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जिओ बैग में बालू की जगह मिट्टी भर हो रहा कटावरोधी कार्य

Updated at : 14 May 2024 9:27 PM (IST)
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जिओ बैग में बालू की जगह मिट्टी भर हो रहा कटावरोधी कार्य

जिओ बैग में बालू की जगह मिट्टी भर हो रहा कटावरोधी कार्य

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चौसा. प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत मोरसंडा पंचायत सहित आसपास का इलाका बाढ़ प्रभावित है. यहां गंगा नदी हर साल तबाही मचाती है. सैकड़ों एकड़ खेतों में लगी फसल बाढ़ के कारण बर्बाद हो जाती है. बाढ़ से बचाव को लेकर बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग की ओर से नदी के तट पर बसे ऐसे गांवों में कटावरोधी कार्य किया जा रहा है.ग्रामीणों ने कहा कि जियो बैग में बालू की जगह मिट्टी भर कटावरोधी कार्य का सिर्फ कोरम पूरा किया जा रहा है. गांवों को कटाव से बचाव के लिए लाया गया जियो बैग की क्वालिटी अच्छी नहीं है. कटाव के रोकथाम के लिए बोल्डर स्टेपिंग का कार्य नहीं कराया जा रहा है. केवल प्लास्टिक की बोरियों में मिट्टी भरकर कटावरोधी कार्य किया जा रहा है, जबकि गंगा में कटावरोधी कार्यों के लिए विशेष प्रकार के जिओ बैग में बालू डालने का विभागीय निर्देश है. ग्रामीणों ने विभाग व कार्य करा रहे संवेदक पर कटाव से बचाने के नाम पर लूटपाट का आरोप लगाया है. ग्रामीणों का कहना है कि अमनी गांव के बलौरा घाट नदी किनारे मिट्टी बालू से प्लास्टिक की बोरियों से प्रशासन द्वारा कटान रोकने का काम कराया गया था. गंगा में आये उफान के साथ ही बोरियों के चिथड़े उड़ गये, जो बोरे लगाये जाने थे, उसे नहीं लगाया गया. बोरे में बालू की जगह मिट्टी डालकर लगाने से यह पानी पड़ने के साथ बहकर निकल जाती है. इसकी आयु साल भर भी नहीं होती. मिट जायेगा गांवों का अस्तित्व- पिछले कई वर्षों से ऐसे ही बचाव कार्य किया जा रहा है, जो तेज बारिश को भी नहीं झेल पाता है. गौरतलब है कि दियारा क्षेत्र के भागलपुर और मधेपुरा सीमा पर स्थित अमनी बासा, करैलीया, मुसहरी सहित अन्य गांवों की हजारों की आबादी बलौरा घाट नदी से सटकर बसी हुई है. ये गांव हर साल नदी में आने वाली विकराल बाढ़ की चपेट में आते रहते हैं. ग्रामीण मनोज मुनी, रंजीत मुनी, बिलाश मुनी, संजय मुनी, दिनेश मुनी ने संबंधित अधिकारियों पर मुआयना करने के बाद भी ठोस कदम नहीं उठाने पर आपत्ति जतायी है. ग्रामीणों ने कहा कि कटाव स्थल को चिह्नित करने के लिए हर साल पदाधिकारी घर बैठे ही सर्वे कर देते हैं. लोगों ने बताया कि कोसी के बलौरा घाट नदी में कई जगहों पर भयंकर कटाव होता है. ऐसे जगहों को पूर्व में ही चिह्नित किया गया था, लेकिन इन जगहों पर प्लास्टिक की हजारों बोरियों में बालू भरकर रखा गया है, जिससे बचाव कार्य संभव नहीं है. कुछ जगहों पर 30-30 मीटर का रिपेयरिंग होना है. अभी दो सौ मीटर का कार्य चल रहा है, जिसकी लागत एक करोड 47 लाख रुपये है. कार्य गुणवत्तापूर्ण हो रहा है. रजनी रंजन, कनीय अभियंता, जल संसाधन विभाग

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