों के पास संसाधन और तकनीक तो है, लेकिन जब वे पर्चे पर जरूरी एंटीबायोटिक दवाएं लिखते हैं, तो मरीजों को काउंटर से खाली हाथ लौटना पड़ताहै. मजबूरी में गरीब मरीजों को अस्पताल के बाहर के निजी मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं. कई मरीज तो पैसों के अभाव में बिना दवा लिए ही घर लौट जा रहे हैं, जिससे उनकी आंखों की रोशनी पर भी खतरा मंडरा रहा है.

लापरवाही की इंतहा, एक्सपायरी डेट का काउंटडाउन शुरू

अस्पताल के जानकारों का कहना है कि आइ ड्रॉप जैसी दवाओं की शेल्फ लाइफ पहले से ही सीमित होती है. छह महीने पहले आई दवाओं की यह खेप सरकारी फाइलों और जांच के चक्कर में आधे से अधिक का समय स्टोर रूम में ही काट चुकी है. अगर कुछ महीने और यही स्थिति रही, तो बिना इस्तेमाल हुए ही यह दवाएं एक्सपायर हो जाएंगी और इन्हें कचरे के डिब्बे में फेंकना पड़ेगा. जनता के टैक्स के पैसे से खरीदी गई दवाएं मरीजों के काम आने के बजाय सरकारी सुस्ती की भेंट चढ़ रही हैं.

वर्जन डॉ. सुधीर कुमार, सिविल सर्जन

दवाओं की आपूर्ति की गई थी, लेकिन उसके वितरण पर रोक लगा दी गई है. कहा गया है कि दवाओं की जांच हो रही है. इसकी गुणवत्ता रिपोर्ट आने के बाद ही इसे मरीजों में वितरित करें. अभी इसकी रिपोर्ट नहीं आई है. इसके लिए रिमाइंडर भेजा गया है.

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SUMIT KUMAR

लेखक के बारे में

By SUMIT KUMAR

सुमित पत्रकारिता में पिछले 4 वर्षों से सक्रिय। प्रभात खबर के प्रिंट मीडिया के साथ काम करने के बाद वर्तमान में प्रभात खबर की डिजिटल टीम से जुड़े हुए हैं। क्राइम, हाईपरलोकल, स्वास्थ्य विभाग व राजनीतिक रिपोर्टिंग में विशेष रुचि और अनुभव रखते हैं। क्षेत्रीय मुद्दों और जनसरोकार की खबरों को सशक्त तरीके से उठाने के लिए जाने जाते हैं।

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