Bihar Sharabbandi: बिहार में शराबबंदी को लागू हुए 10 साल हो चुके हैं. 1 अप्रैल 2016 को जब तत्कालीन नीतीश कुमार सरकार ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी, तब इसे सिर्फ शराब की बिक्री रोकने वाला कानून नहीं बताया गया था. इसके पीछे एक महत्वपूर्ण सामाजिक उद्देश्य था.सरकार का तर्क था कि अगर शराब आसानी से उपलब्ध नहीं होगी तो घरेलू हिंसा कम होगी, महिलाओं के खिलाफ अपराध घटेंगे, परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और शराब पर खर्च होने वाला पैसा बच्चों की पढ़ाई और घर की दूसरी जरूरतों पर खर्च होगा.शुरुआत में इस फैसले को महिलाओं का व्यापक समर्थन भी मिला. लेकिन 10 साल बाद तस्वीर को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. क्या बिहार में शराबबंदी ने अपने उन सामाजिक लक्ष्यों को हासिल किया, जिनके लिए इसे लागू किया गया था? क्या शराब पीने वालों की संख्या वास्तव में कम हुई? क्या घरेलू हिंसा और महिलाओं के खिलाफ अपराध घटे? क्या परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी?या फिर शराब की मांग खत्म होने के बजाय उसका रास्ता बदल गया और वैध शराब की जगह अवैध शराब, तस्करी और दूसरे नशीले पदार्थों ने ले ली?इन्हीं सवालों के बीच देश की प्रतिष्ठित आर्थिक नीति अनुसंधान संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च यानी NCAER की एक रिसर्च ने बिहार की शराबबंदी को लेकर बहस फिर तेज कर दी है.इंडिया पॉलिसी फोरम में पेश किए गए रिसर्च पेपर 'बिहार के विकास का व्यापक परिप्रेक्ष्य: उपलब्धियां, अपूर्ण एजेंडा और आगे की राह' में रत्ना सहाय के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों की टीम ने बिहार के विकास से जुड़े कई पहलुओं का स्टडी किया है.रिपोर्ट में शराबबंदी को लेकर शोधकर्ताओं ने बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं और सरकार को पूर्ण शराबबंदी खत्म कर नियंत्रित या विनियमित बिक्री की दिशा में जाने की सलाह दी है.लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं है. क्योंकि दूसरी तरफ NFHS के आंकड़े बताते हैं कि शराब की खपत में बड़ी गिरावट आई है. तो फिर असली तस्वीर क्या है? आइए आंकड़ों और दावों के जरिए समझते हैं कि बिहार में शराबबंदी के 10 साल में आखिर बदला क्या?पहले समझिए, शराबबंदी लागू करने की जरूरत क्यों महसूस हुई थी?1 अप्रैल 2016 को बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई. उस समय सरकार का सबसे बड़ा तर्क था कि शराब सिर्फ व्यक्ति की आदत नहीं, बल्कि परिवार और समाज की समस्या है. मान्यता यह थी कि शराब की वजह से घरेलू हिंसा बढ़ती है. शराब पर पैसा खर्च होने से परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती है और इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है.सरकार को उम्मीद थी कि शराब की उपलब्धता बंद होने के बाद परिवार की आय का इस्तेमाल दूसरी जरूरतों के लिए होगा.यही वजह थी कि शराबबंदी को सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि महिला सुरक्षा, परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक सुधार का फैसला बताया गया. महिलाओं ने भी इस फैसले का बड़े स्तर पर समर्थन किया. लेकिन सवाल यही है कि 10 साल बाद उस समर्थन और उम्मीद का परिणाम क्या निकला?नीतीश कुमार की फाइल फोटो महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर क्या असर पड़ा?NCAER की रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है. रिसर्चर्स के मुताबिक, शराबबंदी का प्रमुख उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ हिंसा और घरेलू हिंसा को कम करना था. लेकिन आंकड़ों के विश्लेषण से यह साफ नहीं दिखता कि शराबबंदी के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अपेक्षित कमी आई हो.