केज कल्चर से किसान बढ़ा सकते हैं मछली की पैदावार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :17 Dec 2017 5:48 AM (IST)
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प्रोत्साहन. किसान नयी विधि का उपयोग कर होंगे लाभान्वित मधुबनी : मछली उत्पादन में आंध्रप्रदेश और बंगाल जैसे राज्यों से आयात कम करने के लिये जल संसाधन का अधिकतम दोहन करने की योजना तैयार की गई है. सरकार जिले में मछली उत्पादन की अत्यधिक संभावना को देखते हुए फिश फॉर्मिंग, केज कल्चर सहित जल श्रोतों […]
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प्रोत्साहन. किसान नयी विधि का उपयोग कर होंगे लाभान्वित
मधुबनी : मछली उत्पादन में आंध्रप्रदेश और बंगाल जैसे राज्यों से आयात कम करने के लिये जल संसाधन का अधिकतम दोहन करने की योजना तैयार की गई है. सरकार जिले में मछली उत्पादन की अत्यधिक संभावना को देखते हुए फिश फॉर्मिंग, केज कल्चर सहित जल श्रोतों का उपयोग कर मछली उत्पादन बढ़ाये जाने के लिये किसानों को प्रोत्साहित किया जायेगा. गौरतलब है कि जिले में नई तकनीकी और राष्ट्रीय प्रोटीन मिशन के तहत तालाबों में मछली उत्पादन किये जाने की योजना तैयार की गई है.
इसके लिये सरकार मत्स्य पालक को पचास प्रतिशत अनुदान भी देगी. कारण केज कल्चर योजना के तहत कम समय में अधिक मछली का उत्पादन किया जा सकता है. इसके लिये सरकार मत्स्यजीवी समिति के सदस्यों को नाव और गीलमेंट जाल भी अनुदान पर देगी. केज कल्चर तकनीकी अपना कर किसान कम लागत में लाखों की कमाई कर सकते हैं.
ऐसे होता है केज कल्चर से मछली पालन. केज कल्चर के तहत तालाबों में निर्धारित जगहों पर 6 गुना चार के जाल लगाये जाते है. फिर जालों में सौ-सौ ग्राम की मछलियां पालने के लिये छोड़ी जाती है. मछलियों को प्रतिदिन आहार भी दिया जायेगा. साथ ही केज कल्चर में पंगेसियस प्रजाति की मछली का पालन किया जाता है. इस तकनीक से मछली पालन करने पर दस माह में एक से सवा किलोग्राम की मछली तैयार हो जाती है. एक केज कल्चर से लगभग चार हजार किलोग्राम मछली का उत्पादन होता है.
पंगेसियस में दोगुना है प्रोटीन.
पंगेसियस में अन्य मछलियों की तुलना में दोगुना प्रोटीन होता हे. एक किलो की पंगेसियस में एक सौ पचास ग्राम प्रोटीन होता है. इसमें वसा की मात्रा भी अन्य मछलियों की तुलना में कम होती है. और यह सस्ती भी है.
क्या है केज कल्चर
केज कल्चर के तहत तालाबों में निर्धारित जगहों पर फ्लोरिंग ब्लॉक बनाये जाते हैं. सभी ब्लॉक इंटरलॉकिंग रहते है. फ्लोरिंग ब्लॉक का लगभग तीन मीटर हिस्सा पानी में डूबा रहता है और एक मीटर ऊपर तैरते हुए दिखाई देता है. इस तकनीक से मछली पालन करने पर मछलियां इधर उधर नहीं भटकती है. और न ही बड़ी मछली का शिकार बनती है.
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