मधेसी आंदोलन से अलग नहीं हो सकता भारत
मधेसी आंदोलन से अलग नहीं हो सकता भारत गांधी शांति प्रतिष्ठान की ओर से संगोष्ठी मधेसी आंदोलन समावेशीकरण की देन भारत को संभलकर करना होगा काम वरीय संवाददाता, मुजफ्फरपुरगांधी शांति प्रतिष्ठान की ओर से रविवार को नेपाल का मधेसी संकट विषय पर कम्युनिटी कॉलेज में संगोष्ठी हुई. मुख्य वक्ता राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर प्रो […]
मधेसी आंदोलन से अलग नहीं हो सकता भारत गांधी शांति प्रतिष्ठान की ओर से संगोष्ठी मधेसी आंदोलन समावेशीकरण की देन भारत को संभलकर करना होगा काम वरीय संवाददाता, मुजफ्फरपुरगांधी शांति प्रतिष्ठान की ओर से रविवार को नेपाल का मधेसी संकट विषय पर कम्युनिटी कॉलेज में संगोष्ठी हुई. मुख्य वक्ता राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर प्रो रोहिताश्व दूबे ने कहा कि मधेसी आंदोलन नेपाल की समस्या है. लेकिन भारत इस संकट से अलग नहीं रह सकता है. नेपाल के पहाड़ी क्षेत्र व भारत के बिहार-यूपी के मैदानी क्षेत्र के बीच की जगह को मध्यदेश कहा जाता है. और यहां के निवासियों को मधेसी कहा जाता है. भारत के पांच राज्यों की सीमा नेपाल से मिलती है. तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद नेपाल भारत के लिए बफर का काम कर रहा था. 1950 में एक संधि के तहत नेपाल में राजतंत्र की स्थापना हुई. 1965 में पहली बार लोकतांत्रिक सरकार बनी. लेकिन यह टिकाऊ नहीं रहा. कुछ ही समय बाद फिर राजतंत्र काबिज हो गया. 2015 में नेपाल में संविधान लागू हुआ. लोकतंत्र की स्थापना के बाद समावेशीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है. मधेस आंदोलन भी समावेशीकरण की देन है. मधेसियों के साथ पहले शिथिलता दिखायी गई. अब नेपाल चीन के निकट आ रहा है. ऐसे में भारत को यहां संभलकर काम करना होगा. विषय प्रवेश डॉ अजीत कुमार ने कराया. अध्यक्षता लक्षणदेव प्रसाद सिंह ने की. संचालन डॉ विकास नारायण उपाध्याय ने की. स्वागत अरविंद वरुण ने किया. डॉ ब्रजेश कुमार शर्मा, अवधेश कुमार सिंह, ललितेश्वर मिश्रा, के के झा, अरुण कुमार सिंह, प्रो अमरेंद्र नारायण यादव ने विचार रखे.
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