रिसर्च में दावा किया गया है कि शराबबंदी के बाद महिलाओं के खिलाफ रिपोर्ट किए गए अपराधों में कमी आने के बजाय वृद्धि हुई. यानी जिस लक्ष्य को शराबबंदी की सबसे बड़ी वजह बताया गया था, उसी पर सवाल खड़ा हो गया. हालांकि यहां एक दूसरा आंकड़ा भी तस्वीर को अलग तरीके से देखने को मजबूर करता है.NFHS के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में शराब की खपत में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है.पुरुषों में शराब की खपतNFHS-4 के अनुसार बिहार में 15 से 49 वर्ष की उम्र के 28.9 प्रतिशत पुरुष शराब पीते थे. NFHS-5 में यह आंकड़ा घटकर 17 प्रतिशत रह गया. NFHS-6 में यह और घटकर 16.5 प्रतिशत दर्ज किया गया. यानी शराब पीने वाले पुरुषों के अनुपात में बड़ी गिरावट आई. तो सवाल फिर वही है- अगर शराब पीने वालों की संख्या इतनी कम हुई, तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा में अपेक्षित गिरावट क्यों नहीं दिखी?इसका एक जवाब यह हो सकता है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाला हर अपराध सिर्फ शराब की वजह से नहीं होता. इसके पीछे सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक समेत कई दूसरे कारण भी होते हैं. यही वजह है कि शराबबंदी के असर को सिर्फ अपराध के आंकड़ों से देखना भी पूरी तस्वीर नहीं देता.सांकेतिक फोटो घरेलू हिंसा का आंकड़ा क्या कहता है?NFHS के आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं. NFHS-4 में अत्यधिक शराब पीने वाले पतियों की 83.1 प्रतिशत पत्नियों ने शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव होने की बात कही थी. वहीं शराब नहीं पीने वाले पतियों के मामलों में यह आंकड़ा 31.7 प्रतिशत था.NFHS-5 में अत्यधिक शराब पीने वाले पतियों के मामलों में यह आंकड़ा 83.3 प्रतिशत रहा, जबकि शराब नहीं पीने वाले पतियों के मामलों में यह 33.8 प्रतिशत दर्ज किया गया. यानी शराब और घरेलू हिंसा के बीच संबंध जरूर दिखाई देता है. लेकिन दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट है कि शराब न पीने वाले परिवारों में भी घरेलू हिंसा के मामले मौजूद हैं.इसलिए सवाल यह नहीं है कि शराब घरेलू हिंसा का कारण है या नहीं. सवाल यह है कि क्या शराब बंद करने भर से घरेलू हिंसा खत्म हो सकती है? NCAER की रिसर्च इसी बिंदु पर शराबबंदी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है.गर्भावस्था के दौरान हिंसा में क्या हुआ?NFHS-5 के अनुसार बिहार में गर्भावस्था के दौरान हिंसा के मामलों में 2 प्रतिशत की कमी आई. तुलना करें तो उत्तर प्रदेश में यह कमी 0.7 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 1.5 प्रतिशत रही. यानी इस मोर्चे पर बिहार में गिरावट पड़ोसी राज्यों की तुलना में ज्यादा रही. इस आंकड़े को शराबबंदी के सकारात्मक प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है. लेकिन पूरी तस्वीर में अवैध शराब, अपराध और नशे के दूसरे रूपों की समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.AI जनरेटेड तस्वीर शराब बंद हुई या उसका बाजार बदल गया?यहीं से बिहार की शराबबंदी की सबसे बड़ी कहानी शुरू होती है. कानून ने शराब की बिक्री और उपलब्धता पर रोक लगा दी. लेकिन क्या शराब की मांग भी खत्म हो गई? NCAER की रिसर्च का तर्क है कि ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ. शराब की मांग का एक हिस्सा अवैध बाजार की तरफ चला गया.