Save Bangladeshi Hindus : बांग्लादेश में हिंदुओं को जिंदा जलाया जा रहा, क्या कर रही है सरकार और मानव अधिकार संस्थाएं?
बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार
Save Bangladeshi Hindus : 1971 में जब बांग्लादेश का जन्म हुआ, तो वह एक सेक्यूलर मुल्क था. वहां धर्म की नहीं पहचान की लड़ाई थी, जिसे बंगाली वर्सेस पाकिस्तानी के रूप में लड़ा गया था और बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना था. उस वक्त यहां हिंदुओं की आबादी वहां की कुल आबादी का लगभग 30 प्रतिशत थी, लेकिन 80 के दशक में कट्टरता हावी हुई और इस्लाम और उसके मानने वालों ने हिंदुओं पर अत्याचार शुरू कर दिया. वर्तमान परिस्थिति यह है कि सोशल मीडिया पर Save Bangladeshi Hindus ट्रेंड कर रहा है.
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Save Bangladeshi Hindus : सेव बांग्लादेशी हिंदू यह कीवर्ड सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड कर रहा है और इस हैशटैग पर कई वीडियो, फोटो और कमेंट आ रहे हैं, जो बांग्लादेशी हिंदुओं को बचाने की मांग कर रहे हैं. बांग्लादेश में वहां के युवा नेता उस्मान हादी की मौत के बाद जो हिंसा भड़की उसकी आंच में वहां के हिंदू अल्पसंख्यक जल रहे हैं. वायरल वीडियो –फोटो में उनकी पीड़ा साफ झलक रही है, बावजूद इसके उनकी रक्षा के लिए कोई वैश्विक पहल नहीं हो रही है.
बांग्लादेश में हिंदुओं पर क्यों हो रहे हैं हमले?
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले की सबसे बड़ी वजह है कट्टरपंथ. वहां अभी राजनीतिक अस्थिरता है, अंतरिम सरकार बहुत ही कमजोर है, जिसकी वजह से प्रशासन मुस्तैद नहीं है. इसका प्रभाव सीधे तौर पर अल्पसंख्यकों पर पड़ रह है और इस्लामिक कट्टरपंथी लोग हिंदुओं पर आक्रमण कर रहे हैं. उनकी यह सोच है कि हिंदू, भारत समर्थक विचारधारा के हैं, जो उनकी राष्ट्रवादी और इस्लामिक कट्टरपंथी विचारधारा के विपरीत है. कट्टरपंथी इस्लामिक सोच की राजनीतिक पार्टी जमात ए इस्लामी बांग्लादेश को एक इस्लामिक कंट्री के रूप में देखती है और यहां के हिंदुओं को बाहरी मानती है. उनका यह मानना है कि देश में जो हिंदू हैं, वो भारत के समर्थक हैं. इसी सोच के लोगों ने बांग्लादेशी हिंदुओं का जीना हराम कर रखा है.
बांग्लादेश में हिंदुओं को लेकर क्या सोचते हैं वहां के लोग?
बांग्लादेश में हिंदुओं को लेकर वहां के लोग दो खेमों में बंटे हैं. एक सोच के समर्थक हिंदुओं को अपने देश का मानते हैं और यह भी मानते हैं कि संविधान ने सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार दिया है, जबकि दूसरी सोच इसके विपरीत है. विपरीत सोच वाले लोग हिंदुओं पर हमले करते हैं, उन्हें देश से निकालना चाहते हैं.

बांग्लादेश में एक हिंदू दीपू चंद्र दास भालुका की माॅब लिंचिंग पर बांग्लादेश की प्रतिष्ठित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने एक्स पर आज एक पोस्ट लिखा है और बताया है कि किस प्रकार दीपू चंद्र दास की लिंचिंग में जेहादियों की अहम भूमिका है. तस्लीमा नसरीन ने लिखा है कि पैगंबर की निंदा के नाम पर जिहादियों ने एक बेकसूर की जान ली है. वो सवाल पूछ रही हैं कि अब दीपू चंद्र का परिवार क्या करेगा, क्योंकि दीपू अपने परिवार का एकमात्र कमाऊ व्यक्ति था? क्या सरकार उनके लिए कुछ करेगी.
2024 में 13 अगस्त को तस्लीमा नसरीन ने प्रभात खबर से बात की थी और बताया था कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले की घटना कोई नई नहीं है. उन्होंने बताया था कि 1947 में बांग्लादेश में 30% आबादी हिंदुओं की थी, जो अब 8% हो गई है. राजनीति के नाम पर हिंदुओं पर अटैक होते हैं. मैंने अपनी किताब लज्जा में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए हमलों का जिक्र किया है. चूंकि बांग्लादेश में बहुसंख्यक आबादी मुसलमानों की है, इसलिए राजनीतिक पार्टियां उन्हें संतुष्ट करने के लिए भी हिंदुओं पर हो रहे हमले को इग्नोर करती है. तस्लीमा नसरीन बताती हैं कि शुरुआत में बांग्लादेश की स्थिति ऐसी नहीं थी, लेकिन धीरे–धीरे कट्टरपंथ बढ़ा और जिहादियों का असली चेहरा सबके सामने है.
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बांग्लादेश में हिंदुओं की कैसी है स्थिति और जनसंख्या?
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक है, उनकी स्थिति पर बात करते हुए तस्लीमा नसरीन ने बताया था कि बांग्लादेश शुरुआत में एक सेक्यूल र देश था, लेकिन 80 के दशक में इस्लाम को देश का धर्म बना दिया गया. इसके साथ ही ‘बिस्मिल्लाह उर रहमान उर रहीम’ शब्द को संविधान में जोड़ दिया गया. यह सबकुछ हुआ जिया उर रहमान और जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद के समय में. ये दोनों और इनके बाद भी जो लोग सत्ता में आए उन्होंने जीवनपर्यंत सत्ता में बने रहने के लिए इस्लाम के मानने वालों को यह दिखाया कि वे उनके हितैषी हैं इसलिए हिंदुओं या अन्य धर्म को मानने वालों के खिलाफ नफरत फैलाई गई. मस्जिद बनाए गए मदरसे बनाए गए, लेकिन इन शासकों ने कभी भी देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के कार्यों पर ध्यान नहीं दिया. जब मदरसों में मुल्ला-मौलवियों ने बच्चों का ब्रेन वाॅश किया, उन्हें कट्टपपंथी बनाने का काम किया, तो बांग्लादेश की किसी भी सरकार ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मुसलमानों का हितैषी बनने से उनकी सरकार ज्यादा दिनों तक सत्ता में रह सकती है. बांग्लादेश एक ऐसा देश है, जहां की बहुसंख्यक आबादी मुसलमान है. हिंदू आज की स्थिति में बमुश्किल 7–8 प्रतिशत ही बचे हैं, जिन्हें हमेशा डर बना रहता है.
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लेखक के बारे में
By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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