कारगिल की बर्फीली चोटियों पर दिन में उड़ान भरना ही किसी चुनौती से कम नहीं था. अब सोचिए, इन्हीं पहाड़ों के बीच रात के अंधेरे में दुश्मन के ठिकानों पर हमला करना हो, ऊपर से पाकिस्तानी रडार से बचना हो, सही टारगेट तक पहुंचना हो और बिना GPS की मदद के बिल्कुल सही जगह पर बम गिराना हो, तो ये कितना मुश्किल काम रहा होगा.लेकिन भारतीय वायुसेना के लिए ये सिर्फ एक चुनौती नहीं थी, बल्कि ऐसा मिशन था जिसे पायलटों ने बेहद मुश्किल हालात में अंजाम दिया. 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ऑपरेशन सफेद सागर को लेकर आज भी कई दावे और चर्चाएं होती हैं.कारगिल युद्ध से जुड़ी ऐसी ही एक कहानी GPS को लेकर भी है. अक्सर यह दावा किया जाता है कि युद्ध के दौरान अमेरिका ने जानबूझकर भारत के GPS सिस्टम में गड़बड़ी कर दी थी, जिससे भारतीय लड़ाकू विमानों के लिए टारगेट तक पहुंचना और सटीक बॉम्बिंग करना मुश्किल हो गया था. लेकिन क्या वाकई अमेरिका ने भारत के खिलाफ जीपीएस में छेड़छाड़ की थी?आज के मुकाबले सटीक नहीं था 1999 में जीपीएसआज हम मोबाइल फोन में जीपीएस खोलकर अपनी लोकेशन कुछ मीटर की सटीकता से देख लेते हैं. लेकिन 1999 में स्थिति अलग थी.उस समय नागरिक जीपीएस में सिलेक्टिव अवेलेबिलिटी नाम की व्यवस्था लागू थी. इसके तहत जीपीएस सिग्नल में जानबूझकर एक त्रुटि रखी जाती थी, जिससे सामान्य नागरिकों के लिए इसकी सटीकता सीमित रहती थी.लेकिन खास बात यह थी कि यह सिर्फ भारत के लिए नहीं था. दुनिया भर में नागरिक जीपीएस इस्तेमाल करने वालों पर इसका असर पड़ता था.इसलिए केवल इस वजह से यह निष्कर्ष निकालना कि अमेरिका ने खास तौर पर भारत के खिलाफ जीपीएस में छेड़छाड़ की थी, सही नहीं होगा.ये भी पढ़ें: क्यों हो रही बिहार में शराबबंदी खत्म करने की सिफारिश? समझिए पूरा हिसाब-किताबकारगिल में जीपीएस की समस्या थी क्या?यहां कहानी थोड़ी और तकनीकी हो जाती है.कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना जिन नक्शों और कोऑर्डिनेट्स का इस्तेमाल कर रही थी, वे एवरेस्ट स्टेरॉयड नाम के संदर्भ तंत्र पर आधारित थे. दूसरी तरफ जीपीएस डब्ल्यूजीएस-84 नाम के अलग कोऑर्डिनेट्स तंत्र का इस्तेमाल करता था.आसान भाषा में समझें तो दोनों तंत्र पृथ्वी पर किसी जगह की स्थिति बताने के लिए अलग-अलग तरीका का इस्तेमाल करता है.नतीजा दोनों यंत्र के तरीकों की वजह से किसी टारगेट का कोऑर्डिनेट्स भारतीय सैन्य नक्शे पर कुछ और दिख सकता था और जीपीएस पर उससे थोड़ा अलग दिखाई दे सकता था.यही अंतर बमबारी के लिए महत्वपूर्ण था. क्योंकि कारगिल में पायलटों को सिर्फ यह पता होना काफी नहीं था कि लक्ष्य किस इलाके में है. उन्हें यह भी पता होना था कि लक्ष्य की बिल्कुल सही स्थिति और ऊंचाई क्या है.फिर अमेरिका पर शक क्यों हुआ?कारगिल युद्ध के समय अमेरिका ने भारत को जीपीएस की पूरी तरह निर्बाध सुविधा नहीं दी थी. उस दौर में जीपीएस पर सिलेक्टिव अवेलेबिलिटी लागू थी. यही बात बाद में इस धारणा का आधार बनी कि अमेरिका ने भारत के खिलाफ जीपीएस को जानबूझकर इस्तेमाल किया.द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में तत्कालीन नंबर 17 स्क्वाड्रन गोल्डन एरोज के कमांडिंग ऑफिसर रहे एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ (रिटायर्ड) के मुताबिक इस समस्या को समझने के लिए उस समय की जीपीएस तकनीक और भारतीय सैन्य नक्शों को भी देखना जरूरी है.बीएस धनोआ का मानना था कि हैंडहेल्ड जीपीएस में सर्वे किए गए किसी स्थान की स्थिति और भारतीय नक्शे में दिए गए कोऑर्डिनेट्स के बीच जो अंतर दिखाई देता था, उसे तकनीकी सुधार की जरूरत थी.यानी मामला सिर्फ यह नहीं था कि जीपीएस गलत बता रहा था. असली चुनौती यह समझना था कि जीपीएस किस कोऑर्डिनेट्स तंत्र में जानकारी दे रहा है और भारतीय सैन्य नक्शा किस संदर्भ तंत्र पर बना है.