अब क्षेत्र के अन्नदाताओं की बढ़ीं मुश्किलें

Published at :26 Nov 2015 6:35 PM (IST)
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अब क्षेत्र के अन्नदाताओं की बढ़ीं मुश्किलें

उदाकिशुनगंज : राज्य सरकार के किसान विरोधी नीति के कारण ही प्रखंड के मंजौरा बाजार स्थित कोसी परियोजना कार्यालय बंद कर दिये जाने से किसानों को काफी नुकसान उठान पड़ रहा है. खाली पड़े भवन भी खंडहर में तब्दील हो चुका है. 1964 ई में नहर छहर खुदाई के बाद 1967 में मंजौरा बाजार में […]

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उदाकिशुनगंज : राज्य सरकार के किसान विरोधी नीति के कारण ही प्रखंड के मंजौरा बाजार स्थित कोसी परियोजना कार्यालय बंद कर दिये जाने से किसानों को काफी नुकसान उठान पड़ रहा है.

खाली पड़े भवन भी खंडहर में तब्दील हो चुका है. 1964 ई में नहर छहर खुदाई के बाद 1967 में मंजौरा बाजार में राज्य सरकार दो बीघा जमीन के अधिग्रहण कर कोसी परियोजना कार्यालय की स्थापना हुई की थी. जब तक सुचारू व व्यवस्थित तरीका से पांच भवनों का निर्माण करवाया गया था.

उक्त कार्यालय में एक कनीय अभियंता, वर्क सरकार, अमीन, बांध चौकीदार व तहसीलदार के अलावे क्लर्क पदस्थापित हुआ करते थे, जो नियमित नहरों की देखरेख किया करते थे. किसानों को होता था लाभ उस समय नहरों में पानी रहने से किसान कम किराया चुकाये ही फसलों का पटवन किया करते थे. राज्य सरकार के किसान विरोधी नीति के कारण ही 1992 ई से सभी पद स्थापित कर्मियों को स्थायी तौर पर स्थानांतरित कर दिया गया. पर भवन का रख रखाव भी नहीं किया गया.

लोग खिड़की किवार तक उखाड़ कर ले गये. भवन खंडहर बन चुका है. सरकार चाह ले तो अभी भी उक्त कार्यालय को चालू कराया जा सकता है. लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधि को इसके लिए आगे आना होगा. किसान हित में अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाना होगा.

सरकार को हुआ आर्थिक नुकसान जब से इस कार्यालय को बंद किया गया तब से नहरों में पानी देना भी बंद कर दिया गया. जब नहरों में पानी दिया जाता था तब सरकार किसानों से छह रुपये प्रति बीघा पटवन पैक्स तहसीलदार के माध्यम से वसूला करती थी. इतना ही नहीं नहर व बगल वाली पड़ती जमीन को सलाना किसानों के हाथ डाक द्वारा बंदोबस्ती भी करती थी.

जिससे सरकार को अच्छी आमदनी होती थी. किसान नहर व नहर की बंदोबस्ती जमीन लेकर मवेशी चारा उगाने का काम करते थे. लेकिन अब तो स्थिति ऐसी हो हो गयी है नहरों पर लोग घर बना कर रहने लगे है. जबकि नहर बांध के नीचे वाली जमीन का अतिक्रमण कर लोग फसल उगाते है. जिसका कोई टैक्स भी लोगों को नहीं देना पड़ता है.

इधर चार पांच वर्ष से नहरों में पानी तो दिया जाता है लेकिन तहसीलदार पदस्थापित नहीं रहने के कारण पटवन टैक्स की वसूली सरकार नहीं कर पा रही है. कार्यालय की जमीन का किया जा रहा है अतिक्रमण देख रेख नहीं किये जाने के कारण कार्यालय की जमीन को लोग बड़े पैमाने पर अतिक्रमण कर लिया है. अगर ऐसी स्थिति बनी रही तो बची जमीन का भी अतिक्रमण कर लिया जायेगा. बाद में जिसे खाली कराने में प्रशासन को काफी कठिनाई हो सकती है.

इस तरह एक तरफ जहां नहरों को किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है तो दूसरी तरफ सरकार को भी आर्थिक नुकसान हो रहा है. यहां पुन: कार्यालय चालू हो सके इसके लिए क्षेत्रीय विधायक को आगे आने की जरूरत है. इससे किसानों को भी फायदा होगा. समय – समय पर नहरों पर पानी आने से किसान सस्ता दर पर फसलों की सिंचाई कर सकेंगे.

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