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महान गणितज्ञ डाॅ वशिष्ठ को बर्कले विश्वविद्यालय ने कहा था जीनियसों का जीनियस

Updated at : 13 Nov 2024 8:02 PM (IST)
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महान गणितज्ञ डाॅ वशिष्ठ को बर्कले विश्वविद्यालय ने कहा था जीनियसों का जीनियस

महान गणितज्ञ डाॅ वशिष्ठ को बर्कले विश्वविद्यालय ने कहा था जीनियसों का जीनियस

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प्रतिनिधि , मधेपुरा

भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर रहे गणितज्ञ पद्म डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी अद्वितीय प्रतिभा की चर्चा आज भी लोगों के जुबान पर कायम है. दो अप्रैल 1942 को भोजपुर में जन्मे डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह नेतरहाट, पटना साइंस कॉलेज, कलैफॉर्निया यूनिवर्सिटी जैसे नामचीन राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय संस्थान से शिक्षा प्राप्त की थी. डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह की प्रतिभा भी उसी दर्जे की थी. कहा जाता है कि गलत पढ़ाने पर वो कई बार शिक्षक को टोक देते थे और उसे कई तरह से साबित भी करते थे. यह बात जब कॉलेज के प्रधानाचार्य को पता चली तो उन्होंने समझदारी का परिचय देते हुए डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह की परीक्षा ली और इनकी विलक्षण प्रतिभा देख दंग रह गये.

जॉन कैली के पहल पर अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से की पीएचडी

डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह के कॉलेज के प्रधानाचार्य ने कई स्तरों पर उनकी मदद भी की और कई विशेष सुविधा मुहैया भी करायी. इनकी अलग से विशेष परीक्षा भी ली गयी, जिसमें उन्होंने सारी एकेडमिक रिकॉर्ड तोड दिया. तत्कालीन सीनेट ने उनके लिए विशेष व्यवस्था पर मोहर लगायी थी. कॉलेज के प्राचार्य की पहल पर जब कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैरी ने इनकी प्रतिभा को देखा तो इनको अमेरिका ले गये, जहां विश्व के नामचीन विश्वविद्यालयों में शुमार कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से इन्होंने पीएचडी की और वहीं वाशिंगटन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में काम किया, लेकिन वतन भारत से मोहब्बत कुछ ऐसी थी कि उनका मन वहां नहीं लग पा रहा था. आखिरकार वर्ष 1972 में हमेशा के लिए भारत लौट आए और आईआईटी कानपुर में लेक्चरर की सेवा देनी शुरू की. नासा में भी उन्होंने काम किया था.

आइंस्टीन व गॉस के सिद्धांतों को दिया था तार्किक चुनौती

डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह वर्ष 1973 में वैवाहिक बंधन में बंधे और अगले ही वर्ष 1974 में दौरा पड़ा, फिर रांची में इलाज शुरू हुआ. वर्ष 1989 में अचानक गायब हुये, फिर अत्यंत दयनीय हालात में वर्ष 1993 में मिले. इलाज जारी रहा. इसी बीच वर्ष 1997 में खतरनाक मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया ने उन्हें जकड़ लिया, जिसका परिणाम यह रहा कि गणित की दुनिया का चमकता सितारा गुमनामी की जिंदगी जीने को विवश हो गया. उनकी प्रतिभा इस दर्जे की थी कि विश्व के अनगिनत नामचीन विश्वविद्यालय उन्हें अपने यहां सेवा देने का आग्रह करते रहे. बर्कले यूनिवर्सिटी में तो उन्होंने जीनियसो का जीनियस के रूप में ख्याति प्राप्त थी. आइंस्टीन व गॉस के सिद्धांतों को उन्होंने तार्किक चुनौती देकर सबको हैरान कर दिया था.