आज शराब खुले तौर पर बिकती दिखाई नहीं देती, लेकिन अवैध तरीके से इसकी उपलब्धता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं. लोगों का कहना है कि शुरुआत में शराबबंदी का असर काफी कड़ा था, लेकिन धीरे-धीरे स्थिति बदल गई. अब शराब दिखाई कहीं नहीं देती, लेकिन मिल हर जगह जाती है.यानी सवाल यह बनता है कि अगर शराब पूरी तरह बंद है, तो फिर उसकी तस्करी और अवैध बिक्री का इतना बड़ा नेटवर्क कैसे खड़ा हो गया?100 का माल 200 में!दूसरी तरफ महिलाओं की जिंदगी पर इसके असर की अलग तस्वीर सामने आती है. दूसरों के घरों में काम करने वाली सुनैना (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि शराबबंदी के शुरुआती दिनों में स्थिति में सुधार महसूस हुआ था. लेकिन बाद में परिस्थितियां फिर बदलने लगीं. उनके मुताबिक अब चोरी-छिपे शराब महंगे दाम पर मिलती है. यानी जो चीज पहले 100 रुपये में मिलती थी, उसके लिए अब 200 रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं.इसका मतलब सिर्फ शराब महंगी होना नहीं है. इसका असर सीधे परिवार की कमाई पर पड़ता है. अगर शराब की खपत पूरी तरह खत्म नहीं हुई और उसका दाम बढ़ गया, तो परिवार की आर्थिक परेशानी कम होने के बजाय बढ़ भी सकती है. यही वह बिंदु है जहां शराबबंदी के सामाजिक उद्देश्य और उसके जमीनी असर के बीच अंतर दिखाई देता है.शराब की जगह दूसरे नशे का खतराशराबबंदी की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह भी है कि शराब की उपलब्धता कम होने के बाद कुछ लोग दूसरे नशीले पदार्थों की तरफ बढ़े. NCAER की रिसर्च में दावा किया गया है कि शराब की जगह सिंथेटिक ड्रग्स, नशीली गोलियों और कफ सिरप जैसे दूसरे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ा है. अगर ऐसा है तो यह सरकार के लिए और बड़ी चुनौती है. क्योंकि सवाल सिर्फ शराब रोकने का नहीं रह जाता.सवाल यह बन जाता है कि क्या शराब की जगह उससे भी ज्यादा खतरनाक नशे ने ले ली है? अवैध शराब का नेटवर्क अलग. नशीले पदार्थों का बाजार अलग. और इन दोनों के साथ अपराध तथा भ्रष्टाचार का खतरा अलग.यानी शराबबंदी ने नशे की समस्या खत्म करने के बजाय उसके स्वरूप को बदल दिया हो, यह चिंता अब बहस का बड़ा हिस्सा बन चुकी है.सूखे नशे की सांकेतिक फोटो जहरीली शराब से कितनी मौतें हुईं?शराबबंदी के बावजूद बिहार में जहरीली शराब की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं. 17 मार्च को बिहार पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बाद से अब तक जहरीली शराब के सेवन से 354 लोगों की मौत हो चुकी है.पुलिस के अनुसार 2026 में मार्च तक शराब की औसत मासिक बरामदगी में 2025 की तुलना में 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. यानी कानून मौजूद है, कार्रवाई हो रही है, बरामदगी हो रही है, लेकिन अवैध शराब का नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ.और यहीं शराबबंदी के सबसे कठिन सवालों में से एक सामने आता है- अगर शराबबंदी का मकसद शराब से होने वाली मौतों को रोकना था, तो जहरीली शराब से मौतें क्यों जारी हैं?शराबबंदी ने बिहार को कितने पैसे का नुकसान कराया?अब आते हैं सबसे बड़े आर्थिक सवाल पर. शराबबंदी लागू होने से पहले शराब पर लगने वाला आबकारी कर बिहार सरकार के राजस्व का करीब 14 से 15 प्रतिशत हिस्सा था. 