बीएस धनोआ कहते हैं कि उन्हें ऐसा नहीं लगता कि अमेरिका ने जानबूझकर जीपीएस में गड़बड़ी की थी. उनके मुताबिक, कारगिल के दौरान जीपीएस से जुड़ी दिक्कत के पीछे तकनीकी कारण ज्यादा अहम थे.ये भी पढ़ें: अन्ना के अनशन से JPSC आंदोलन तक, आजादी के बाद भी कायम है गांधी का सत्याग्रह मॉडल !भारतीय वायुसेना ने उसका रास्ता कैसे निकाला?भारतीय वायुसेना पूरी तरह हैंडहेल्ड जीपीएस पर निर्भर नहीं थी. सेना लक्ष्य की जानकारी इंडियन एवरेस्ट कोऑर्डिनेट्स, यानी मिल ग्रिड में देती थी. पायलट इन कोऑर्डिनेट्स को 1:50,000 पैमाने वाले नक्शे पर चिन्हित करते थे. इसके बाद नक्शे की मदद से अक्षांश और देशांतर निकाले जाते थे.लक्ष्य की सही ऊंचाई पता करने के लिए नक्शे पर बनी समोच्च रेखाओं यानी कॉन्टूर लाइनों को भी पढ़ा जाता था. कारगिल जैसे ऊंचे पहाड़ी इलाके में यह जानकारी बेहद अहम थी, क्योंकि बम गिराने के लिए सिर्फ लक्ष्य की जगह नहीं, उसकी ऊंचाई का सही अंदाजा होना भी जरूरी था.मिग-21 और मिग-23 बीएन में लगे टाइम आर्क-6 जीपीएस में भारतीय एवरेस्ट कोऑर्डिनेट्स के आधार पर उड़ान भरने का विकल्प मौजूद था. यानी उस दौर में पायलट जीपीएस की जानकारी को सैन्य नक्शों, कोऑर्डिनेट्स और इलाके की ऊंचाई से जुड़ी जानकारी के साथ मिलाकर इस्तेमाल करते थे.बम गिराने में कुछ मीटर की गलती भी क्यों बड़ी थी?मैदानी इलाके में किसी लक्ष्य के कोऑर्डिनेट्स में थोड़ा अंतर हो तो शायद उतना बड़ा फर्क न पड़े. लेकिन कारगिल में स्थिति बिल्कुल अलग थी.यहां लक्ष्य ऊंचे पहाड़ों पर थे. पायलटों को पहाड़ी की ऊंचाई, घाटी की दिशा, लक्ष्य की स्थिति और अपनी उड़ान की ऊंचाई, सबको एक साथ ध्यान में रखना पड़ता था.धनोआ के मुताबिक, पायलट नक्शे पर बनी समोच्च रेखाओं को गिनकर लक्ष्य की सही ऊंचाई निकालते थे. इसके बाद विमान को तय ऊंचाई पर लाकर बम गिराए जाते थे.यानी उस दौर में सटीक बमबारी सिर्फ जीपीएस के भरोसे नहीं होती थी. इसमें नक्शा,कोऑर्डिनेट्स तंत्र, इलाके की जानकारी और पायलट का अनुभव सभी मायने रखता था.जीपीएस के अलावा कारगिल में और भी खतरे थेकारगिल में भारतीय पायलटों की मुश्किल सिर्फ डायरेक्शन और कोऑर्डिनेट्स तय करने तक सीमित नहीं थी.पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा के अपनी तरफ एक पहाड़ी पर रडार लगाया था. हालांकि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक खुफिया विमानों ने इसकी स्थिति का पता लगा लिया था. पायलट रडार की पकड़ से बचने के लिए घाटियों के भीतर और पहाड़ों की सबसे ऊंची धार के नीचे उड़ते थे.कई बार पायलट लक्ष्य के स्तर से करीब 3,000 फीट ऊपर तक नीचे चले जाते थे. इससे रडार से बचने में मदद मिलती थी, लेकिन विमान कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलों (स्टिंगर मिसाइल ) की पहुंच में आ जाता था.रात के अभियानों में खतरा और ज्यादा था. चांदनी में बर्फीली पहाड़ियां दिखाई देती थीं, लेकिन बादल आते ही पूरा इलाका अंधेरे में बदल जाता था.तो क्या अमेरिका ने भारत का जीपीएस बंद किया था?उपलब्ध जानकारियों के आधार पर ऐसा कहना सही नहीं होगा.कारगिल के दौरान जीपीएस में सटीकता से जुड़ी वास्तविक सीमाएं थीं. सिलेक्टिव अवेलेबिलिटी के कारण नागरिक जीपीएस पहले से ही सीमित सटीकता देता था. इसके अलावा भारतीय सैन्य नक्शों और जीपीएस के कोऑर्डिनेट्स तंत्रों में अंतर था.इन दोनों वजहों से भारतीय पायलटों को जीपीएस की जानकारी को सैन्य नक्शों और कोऑर्डिनेट्स के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना पड़ता था. बीएस धनोआ भी इसे अमेरिकी जानबूझकर की गई साजिश नहीं मानते.इसलिए कारगिल की जीपीएस कहानी को सिर्फ अमेरिका ने जीपीएस में गड़बड़ी कर दी थी कहकर समझना अधूरा होगा. असल कहानी उस दौर की जीपीएस तकनीक, सिलेक्टिव अवेलेबिलिटी और एवरेस्ट स्टेरॉयड तथा डब्ल्यूजीएस-84 के बीच अंतर की है.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर