पटोरी दुर्गा मां के दर्शन से ही दुख होते हैं दूर

Published at :14 Oct 2015 6:45 PM (IST)
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पटोरी दुर्गा मां के दर्शन से ही दुख होते हैं दूर

पटोरी दुर्गा मां के दर्शन से ही दुख होते हैं दूर प्रतिनिधि. सिंहेश्वरयूं तो मां का हर रूप न्यारा है लेकिन पटोरी दुर्गा माता के दरबार में सबकी मन्नतें पूरी होती है. जिले के सिंहेश्वर प्रखंड के पटोरी पंचायत स्थित दुर्गा मंदिर में वर्षों की से मां की पूजा-अर्चना होती आ रही है. यहां के […]

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पटोरी दुर्गा मां के दर्शन से ही दुख होते हैं दूर प्रतिनिधि. सिंहेश्वरयूं तो मां का हर रूप न्यारा है लेकिन पटोरी दुर्गा माता के दरबार में सबकी मन्नतें पूरी होती है. जिले के सिंहेश्वर प्रखंड के पटोरी पंचायत स्थित दुर्गा मंदिर में वर्षों की से मां की पूजा-अर्चना होती आ रही है. यहां के प्रति लोगों के मन में काफी श्रद्धा और विश्वास है. हालांकि, पटोरी की दुर्गा माता के सामने (नर बलि) भी दी जाती है. हालांकि यह प्रतीकात्मक होती है. काफी पहले नर बलि देने की प्रथा थी. बाद में यह कुप्रथा तो बंद हो गयी लेकिन आज भी यहां पीठार से नर बना उसमें प्राण प्रतिष्ठित कर प्रतीकात्मक तौर पर मां दुर्गा के सामने उसकी बलि दी जाती है. सत्रहवीं सदी में मां दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना की गयी थी. इसे शक्ति उपासना व श्रद्धा का केेंद्र माना जाता है. यहां भगवती की पूजा विशिष्ट पुराने तांत्रिक पद्धति से की जाती है. ग्रामीणों के अनुसार इस मंदिर में भगवती की स्थापना 17 वीं सदी में तत्कालीन जमींदार बाबू हेम नारायण सिंह ने पुत्र प्राप्ति के लिए किया था. यहां छाग, महिष एवं नर बलि की प्रथा थी. लेकिन18 वीं सदी में ही नर बलि की प्रथा बंद कर दी गयी. तब से पीठार का नर बना उसमें प्राण प्रतिष्ठा डाल कर महाअष्टमी पूजा की रात्रि में प्रतीकात्मक तौर पर नर बलि दी जाती है. अब महिष की बलि भी बंद कर दी गयी है. परंपरा निर्वहन के तौर पर महिष का केवल कान काट लिया जाता है. यहां की पूजा पद्धति बनाने वाले पंडित को चौहान वंशज के पूर्वजों ने पांच एकड़ जमीन दान में दिया था. सवा लाख छाग की बलि के बाद स्थापित हुई थी शक्ति कहा जाता है कि चौहान वंशज के पूर्वज बाबू हेम नारायण सिंह ने पुत्र की प्राप्ति के लिए अररिया जिला के रानीगंज प्रखंड स्थित गुलमंती ड्योढ़ी दुर्गा स्थान में पूजा अर्चना कर भगवती को वहां से लाकर पटोरी गांव में स्थापित किया था. भगवती को लाने के क्रम में प्रत्येक कदम पर तांत्रिक पद्धति से पूजा पाठ कर एक छाग की बलि दी गयी थी. इस तरह लगभग सवा लाख छाग की बलि दी गयी थी. छाग नहीं मिलने पर कुम्हर और झींगा की बलि दी गयी. मन्नतें पूरी करती पटोरी की मां दुर्गा यहां की भगवती की महिमा अपरंपार है. दुर्गा पूजा के अवसर पर हर वर्ष तीन दिनों तक भव्य मेला का आयोजन किया जाता है. इस अवसर पर आसपास के गांवों सहित दूर दराज के लोग हजारों की संख्या में बलि देते हैं.

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