औरंगाबाद के इस गांव में अब भी जीवित है महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना

Updated at : 25 Sep 2020 2:32 AM (IST)
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औरंगाबाद के इस गांव में अब भी जीवित है महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना

मदनपुर : मदनपुर प्रखंड के बनिया पंचायत का बनिया गांव इन दिनों चर्चा में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत योजना की शुरुआत करने के पहले ही यहां की महिलाएं आत्मनिर्भर हो गयी हैं .महिलाएं खादी ग्रामोद्योग समिति की ओर से दिये गये त्रिपुरारी मॉडल के चरखा से सूत काट कर अपने परिवार की गाड़ी खींच रही हैं.

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मदनपुर : मदनपुर प्रखंड के बनिया पंचायत का बनिया गांव इन दिनों चर्चा में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत योजना की शुरुआत करने के पहले ही यहां की महिलाएं आत्मनिर्भर हो गयी हैं .महिलाएं खादी ग्रामोद्योग समिति की ओर से दिये गये त्रिपुरारी मॉडल के चरखा से सूत काट कर अपने परिवार की गाड़ी खींच रही हैं. गांव से जब खटखट की आवाज बाहर सुनाई पड़ती है, तो लोग उस ओर खिंचे चले जाते हैं. जहां चरखा पर काम कर रही महिलाएं नजर आती हैं. हालांकि महिलाओं के इस कारोबार पर कोरोना काल ने गहरा असर छोड़ा है. छह माह पहले तक सब कुछ ठीक था. त्रिपुरारी मॉडल के चरखा से सूत काट कर महिलाएं विभाग को देती थी और बदले में विभाग से उन्हें मेहनताना देता था. मेहनताना इतना होता था कि उनकी रोजी-रोटी चल जाये, लेकिन कोरोना काल के लॉकडाउन ने उन्हें भी सोचने पर विवश कर दिया. ज्ञात हो कि महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और जयप्रकाश नारायण के सर्वोदय आंदोलन के बाद भारत में निवासरत ग्रामीणों को आर्थिक सुदृढ़ीकरण के लिए चरखा अभियान चलाया गया था, जिसके सूत से खादी के कपड़े बनते थे और इन कपड़ो की बिक्री से जो मुनाफा होता था उसे ग्रामीणों के बीच बांट दिया जाता था. आज भी जिले के ग्रामीण अंचल में यह परंपरा लगातार जारी है.

पिछले तीन महीनों से नहीं हुआ भुगतान

खादी ग्रामोद्योग से कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाली ग्रामीण महिलाएं बताती है कि उन्हें पहले तो लगातार भुगतान होता था,लेकिन लॉकडाउन के बाद से उन लोगों की भुगतान में समस्या होने लगी. लखपति देवी बताती है कि वे 67 किलो सूत काटकर विभाग को दे चुकी है, लेकिन उसका हिसाब अभी तक नहीं हुआ है. इसी तरह से निर्मला देवी ,सुनीता देवी, प्रमिला देवी ,शर्मिला देवी, राजंती देवी और पूनम देवी आदि महिलाओं का भी कहना है कि उन्हें लॉकडाउन में मजदूरी का भुगतान नहीं हो रहा है. जिस कारण से उनकी घर की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गयी है. वहीं खादी ग्रामोद्योग समिति के जिला सचिव शालिग्राम मंडल बताते हैं कि खादी ग्रामोद्योग समिति की ओर से मशीन और सूत ग्रामीणों को दिया जाता है, जिससे वह सूत काट कर वापस विभाग को लौटाते हैं. मेहनताना के रूप में उन्हें प्रति किलो 300 से 400 रुपये तक का भुगतान किया जाता है, लेकिन इस बार लॉकडाउन में दुकानें बंद रहने के कारण बिक्री प्रभावित हुई है. यही कारण है कि समय पर भुगतान नहीं किया जा सका है.

क्या है त्रिपुरारि मॉडल

जिले में दो तरह के मशीन पर सूत की कताई होती है. पहला मशीन है त्रिपुरारी मॉडल और दूसरा किसान मॉडल. किसान मॉडल पुराना मॉडल है जिसमें एक तरह से रेशम के धागे की कटाई होती है. वहीं त्रिपुरारी मॉडल की खासियत यह है कि इसमें सूती ऊनी और रेशमी तीनों ही धागों को काटने की व्यवस्था है. जिले के नवीनगर प्रखंड में किसान मॉडल चरखा का ज्यादा उपयोग होगा है, लेकिन अन्य प्रखंडों में खासकर मदनपुर के बनिया गांव में त्रिपुरारी मॉडल चरखा है जो चलाया जा रहा है. त्रिपुरारी मॉडल की कीमत 17 हजार रुपये हैं ,लेकिन ग्रामीणों से इसकी कोई कीमत नहीं ली जाती है. कितना होता है मुनाफा कच्चा सूत खादी ग्राम उद्योग की ओर से सप्लाई किया जाता है. जिसे धागों में बदलने की जिम्मेदारी ग्रामीणों की होती है. देखा जाये तो प्रति किलो उन्हें 300 से 400 रुपये मेहनताना का भुगतान किया जाता है और वे महीने में लगभग सात से आठ हजार रुपये सूत कटाई से कमा लेते हैं.

posted by ashish jha

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