लोकसभा में 11 अगस्त 2026 को Kerala (Alteration of Name) Bill, 2026 वॉइस वोट से पास हो गया है. इस बिल का मकसद संविधान की पहली अनुसूची में राज्य का नाम Kerala से बदलकर Keralam करना है. हालांकि अभी नाम आधिकारिक तौर पर नहीं बदला है, लोकसभा से बिल को राज्यसभा भेजा जाएगा जहां से पास होने और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी की के बाद केरल केरलम हो जाएगा. लेकिन सवाल ये है कि केरल सरकार आखिर नाम क्यों बदलना चाहती है? और इस पूरे मामले में संविधान का क्या रोल है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.पहले समझिए केरल का नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?केरल की मुख्य भाषा मलयालम है और वहां लोग अपने राज्य का नाम Keralam ही बोलते हैं. लेकिन अंग्रेजी में और भारत के संविधान में राज्य का नाम Kerala लिखा हुआ है.केरल विधानसभा का कहना है कि राज्य का संवैधानिक नाम भी वही होना चाहिए, जो मलयालम में इस्तेमाल होता है.नाम बदलने की मांग को लेकर विधानसभा ने पहले 2023 में प्रस्ताव पास किया था. इसके बाद जून 2024 में एक बार फिर सर्वसम्मति से नाम बदलने की मांग की गई.यानी कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है. इस पर केरल में पिछले कुछ सालों से कोशिश चल रही है.केरलम ही क्यों करना चाहती है सरकारकेरल के इस नए परिचय में नाम नया नहीं है? बल्कि इस नाम की जड़ें काफी पुरानी मानी जाती हैं. इतिहास में केरल से मिलता-जुलता नाम करीब 2,000 साल से भी ज्यादा पुराने स्रोतों में भी मिलता है.सम्राट अशोक के समय के एक शिलालेख में Keralaputra नाम मिलता है, जानकार इसे दक्षिण भारत के चेर शासकों से जोड़ कर देखते हैं.हालांकि Kerala या Keralam नाम आखिर आया कहां से, इस पर इतिहासकारों और भाषाविदों की अलग-अलग राय है. कुछ इसे चेर वंश से जोड़ते हैं, तो कुछ पुराने द्रविड़ शब्दों से.इन उदाहरणों को लेकर इतना तो कहा जा सकता है कि Keralam कोई आज का बनाया हुआ नाम नहीं है. चुकी यह इतिहास और आज के बोली से भी जुड़ा है इसलिए केरल का नया नाम केरलम किया जा रहा.ये भी पढ़ें: अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस : देश में युवाओं के सामने रोजगार और शिक्षा का संकट, हैरान करने वाले हैं ये आंकड़ेआज का केरल बना कैसे?आजादी से पहले आज का पूरा केरल एक ही राज्य नहीं था. मलयालम बोलने वाले लोग अलग-अलग इलाकों में रहते थे. इनमें Travancore, Cochin और Malabar जैसे इलाके शामिल थे.इन सभी मलयालम भाषी इलाकों को एक राज्य में मिलाने की मांग धीरे-धीरे तेज हुई और इसे Aikya Kerala यानी संयुक्त केरल आंदोलन कहा गया.आजादी के बाद Travancore और Cochin को मिलाकर एक राज्य बनाया गया. फिर देश में भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन प्रक्रिया के बाद 1 नवंबर 1956 को केरल राज्य बना.यानी मलयालम बोलने वाले ज्यादातर इलाकों को मिलाकर आज का केरल बनाया गया.दिलचस्प बात यह है कि तब भी मलयालम में राज्य का नाम Keralam ही था. लेकिन अंग्रेजी में Kerala लिखा गया और संविधान में भी यही नाम दर्ज हुआ.राज्य का नाम बदलने का फैसला कौन करता है?संविधान के Article 3 के तहत किसी राज्य का नाम बदलने का अधिकार संसद के पास है.लेकिन संसद सीधे अपनी तरफ से बिल नहीं ला सकती. इसके लिए पहले राष्ट्रपति की सिफारिश जरूरी होती है. इसके बाद राष्ट्रपति उस प्रस्ताव को संबंधित राज्य की विधानसभा के पास भेजते हैं और उसकी राय मांगी जाती है.हालांकि राज्य विधानसभा की राय मानना संसद के लिए जरूरी नहीं है. यानी विधानसभा किसी नाम को बदलने के पक्ष में हो या खिलाफ, आखिरी फैसला संसद ही करती है.केरल के मामले में विधानसभा ने नाम बदलने का समर्थन किया है. इसलिए इस मामले में केंद्र और राज्य के बीच सहमति है.लोकसभा से बिल पास होने से अब केरल का नाम Keralam हो गया?इस सवाल का जवाब है अभी नहीं. भले लोकसभा ने बिल पास किया है लेकिन अब इसे राज्यसभा से भी पास होना है.इसके बाद बिल राष्ट्रपति के पास जाएगा. राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही नाम बदलने की प्रक्रिया पूरी होगी.यानी कि अभी संविधान में जहां अभी Kerala लिखा है, वहां Keralam लिखा जाएगा.ये भी पढ़ें: कॉन्सर्ट हो या छुट्टी, ईएमआई पर चल रही जिंदगी! बढ़ते कर्ज को लेकर क्यों सतर्क है RBI?नाम बदलने से क्या-क्या बदलेगा?नाम बदलने का मतलब यह नहीं है कि केरल की सीमा बदल जाएगी या राज्य का प्रशासन बदल जाएगा.मुख्यमंत्री, विधानसभा, जिले, राजधानी और बाकी सरकारी व्यवस्था पहले जैसी ही रहेगी.बदलाव मुख्य रूप से राज्य के आधिकारिक नाम में होगा. इसके बाद सरकारी कागजों, दस्तावेजों और दूसरी जगहों पर भी नाम को अपडेट करना पड़ेगा.इस बदलाव को इतना अहम क्यों माना जा रहा है?देखने में यह सिर्फ एक नाम बदलने का मामला लग सकता है, लेकिन इसके पीछे भाषा और पहचान का सवाल है.केरल के लोग अपनी भाषा में अपने राज्य को Keralam कहते हैं. विधानसभा चाहती है कि यही नाम देश के संविधान में भी दर्ज हो.दूसरे शब्दों में कहें तो मांग यह है कि जिस नाम से राज्य अपनी भाषा और संस्कृति में खुद को पहचानता है,वही नाम उसकी संवैधानिक पहचान भी बने.फिलहाल लोकसभा से बिल पास हो चुका है. अब राज्यसभा और राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है. अगर दोनों जगह से हरी झंडी मिल जाती है, तो संविधान में Kerala की जगह Keralam दर्ज हो जाएगा.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर