संसार पोखर से मिली पालकालीन जाम्भल प्रतिमा, संग्रहालय में सुरक्षित

Edited by Pintu Pranav
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संसार पोखर से बरामद जाम्भल की खंडित प्रतिमा

Pala Period: लखीसराय जिले के संसार पोखर के समीप मिट्टी की खुदाई के दौरान मिली प्राचीन प्रतिमा को सुरक्षित रूप से लखीसराय संग्रहालय में स्थापित कर दिया गया है. लगभग दो फीट ऊंची काले पत्थर की इस दुर्लभ मूर्ति की पहचान ‘जाम्भल’ प्रतिमा के रूप में की गई है. विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतिमा 9वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के पाल काल की हो सकती है और उस दौर की उत्कृष्ट मूर्तिकला का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जा रही है.

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लखीसराय से राजीव मुरारी सिन्हा की रिपोर्ट:

Pala Period: लखीसराय की धरती ने एक बार फिर अपने गौरवशाली इतिहास की झलक दिखाई है. संसार पोखर की खुदाई के दौरान मिली काले पत्थर की दुर्लभ प्रतिमा ने इतिहासकारों और पुरातत्व प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. प्रारंभिक जांच में प्रतिमा की पहचान पालकालीन जाम्भल मूर्ति के रूप में हुई है, जो 9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच की मानी जा रही है. यह खोज न सिर्फ जिले की ऐतिहासिक विरासत को समृद्ध करती है, बल्कि प्राचीन बिहार की सांस्कृतिक धरोहर पर भी नई रोशनी डालती है..

खुदाई के दौरान सामने आई ऐतिहासिक धरोहर

जानकारी के अनुसार 17 जून को संसार पोखर क्षेत्र में मिट्टी की खुदाई के दौरान यह प्राचीन प्रतिमा बरामद हुई थी. प्रतिमा मिलने की सूचना प्रशासन को दी गई, जिसके बाद सुरक्षा के दृष्टिकोण से इसे कवैया थाना में सुरक्षित रखा गया. मामले की जानकारी मिलने पर संग्रहालय प्रशासन ने इसकी जांच प्रक्रिया शुरू की.

वैधानिक प्रक्रिया के बाद संग्रहालय को सौंपी गई मूर्ति

जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सह सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. मृणाल रंजन ने बताया कि अनुमंडल प्रशासन से सूचना प्राप्त होने के बाद प्रतिमा का सत्यापन कराया गया. शनिवार को कवैया थानाध्यक्ष रंधीर कुमार ने सभी औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी करते हुए प्रतिमा को विधिवत लखीसराय संग्रहालय प्रशासन के हवाले कर दिया.

पालकालीन जाम्भल प्रतिमा होने की पुष्टि

संग्रहालय के तकनीकी सहायक राजेश कुमार द्वारा की गई प्रारंभिक जांच में प्रतिमा की पहचान जाम्भल के रूप में की गई है. जाम्भल को बौद्ध परंपरा में धन और समृद्धि के देवता के रूप में माना जाता है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह प्रतिमा पाल वंश के शासनकाल में निर्मित की गई थी, जो बिहार और पूर्वी भारत में कला एवं संस्कृति के उत्कर्ष का काल माना जाता है.

खंडित होने के बावजूद दिखती है अद्भुत शिल्पकला

प्रतिमा का सिर, दाहिना हाथ और बाएं हाथ का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त है, लेकिन शेष भाग पर उकेरी गई नक्काशी आज भी उस समय की उत्कृष्ट शिल्प परंपरा की कहानी बयां करती है. प्रतिमा की कलात्मक विशेषताएं इसे पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं.

दर्शकों के लिए जल्द होगी प्रदर्शित

संग्रहालय प्रशासन ने बताया कि प्रतिमा के संरक्षण और आवश्यक तकनीकी प्रक्रिया पूरी करने के बाद इसे आम लोगों के अवलोकन के लिए प्रदर्शित किया जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज लखीसराय की ऐतिहासिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में मददगार साबित हो सकती है.

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