अंधेरे में डूबा है दूसरों के घरों को रौशन करने वालों का घर

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अंधेरे में डूबा है दूसरों के घरों को रौशन करने वालों का घर दीप बनाने वाले कुम्हारों की स्थिति दयनीय मंहगाई के कारण खर्च अधिक, पर आमदनी कम फोटो :3, परिचय: चाक पर दीप बनाते कुम्हार फुलपरास. जो दूसरों के घरो में रौशनी देने का काम सदियों से करते आ रहेे हैं, उनके घरों में […]

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अंधेरे में डूबा है दूसरों के घरों को रौशन करने वालों का घर दीप बनाने वाले कुम्हारों की स्थिति दयनीय मंहगाई के कारण खर्च अधिक, पर आमदनी कम फोटो :3, परिचय: चाक पर दीप बनाते कुम्हार फुलपरास. जो दूसरों के घरो में रौशनी देने का काम सदियों से करते आ रहेे हैं, उनके घरों में आजादी की इतने अर्से बीतने के बाद भी विकास की रौशनी नहीं पहुंच सकी है. इनका घर आज भी अंधेरे में डूबा है. इन्हें उम्मीदों की रौशनी नहीं दिख रही है. अनुमंडल मुख्यालय के पंचायत के कुम्हार, जो अपने हुनर और अपनी कड़ी मेहनत कर दीप बना लोगों के घरों को उजाला करते रहे हैं. आज परिस्थिति ने इनके घरों को ही अंधेरा में ला दिया है. इस समुुदाय को अभी भी सरकार की ओर से बुनियादी सुविधा नहीं मिलने से सिर्फ अपने हाथ की कलाकारी और कड़ी मेहनत से चाक पर बनाये गये बर्तन बेचने से ही जीवन यापन होता है. अनुमंडल मुख्यालय के वार्ड नंबर एक में कई सालों पहले से करीब तीस परिवार कुम्हार बसे हैं. इनका जीवन यापन मिट्टी से बने बर्तन बेचकर होने वाली आमदनी पर ही निर्भर है. इन परिवारों को दिवाली और छठ का बेसब्री से इंतजार रहता है. इस पर्व में इन लोगों के बर्तनों की अच्छी बिक्री हो जाती है. जिससे कई माह तक इन लोगों का जीवन यापन सही तरीके से हो जाता है. मंहगाई से कारोबार प्रभावित : चाक पर दीप बनाने वाले मकेश्वर पंडित ने बताया कि अब हम लोग मिट्टी के बर्तन तथा दीप बनाने मे कोई फायदा नही हो रहा है. पहले मिट्टी भी गांव में मिल जाती थी. अभी मिट्टी भी खरीद कर दूसरे गांव से लानी होती है. इतनी कड़ी मेहनत करके मिट्टी के दीप सहित सभी सामान तैयार करने के बाद भी सही दाम नहीं मिलने से यह काम छोड़ने को मजबूर हो गये हैं. कहा कि आधुनिकता की मार भी हम परिवारों के उपर पड़ी है. अब तो अधिकांश लोग बिजली के नये नये उपकरण से घरों को रौशन कर लेते हैं. खानापूरी को ही लोग मिट्टी के दीप या ढिबरी खरीदते हैं. हम सभी परिवार साल मे तीन चार पर्व आने का इंतजार करते हैं. उसमे सबसे बड़ा पर्व दिवाली और छठ के लिये बर्तन बनाने को लेकर सभी परिवार मिल जुल कर दिन -रात बर्तन बनाते हैं. पहले मिट्टी के बर्तन को पकाने के लिये जलावन नहीं खरीदना पड़ता था. जलावन पूर्व में किसी को भी खरीदना नही पड़ता था. पर अभी सभी तैयार बर्तन को पकाने को लेकर जलावन खरीद कर लाना पड़ता है जो काफी महंगा हो गया है. सभी परिवारों की माली हालत काफी दयनीय हो गई है. गांव के मिश्री लाल पंडित, रामप्रंसाद पंडित, नवानी पंडित, फुलो पंडित, गंगा पंडित सहित अन्य लोगों ने बताया कि हम सभी के परिवारों को सरकार के ओर से आजादी के इतने अर्से बीत जाने के बाद भी माली हालत सुधार के लिये कोई योजना का लाभ नहीं दिया गया.

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