डॉ वशिष्ठ वर्ष 2014 में बने थे बीएनएमयू का विजिटिंग प्रोफेसर

बीमार होने दौरान विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह के इलाज व उनकी प्रतिभा के सदुपयोग को लेकर पहल करने की मांग विभिन्न स्तरों पर उठती रही, जिस पर संज्ञान लेते हुए तत्कालीन सांसद व बीएनएमयू की सीनेट सदस्य रंजीत रंजन ने विभिन्न स्तरों पर पहल शुरू की, परिणाम स्वरूप गुमनामी की जिंदगी जी रहे डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह को 2013-14 में बीएनएमयू का विजिटिंग प्रोफेसर बनाया गया. विश्वविद्यालय द्वारा तय टीम ने डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह के आवास पर जाकर बड़े सम्मान के साथ बीएनएमयू लाने का काम किया. उस समय का आलम यह था कि बीएनएमयू परिसर में पदाधिकारी, गणमान्य हस्ती, छात्र प्रतिनिधि व छात्र देर शाम होने के बाद भी उनके स्वागत में गर्मजोशी से परिसर में बने रहे.

डॉ वशिष्ठ के बीएनएमयू मुख्यालय आते ही किया गया था गर्मजोशी से स्वागत

डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह के बीएनएमयू मुख्यालय आते ही गर्मजोशी से उनका स्वागत किया गया व अतिथिशाला में ठहराया गया, जहां हर कोई उनको देखने व मिलने को आतुर नजर आ रहा था. चार्ज लेने के बाद परिसर में ही छात्रों व शिक्षकों से उन्होंने संवाद भी किया. उस समय बीएनएमयू की फिजा ही बदली बदली सी थी. विश्वविद्यालय के इस पहल की चर्चा प्रांतीय व राष्ट्रीय स्तर के मीडिया में छाई रही. उसके बाद तय किया गया कि वो घर जायेंगे फिर पूरी तैयारी से आयेंगे. इसी वादे इरादे के साथ उन्हें भेजा गया, लेकिन फिर उसके बाद वह दुबारा बीएनएमयू नहीं लौट सके. उनको लाने को लेकर कई बार आंदोलन हुआ. वर्ष 2015 में हुए बीएनएमयू के ऐतिहासिक आंदोलन का मुख्य मुद्दा भी डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह को लाने का था.

डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह ने 14 नवंबर 2019 को ली आखिरी सांस

बीएनएमयू ने डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह को विश्वविद्यालय लाने के लिए एक पहल को लेकर एक टीम भी बनायी, जो कागज पर ही सिमट कर रह गयी और इस तरह से डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह के इलाज की आर्थिक समस्या दूर होने व उनके विलक्षण प्रतिभा से लाभ मिलने का अवसर हाथ से जाता रहा. इसके बाद पटना में उनके कुछ चाहने वालों ने उनके आवास, भोजन की व्यवस्था के साथ उनके इलाज की सकारात्मक मुहिम शुरू की, जिसे कई स्तरों पर सहयोग भी मिला. अचानक उनकी तबियत बिगड़ी व उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान ही 14 नवंबर 2019 को उन्होंने आखिरी सांस ली.

निधन के बाद नहीं हुई थी एंबुलेंस की व्यवस्था

दुखद यह रहा कि बिहार के इस कोहिनूर डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह को मौत के बाद भी कोई सुधि लेने वाला नहीं था. उनकी लाश को एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं हुई. मीडिया में चर्चा आने के बाद पटना जिला प्रशासन के सहयोग से व्यवस्था हो पाई. निधन के बाद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत कई गणमान्य हस्ती ने शोक संवेदना व्यक्त की. इस तरह से गणित का चमकता सितारा अपनी जिंदगी का आखिरी दौर गुमनामी के साथ बिता गया.

वर्ष 2020 में मिला था पद्म श्री का सम्मान

भारत सरकार ने डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह के विलक्षण प्रतिभा व उनके योगदान को सम्मान देते हुए वर्ष 2020 के पद्म श्री सम्मान मृत्युपरांत देने की घोषणा की, जो उनके परिजन ने प्राप्त किया. डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह के प्रतिभा का कद ऐसा था कि कभी तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने यहां तक कहा था कि डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह के इलाज की हर संभव कोशिश की जायेगी. आज बेशक गणित की दुनिया का अनमोल सितारा डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी उपलब्धि आज भी प्रांत व मुल्क के गौरवशाली अध्याय की मजबूत कड़ी है.

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