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तीन लाख मजदूर हर साल जाते हैं परदेस

Updated at : 14 Jun 2019 7:15 AM (IST)
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तीन लाख मजदूर हर साल जाते हैं परदेस

मधेपुरा : एक सौ दिन रो जगार की गारंटी देने की योजना की खराब प्रगति से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यहां फ्लॉप साबित हो रही है. मजदूरों को काम नहीं मिलने से अब उन्होंने महानगरों के लिए काम के तलाश में पलायन करना शुरू कर दिया है. यह संकट अब अधिक गहरा […]

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मधेपुरा : एक सौ दिन रो जगार की गारंटी देने की योजना की खराब प्रगति से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यहां फ्लॉप साबित हो रही है. मजदूरों को काम नहीं मिलने से अब उन्होंने महानगरों के लिए काम के तलाश में पलायन करना शुरू कर दिया है.

यह संकट अब अधिक गहरा गया है. मनरेगा केंद्र सरकार की एकलौती योजना है, जिसे बजट के आधार पर क्रियान्वित नहीं किया जाता है, बल्कि काम के आधार पर बजट का आवंटन समय-समय पर किया जाता है. यह योजना मजदूरों के गांव से पलायन को रोकने के लिए शुरू की गयी थी. यह मकसद मजदूरों को समय से काम नहीं मिलने के कारण प्रभावित हो रहा है.
कहते हैं आंकड़े : आंकड़ों पर गौर करें, तो जिले में जॉब कार्ड धारकों की संख्या तीन लाख 88 हजार 868 है. प्रत्येक जॉब कार्ड पर आमतौर पर दो से तीन मजदूरों की संख्या रहती है. ऐसे में जिले में मजदूरों की संख्या तकरीबन नौ से दस लाख तक है. ये लोग रोजगार के लिए हर माह कतार में रहते हैं.
इन मजदूरों ने ग्राम पंचायत से लेकर ब्लॉक कार्यालय तक चक्कर लगाने के बाद भी काम नहीं मिलने के कारण अब पलायन करना शुरू कर दिया है. प्रत्येक माह हजारों की संख्या में मजदूर पलायन कर रहे हैं. जिले में मजदूरों की संख्या नौ लाख से अधिक है. इन्हें हर दिन रोजगार की तलाश रहती है. यह संख्या डीआरडीए कार्यालय की अनुमानित है.
तीन लाख से अधिक मजदूर हर वर्ष करते हैं पलायन : जिले से हर वर्ष लगभग तीन लाख से अधिक मजदूर पलायन करते हैं. साथ ही अगर अगल-बगल के सुपौल और सहरसा जिले के आंकड़ों को भी जोड़ दिया जाय तो यह संख्या आठ से नौ लाख के बीच की हो जाती है.
इसके कारण सहरसा से अमृतसर जाने वाली ट्रेन, जनसाधारण एक्सप्रेस व जनसेवा एक्सप्रेस में लोगों का तांता लगा रहता है. हालांकि मजदूरों की भीड़ को देखते हुए रेल प्रशासन के द्वारा नई ट्रेन का संचालन भी किया जाता है. मजदूरों के इस कदर पलायन से बिहार हर वर्ष रोपाई से लेकर कटाई तक में मजदूरों की कमी को झेलता है.
जिले के मजदूर घर छोड़ने को मजबूर : मधेपुरा के सुखासन निवासी गणेश जो कि पेशे से मजदूर है बताते हैं की बाहर पंजाब में मजदूरी भी यहां से ज्यादा मिलती है तथा काम का निरंतरता भी बरकरार रहता है. यहां जॉब कार्ड होने के बावजूद हमें काम के लिए लगातार प्रखंड कार्यालय व मुखिया के पास बार-बार दौड़ना पड़ता है. फिर भी काम नहीं मिलता है. इस स्थिति में बाहर जाना हमारी मजबूरी बन जाती है.
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