दियरा की जमीन पर अपराधियों का कब्जा

Published at :11 Jan 2016 7:03 PM (IST)
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दियरा की जमीन पर अपराधियों का कब्जा

दियरा की जमीन पर अपराधियों का कब्जा उदाकिशुनगंज. दियारा में सोमवार को हुए पुलिस के फ्लेग मार्च की जरूरत इस इलाकों महीनों से थी. हालांकि केवल फ्लेग मार्च से ही स्थिति में सुधार नहीं होगा. पुलिस को इस क्षेत्र में सख्ती से कैंप करना होगा. इस क्षेत्र में किसानों की स्थिति दयनीय होती जा रही […]

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दियरा की जमीन पर अपराधियों का कब्जा उदाकिशुनगंज. दियारा में सोमवार को हुए पुलिस के फ्लेग मार्च की जरूरत इस इलाकों महीनों से थी. हालांकि केवल फ्लेग मार्च से ही स्थिति में सुधार नहीं होगा. पुलिस को इस क्षेत्र में सख्ती से कैंप करना होगा. इस क्षेत्र में किसानों की स्थिति दयनीय होती जा रही है. वास्तविक किसान भूमिहीन होते चले जा रहे है. जिस जमीन का बटाई कर बटेदार अपने परिवार का भरण पोषण करते थे उसके सामने भी आर्थिक तंगी की समस्या उत्पन्न हो गयी है. मक्का फसल की बुआई शुरू होते ही अत्याधुनिक हथियार बंद अंतर जिला आपराधिक गिरोहों के द्वारा अवैध कब्जा किया जा रहा है. अपराधियों की घोड़े की टाप व बंदकों की गूंजती आवाज से कोसी का दियारा इलाका थर्रा उठा है. ऐसी स्थिति में किसान व बटेदार डरे सहमे हुए हैं. — इन जमींदारों की है जमीन — दियरा क्षेत्र में भागलपुर जिले के सिहपुर थाना अंतर्गत अमरपुर गांव के महथी सनगही, मनोज सनगही, अश्वनी सनगही, उदय सनगही व विष्णु सनगही का नौ सौ एकड़ जमीन है. इस जमीन पर जमीनदारों द्वारा लगभग 50 बटेदारों से खेती करवाई जाती थी. ये सभी बटेदार फुलौत ओपी पंदही वासा, सपनी, सपनी मुसहरी, अहौती, रतवारा थाना के गंगापुर, खरौआ वासा, हड़जोरा गांव के रहने वाले है. उस जमीन में जल जमाव रहने के कारण मछली पालन का काम किया जाता है. — इन अपराधियों द्वारा कब्जा की जाती है जमीन — भागलपुर जिले के नरायणपुर के दुर्नाम अपराधी सरगना शबनम यादव, रतवारा थाना अंतर्गत लुटना वासा के प्रफुल्ल पटेल, चौसा थाना के तहत घसकपुर गांव के अशोक ठाकुर गिरोह द्वारा जमीन पर अवैध कब्जा की जा रही है. जिससे जमीनदार व बटायेदार हताश और निराश है. — मक्का फसल लगाने को बेताब अपराधी — मक्का फसल लगाने के लिए जुताई बटेदार द्वारा की गयी. जब बौनी की बारी आयी तो उससे पहले ही अपराधी उस खेतों में मक्का बीज की रौपनी कर दिया. डर से जमीनदार व बटायदार मुंह भी नहीं खोल पा रहा है. अगर अपनी जुबान खोला तो जिंदगी से हाथ धोना पड़ जायेगा. यानी खर्च कर खेत की जुताई बटेदार ने किया पर मक्का लगाने का काम अपराधी ने किया. यह तो इस क्षेत्र के किसानों के लिए अभिशाप बन गया है. — मछली माही करने जाते है अपराधी — हर वर्ष आने वाले बाढ़ का पानी निचली जमीन में सालों भर जमा रहता है उसमें लाखों रूपये की मछली हर वर्ष जनवरी से फरवरी माह तक में अपराधी माही कर ले जाते है. जिससे भू स्वामी को कोई लाभ नहीं हुआ करता है. दिन प्रतिदिन भूस्वामियों की आर्थिक दशा बदतर और अपराधियों बेहतर होती जा रही है. — पुलिस से नहीं कर पाते है शिकायत — अपराधियों के भय से किसान पुलिस से भी शिकायत नहीं कर पाते है. चूंकि शिकायत दर्ज करवाने के बावजूद भी अपराधियों को पुलिस गिरफ्तार कर पाने में अक्षम हो जाती है. फिर किसानों के जान पर खतरा आना स्वभाविक ही है. चूंकि कोसी के दियरा क्षेत्र में अपराधियों का शासन चला करता है. भौगोलिक बनावट भी काफी पेंचिदा है. इस क्षेत्र में घटना को अंजाम देकर अपराधी कोसी के जरिये भागलपुर जिला क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है. जहां काश और सघन झउआ जंगल अपराधियों के छीपे रहने का अच्छा ठिकाना बन गया है. जबकि पश्चिम दिशा में खगडि़या जिले का क्षेत्र है. — भूमि कब्जा का पुराना इतिहास — जमीनदारों को जमीन से बेदखल करने का मुहीम 1970 ई से ही शुरू कर दिया था. जिसका नेतृत्व चौसा थाना के भनपुरा वासा के राम चंद्र सिंह और खौपडि़या गांव के गन्नु राय किया करते थे. उस समय यह कहावत प्रचलित था कि राम चंद्र सिंह का घोड़ा और गन्नु राय का कोड़ा दोनों का शासन चौसा के लौआ लगान से लेकर खगडि़या जिले के बैलदोर थाना के बारून गांव तक चला करता था. लेकिन तब और अब की परिस्थिति में काफी फर्क देखा जा रहा है. रामचंद्र सिंह और गन्नु राय हथियार उठाया था. गरीबों को खुशहाल करने के लिए. जमीनदारों की जमीन को दखल कर गरीबों के बीच बांट दिया करते थे. किंतु वर्तमान में जो लोग अवैध हथियार उठाया है वो अपनी खुशहाली व तरक्की के लिए. दोनों ने गरीबों को उपर उठाते – उठाते तो गरीब हो गये. इस तरह यहां के किसानों की जमीन पर अवैध कब्जा करने का पुराना इतिहास रहा है. किसानों को प्रशासनिक सहायता नहीं मिला करता है. अपराधियों के भय से ही इस क्षेत्र के किसान वर्ष 2000 से ही कलाई की खेती करना छोड़ दिया. जिस फसल से काफी मुनाफा हुआ करता था. अधिक मुनाफा होने के कारण ही कलाई फसल को काला सोना भी कहा जता था. लेकिन अपराधियों के भय से कलाई की खेती करना ही बंद कर दिया गया.

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