2016 में शराबबंदी लागू होने के समय शराब से सरकार को करीब 4,000 करोड़ रुपये राजस्व मिलने का अनुमान था. यानी शराबबंदी के साथ सरकार ने एक बड़ा रेवेन्यू सोर्स छोड़ दिया.NCAER की रिसर्च का अनुमान है कि अगर आबकारी कर को फिर से लागू किया जाता है तो राज्य के अपने राजस्व में 14 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है.ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी BAI का भी दावा है कि पिछले 10 वर्षों में शराबबंदी के कारण बिहार को 60,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है.हालांकि अलग-अलग विशेषज्ञों के अनुमान इससे भी ज्यादा हैं और शराब से संभावित राजस्व नुकसान को 60 हजार करोड़ से 1 लाख करोड़ रुपये के बीच बताया गया है.यानी नुकसान सिर्फ उस टैक्स का नहीं है जो शराब की बिक्री से मिलता. सरकार को अवैध शराब की तस्करी रोकने, निगरानी बढ़ाने और कानून लागू करने के लिए भी बड़ी मशीनरी लगानी पड़ती है. पुलिस और प्रशासन का खर्च बढ़ता है. अदालतों पर बोझ बढ़ता है. जेलों और प्रवर्तन व्यवस्था पर खर्च बढ़ता है. और इसी वजह से शराबबंदी के समर्थकों और विरोधियों के बीच आर्थिक बहस भी तेज है.दूसरे राज्यों की कमाई देखिए2025-26 में शराब से सबसे ज्यादा आबकारी राजस्व हासिल करने वाले राज्यों के आंकड़े भी इस बहस को दिलचस्प बनाते हैं. उत्तर प्रदेश को शराब से 57,722.26 करोड़ रुपये की एक्साइज ड्यूटी मिली.कर्नाटक को 40,183.02 करोड़ रुपये.तेलंगाना को 40,209 करोड़ रुपये.महाराष्ट्र को 32,575 करोड़ रुपये.आंध्र प्रदेश को 29,042 करोड़ रुपये.पश्चिम बंगाल को 20,400 करोड़ रुपये.राजस्थान को 19,720 करोड़ रुपये.मध्य प्रदेश को 17,500 करोड़ रुपये.हरियाणा को 14,342 करोड़ रुपये.तमिलनाडु को 11,836 करोड़ रुपये.पंजाब को 11,782 करोड़ रुपये.और झारखंड को 4,013.53 करोड़ रुपये.इसके मुकाबले बिहार ने शराबबंदी के कारण इस राजस्व स्रोत को पूरी तरह छोड़ दिया.कभी 259 करोड़ था शराब का राजस्वयहां बिहार की कहानी का एक और दिलचस्प पहलू है. 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, उस समय शराब से सरकार को करीब 259 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था. बाद के वर्षों में सरकार ने आबकारी नीति में बदलाव किए और शराब से मिलने वाला राजस्व बढ़ता गया. शराबबंदी लागू होने से ठीक पहले यह आंकड़ा करीब 4,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था.यानी एक तरफ सरकार को शराब से हजारों करोड़ रुपये की कमाई हो रही थी. दूसरी तरफ उसी समय सरकार ने सामाजिक उद्देश्य को प्राथमिकता देते हुए इस पूरे राजस्व स्रोत को बंद कर दिया.अब 10 साल बाद सवाल यह है कि क्या सामाजिक फायदे इतने बड़े रहे कि राजस्व नुकसान को नजरअंदाज किया जा सके? यही बहस अब बिहार की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में लौट आई है.NCAER का सुझाव क्या है?NCAER की रिसर्च ने सिर्फ यह नहीं कहा कि शराबबंदी काम नहीं कर रही. शोधकर्ताओं ने इसके विकल्प की भी बात की है. सुझाव है- पूर्ण शराबबंदी हटाकर विनियमित बिक्री यानी Regulated Sales का मॉडल अपनाया जाए. इस मॉडल में शराब पूरी तरह खुले बाजार के भरोसे नहीं होगी. सरकार इसकी बिक्री पर कंट्रोल रखेगी. दुकानों की संख्या सीमित की जा सकती है. डिजिटल ट्रैकिंग की व्यवस्था हो सकती है. शराब पर भारी टैक्स लगाया जा सकता है. और बिक्री को कड़े सरकारी नियमों के तहत रखा जा सकता है. इसका मकसद शराब को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उसके बाजार को सरकार की निगरानी में लाना बताया गया है.अगर रेगुलेटेड सेल लागू हुई तो क्या होगा?NCAER के मुताबिक इससे तीन बड़े फायदे हो सकते हैं.