बिहार में बीते तीन साल में डायबिटीज रोगियों पर कम असर कर रहीं दवाएं, जानें डॉक्टर क्या बता रहे कारण

Updated at : 14 Nov 2022 7:39 AM (IST)
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बिहार में बीते तीन साल में डायबिटीज रोगियों पर कम असर कर रहीं दवाएं, जानें डॉक्टर क्या बता रहे कारण

बीते तीन साल में यह समस्या अधिक देखने को मिल रही है. इसको लेकर रिसर्च सोसाइटी फॉर द स्टडी ऑफ इन इंडिया के तहत बिहार चैप्टर एसोसिएशन इस संबंध में डाटा जुटा रहा है. वहीं डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना से अब तक में तनाव पीड़ित डायबिटीज रोगियों की संख्या में 20 से 25 फीसदी बढ़ी है.

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आनंद तिवारी, पटना. अधिक तनाव लेने वाले मधुमेह रोगियों में डायबिटीज की दवाएं बेअसर हो रही हैं. इससे डायबिटीज असंतुलित हो रही है और हार्ट, किडनी व आंख की बीमारियां घेर रही हैं. इलाज के लिए कई दवाओं का सहारा लेना पड़ रहा तो इलाज भी महंगा हो रहा है. खासकर बीते तीन साल में यह समस्या अधिक देखने को मिल रही है. इसको लेकर रिसर्च सोसाइटी फॉर द स्टडी ऑफ इन इंडिया के तहत बिहार चैप्टर एसोसिएशन इस संबंध में डाटा जुटा रहा है. वहीं डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना से अब तक में तनाव पीड़ित डायबिटीज रोगियों की संख्या में 20 से 25 फीसदी बढ़ी है.

दवाओं को बेअसर करने में तनाव की भूमिका अहम

गार्डिनर रोड अस्पताल के निदेशक व डायबिटीज विशेषज्ञ डॉ मनोज कुमार सिन्हा ने बताया कि डायबिटीज की दवाओं को बेअसर करने में तनाव की अहम भूमिकाहै. अगर तनाव में हैं और दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो इससे दवाओं की डोज बढ़ जाती है. इतनाही नहीं डायबिटीज से जुड़ी दूसरी बीमारियां घेरती हैं और उनका इलाज भी महंगाहो जाताहै. वहीं सरकारी अस्पतालों में तो इलाज नि:शुल्क होता है लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में इलाज पर खर्च भी एक बड़ी समस्याहै. एक सामान्य डायबिटीज रोगी की दवाएं दो से पांच हजार प्रति महीने पड़ रही हैं. अगर घर में दो डायबिटीज रोगी हो गये तो 10 हजार रुपये प्रति महीने इलाज पर खर्चहो जाताहै. हार्ट और किडनी की बीमारी में इलाज पर दोगुना खर्च हो रहा है.

महिलाओं में भी टाइप 2 डायबिटीज के बढ़े केस, रिसर्च में आया सामने

सिर्च सोसाइटी बिहार चैप्टर के सचिवव शुगर रोग विशेषज्ञ डॉ सुभाष कुमार की देखरेख में पिछले साल रिसर्च भी किया गया था. इसमें आइजीआइएमएस, पीएमसीएच व अन्य अस्पतालों के विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी शामिल किया गया था. रिसर्च में 35 से 70 साल तक के डायबिटीज मरीजों का शामिल किया गया. इसमें पुरुषों के साथ 70 से अधिक महिलाओं को भी हिस्साबनाया गया. मरीजों की रूटीन जांच के साथ फास्टिंग, पीपी, एचबीएवनसी, लिपिड प्रोफाइल में सीरम, टोटल कोलस्ट्रॉल, सीरम एलडीएल आदि की जांच हुई. इसमें करीब 70% मरीजों में एचबीएवनसी 7.91% रहा, पीपी औसतन 263.88, तो फास्टिंग 192.28 के करीब मिली.

शुगर बिगाड़ सकती है आंखों की रोशनी : डॉ बिभूति

आइजीआइएमएस के पूर्व निदेशक व क्षेत्रीय चछु संस्थान के अध्यक्ष डॉ बिभूति प्रसन्न सिन्हा ने बताया कि डायबिटीज के कारण रक्त में बढ़ने वाली शुगर की मात्रा को कंट्रोल नहीं रखना भारी पड़ सकताहै. अब कम युवा भी डायबिटीज रेटिनोपैथी से पीड़ित होकर पहुंच रहे हैं. डायबिटीज के मरीजों में 20 से 25 प्रतिशत ऐसे मरीज हैं, जो रेटिनोपैथी से प्रभावित हैं. उन्होंने कहा कि डायबिटीज के कारण रेटिना पर होने वाले असर को डायबिटीज रेटिनोपैथी कहते हैं. इससे रेटिना क्षतिग्रस्त होने के साथ ऑप्टिव नर्व खराबहोने का खतरा अधिक बढ़ जाताहै. ऐसे में मरीजों को चाहिए की वह शुगर की मात्रा को अधिक बढ़ने नहीं दें. खान-पान व लाइफ स्टाइल पर हमेशा ध्यान दें.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

बिगड़ती लाइफ स्टाइल की वजह से डायबिटीज से अब सभी बीमारियां जुड़ गयी हैं. अब कम उम्र में ही यह बीमारी लोगों को घेररही हैं. 20 से 35 साल के युवा शुगर की चपेट में आ रहे हैं. इतना ही नहीं मरीज सिर्फ डायबिटीज का इलाज नहीं कराते हैं, बल्कि कई बीमारियां और हैं जो इलाज महंगा कर रही हैं.

-डॉ सुभाष कुमार, शुगर रोग विशेषज्ञ व रिसर्च सोसाइटी बिहार चैप्टर के सचिव

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