पहला- अवैध शराब के नेटवर्क पर चोट जब शराब की नियंत्रित और वैध बिक्री उपलब्ध होगी तो अवैध बाजार की मांग कम हो सकती है. इससे तस्करी और अवैध शराब के कारोबार को नुकसान पहुंच सकता है.दूसरा- सरकार की कमाई बढ़ सकती हैआबकारी टैक्स दोबारा लागू होने से सरकार को हजारों करोड़ रुपये का राजस्व मिल सकता है. इस पैसे का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और दूसरे विकास कार्यों में किया जा सकता है.तीसरा- पुलिस का बोझ कम हो सकता हैशराब की तस्करी और अवैध बिक्री पर कार्रवाई में पुलिस और प्रशासन का बड़ा हिस्सा खर्च होता है. अगर बाजार नियंत्रित और वैध हो जाता है तो पुलिस का ध्यान दूसरे गंभीर अपराधों की तरफ लगाया जा सकता है. लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है. क्या शराब की उपलब्धता बढ़ने से खपत फिर बढ़ सकती है? यही वह सवाल है जिसके कारण शराबबंदी हटाने का फैसला राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है.क्योंकि आंकड़े शराबबंदी के पक्ष में भी हैंशराबबंदी पर बहस सिर्फ NCAER की रिपोर्ट के आधार पर खत्म नहीं हो सकती. NFHS के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में पुरुषों के बीच शराब की खपत में बड़ी गिरावट आई है. 28.9 प्रतिशत से घटकर 17 प्रतिशत और फिर 16.5 प्रतिशत तक पहुंचना छोटी गिरावट नहीं है. इसका मतलब यह भी हो सकता है कि शराबबंदी ने वास्तव में शराब की उपलब्धता और खपत पर असर डाला.इसी तरह गर्भावस्था के दौरान हिंसा में बिहार में 2 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जो उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की तुलना में ज्यादा है. पुरुषों में प्री-हाइपरटेंशन की बढ़ोतरी भी बिहार में केवल 1.8 प्रतिशत रही, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 10.9 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 4 प्रतिशत दर्ज की गई. इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि शराबबंदी का कोई सकारात्मक असर नहीं हुआ.असली सवाल यह है कि क्या इसके फायदे उसके आर्थिक और प्रशासनिक नुकसान से बड़े हैं? और क्या शराबबंदी को ज्यादा प्रभावी तरीके से लागू किया जा सकता है?मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी क्या कहते हैं?बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल ही में शराबबंदी के प्रभाव पर अपनी बात रखी. पटना के लोक भवन स्थित मंडपम में आयोजित 'नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत' कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि सरकार का मकसद सिर्फ कानून लागू करना नहीं है, बल्कि युवाओं को नशे से दूर रखकर बेहतर समाज बनाना है. मुख्यमंत्री ने माना कि चोरी-छिपे कुछ लोग शराब पीते हैं. लेकिन उनका कहना था कि सार्वजनिक स्थानों पर शराबबंदी का प्रभाव पूरी तरह दिखाई देता है. यानी सरकार की नजर में शराबबंदी का सबसे बड़ा फायदा सार्वजनिक जीवन में दिखाई देने वाला बदलाव है.नीतीश कुमार की विरासत और राजनीतिक पेच अब आते हैं सबसे मुश्किल सवाल पर- क्या बिहार में शराबबंदी खत्म करना राजनीतिक रूप से संभव है? नीतीश कुमार ने शराबबंदी को अपनी सरकार की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों में शामिल किया था. उनका स्पष्ट रुख रहा है कि उनके रहते शराबबंदी खत्म नहीं होगी. आज भले ही नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन उनकी पार्टी सरकार में शामिल है. ऐसे में शराबबंदी खत्म करने का फैसला सिर्फ प्रशासनिक या आर्थिक फैसला नहीं होगा. यह राजनीतिक फैसला भी होगा. सरकार को यह डर भी रहेगा कि शराबबंदी खत्म करने से महिलाओं में नाराजगी पैदा हो सकती है.2025 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपये की राशि देने जैसी योजनाओं का राजनीतिक असर भी देखने को मिला था. ऐसे में महिलाओं के बीच लोकप्रिय शराबबंदी को हटाने का फैसला आसान नहीं होगा.सम्राट चौधरी NDA के अंदर भी एक राय नहींशराबबंदी के मुद्दे पर एनडीए के घटक दलों के बीच भी पूरी तरह एकमत स्थिति नहीं है. मोकामा से जदयू विधायक अनंत सिंह कई बार शराबबंदी खत्म करने की मांग उठा चुके हैं. उनका तर्क है कि शराबबंदी के कारण दूसरे प्रकार के नशे बढ़ रहे हैं, जो समाज के लिए ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकते हैं.केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी शराबबंदी के कानून को लेकर अलग रुख रखते हैं. उनका कहना है कि नशाबंदी का कानून ठीक है, लेकिन इसे लागू करने में पुलिस और प्रशासन के स्तर पर गंभीर दिक्कतें हैं. वे यह भी कहते रहे हैं कि कानून का सबसे ज्यादा नुकसान गरीब-गुरबा को उठाना पड़ रहा है. उन्होंने बिहार में शराबबंदी पर गुजरात मॉडल लागू करने की भी मांग की है.दूसरी तरफ जेडीयू शराबबंदी के पक्ष में मजबूती से खड़ी है. चिराग पासवान भी शराबबंदी खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं. बिहार सरकार में मंत्री शीला मंडल का कहना है कि शराबबंदी के कारण माहौल बदला है और लोग बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दे रहे हैं, खासकर लड़कियों के लिए स्थितियां बेहतर हुई हैं. यानी सरकार के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग नजरिए मौजूद हैं.विपक्ष क्या कहता है?जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर शराबबंदी को लेकर बेहद आक्रामक रुख रखते हैं. वे इसे फर्जी कानून बताते हुए आरोप लगाते हैं कि शराबबंदी की आड़ में शराब माफिया और भ्रष्ट तंत्र मिलकर समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं.आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि फोन पर शराब की डिलीवरी तक की जा रही है. राजद MLC इतना तक कह चुके हैं कि विधानसभा परिसर में भी मैं शराब की डिलीवरी करवा सकता हूं. यानी विपक्ष का दावा है कि कानून कागज पर पूर्ण शराबबंदी का है, लेकिन जमीन पर शराब की उपलब्धता पूरी तरह खत्म नहीं हुई.बिहार के विकास से जुड़ा बड़ा सवाल NCAER की रिसर्च शराबबंदी को सिर्फ शराब के मुद्दे के रूप में नहीं देखती. शोध में बिहार के विकास के लिए छह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है. निजी क्षेत्र का विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, कानून-व्यवस्था और बाढ़ नियंत्रण.रिपोर्ट के मुताबिक इन क्षेत्रों में निवेश और सुधार से राज्य की उत्पादकता बढ़ सकती है, आर्थिक ढांचे में बदलाव आ सकता है और युवाओं के लिए रोजगार के बेहतर अवसर पैदा हो सकते हैं.रिपोर्ट यह भी कहती है कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में बिहार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. क्योंकि बिहार देश की करीब 9 प्रतिशत आबादी का घर है और देश के सबसे गरीब राज्यों में शामिल है. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शराब बिके या नहीं. सवाल यह भी है कि राज्य के सीमित संसाधनों का इस्तेमाल कहां किया जाए.बिहार की ताजा खबरों के लिए यहां क्लिक करेंतो क्या शराबबंदी खत्म कर देनी चाहिए?यहीं आकर पूरी बहस सबसे ज्यादा पेचीदा हो जाती है. एक तरफ NCAER की रिसर्च कहती है कि शराबबंदी अपने प्रमुख सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करने में सफल नहीं रही.रिसर्च के मुताबिक महिलाओं के खिलाफ अपराध कम नहीं हुए, शराब का एक हिस्सा अवैध बाजार में चला गया, दूसरे नशीले पदार्थों की समस्या बढ़ी और राज्य को भारी राजस्व नुकसान हुआ.दूसरी तरफ NFHS के आंकड़े बताते हैं कि शराब की खपत में बड़ी गिरावट आई है. गर्भावस्था के दौरान हिंसा में कमी आई है. और शराबबंदी के समर्थकों का दावा है कि इससे सार्वजनिक जीवन और परिवारों के माहौल में बदलाव आया है. यानी तस्वीर पूरी तरह काली या पूरी तरह सफेद नहीं है.10 साल बाद असली सवाल क्या है?बिहार में शराबबंदी के 10 साल पूरे हो चुके हैं. अब बहस सिर्फ यह नहीं रह गई है कि शराबबंदी सही है या गलत. असली सवाल इससे बड़ा है. क्या पूर्ण शराबबंदी अपने घोषित उद्देश्यों को हासिल कर रही है? अगर शराब की खपत घटी है तो क्या यह गिरावट कानून की वजह से है या सामाजिक बदलावों की वजह से? अगर शराबबंदी से महिलाओं की स्थिति सुधारने का लक्ष्य था तो महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े क्या कहते हैं? अगर शराब पूरी तरह बंद है तो जहरीली शराब और अवैध तस्करी का नेटवर्क क्यों मौजूद है? अगर सरकार को हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है तो क्या इसका असर विकास पर पड़ रहा है?।और अगर शराबबंदी हटाई जाती है तो क्या शराब की उपलब्धता बढ़ने से खपत और उससे जुड़ी सामाजिक समस्याएं दोबारा बढ़ सकती हैं? यानी सवाल शराब बेचने या रोकने का नहीं, बल्कि सही मॉडल चुनने का है.बिहार के सामने अब दो रास्ते?एक रास्ता कहता है - पूर्ण शराबबंदी जारी रखिए, लेकिन कानून लागू करने की व्यवस्था को और मजबूत कीजिए.दूसरा रास्ता कहता है - पूर्ण प्रतिबंध हटाकर कड़े सरकारी नियंत्रण, सीमित दुकानों, डिजिटल निगरानी और भारी टैक्स के साथ विनियमित बिक्री लागू कीजिए.पहले मॉडल में सामाजिक उद्देश्य को प्राथमिकता मिलती है. दूसरे मॉडल में राजस्व, अवैध बाजार और प्रशासनिक बोझ को ध्यान में रखा जाता है. लेकिन दोनों रास्तों की अपनी चुनौतियां हैं.आखिर शराबबंदी से बदला क्या?10 साल बाद उपलब्ध आंकड़ों को एक साथ रखकर देखें तो जवाब बेहद सीधा भी नहीं है और आसान भी नहीं. शराब की खपत में गिरावट आई है. लेकिन शराब की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई. घरेलू हिंसा और शराब के बीच संबंध दिखाई देता है. लेकिन महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अपेक्षित गिरावट नहीं दिखने का दावा NCAER की रिसर्च करती है. गर्भावस्था के दौरान हिंसा में कमी दर्ज हुई है. लेकिन अवैध शराब और जहरीली शराब की घटनाएं जारी हैं. सरकार की शराब से होने वाली कमाई खत्म हुई. लेकिन अवैध कारोबार और उसकी निगरानी पर खर्च बढ़ा. सार्वजनिक स्थानों पर शराबबंदी का असर दिखाई देता है. लेकिन चोरी-छिपे शराब मिलने के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं.और सबसे बड़ी बात- शराब की समस्या खत्म हुई या सिर्फ उसका रूप बदला, यही वह सवाल है जिसका जवाब अब बिहार को तलाशना है. NCAER की रिपोर्ट ने इस बहस को फिर से सामने ला दिया है. अब गेंद सरकार के पाले में है. क्योंकि 10 साल बाद बिहार के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 'शराबबंदी रहेगी या जाएगी?'सवाल यह है - 'बिहार के लिए शराबबंदी का कौन सा मॉडल सबसे ज्यादा कारगर है?' और शायद आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति का एक बड़ा सवाल यही होगा.Also Read: सम्राट सरकार ने IG-DIG, SSP और SP को दिया ये स्पेशल पावर, अब उपद्रवियों की खैर नहीं, माहौल बिगाड़ा तो होगी कार्रवाई