लखीसराय के बड़हिया स्थित 7वीं सदी के प्राचीन मां काली मंदिर की महिमा, जहां हर मुराद पूरी होने की है मान्यता

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लखीसराय के बड़हिया स्थित 7वीं सदी के प्राचीन मां काली मंदिर की महिमा, जहां हर मुराद पूरी होने की है मान्यता

प्राचीन मां काली मंदिर

Aaj Ka Darshan: लखीसराय के बड़हिया स्थित 7वीं सदी के प्राचीन मां काली मंदिर का इतिहास, धार्मिक महत्व और मान्यताएं जानिए. मंगलवार और शनिवार को यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

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Aaj Ka Darshan: बिहार में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जहां केवल पूजा ही नहीं होती, बल्कि सदियों पुरानी आस्था आज भी जीवंत दिखाई देती है. लखीसराय जिले के बड़हिया में स्थित मां काली मंदिर भी ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है. यह मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है, बल्कि इस विश्वास के लिए भी प्रसिद्ध है कि यहां सच्चे मन से मां काली के दरबार में आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है.

यही कारण है कि हर दिन यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है. मंगलवार और शनिवार को तो मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि पूरा इलाका भक्तिमय माहौल में डूब जाता है. दूर-दराज के जिलों से भी लोग मां के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं और अपनी सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली तथा जीवन की बाधाओं को दूर करने की कामना करते हैं.

7वीं सदी से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

बड़हिया का यह मां काली मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि बिहार की ऐतिहासिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर की स्थापना 7वीं सदी में पालवंश के शासनकाल के दौरान हुई थी.

कहा जाता है कि बड़हिया के संस्थापक जयजय ठाकुर और पृथु ठाकुर शक्ति के बड़े उपासक थे. उन्होंने बड़हिया को अपना स्थायी निवास बनाया और मां काली की आराधना के लिए इस मंदिर की स्थापना करवाई. तभी से यह मंदिर लगातार श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है.

आज भी बड़हिया के लोग मां काली को अपनी ग्रामदेवी मानते हैं. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले मां के दरबार में पूजा-अर्चना करना यहां की परंपरा का हिस्सा है.

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मंगलवार और शनिवार को क्यों उमड़ती है भीड़

मंदिर में सामान्य दिनों में भी श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन मंगलवार और शनिवार को यहां विशेष पूजा होती है. इन दोनों दिनों हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.

कार्तिक माह में लक्ष्मी पूजा और काली पूजा के अवसर पर मंदिर की रौनक कई गुना बढ़ जाती है. अमावस्या की आधी रात से ही बड़हिया और आसपास के गांवों से महिला-पुरुष श्रद्धालु मंदिर पहुंचने लगते हैं. पूरी रात मां की आराधना और पूजा का क्रम चलता है.

Aaj Ka Darshan: श्रद्धालुओं की सुविधा का भी रखा गया है ध्यान

समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी तो मंदिर परिसर का भी विस्तार किया गया. ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर का भव्य निर्माण कराया गया है. दूर-दराज से आने वाले भक्तों की सुविधा के लिए धर्मशाला का भी निर्माण कराया गया है, जहां ठहरने और विश्राम की व्यवस्था उपलब्ध है.

यह व्यवस्था खासकर उन श्रद्धालुओं के लिए राहत देती है, जो त्योहारों और विशेष पूजा के दौरान लंबी दूरी तय करके यहां पहुंचते हैं.

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एनएच-80 किनारे होने से पहुंचना आसान

बड़हिया में एनएच-80 के किनारे नवोदय विद्यालय पथ पर स्थित यह मंदिर सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है. यही वजह है कि स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूसरे जिलों के श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में यहां आते हैं.

मंदिर परिसर का शांत वातावरण, मां काली की आकर्षक प्रतिमा और धार्मिक माहौल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है. कई भक्त बताते हैं कि मनोकामना पूरी होने के बाद वे दोबारा यहां आकर मां का आशीर्वाद लेते हैं.

बड़हिया का यह प्राचीन मां काली मंदिर आज भी इतिहास, आस्था और लोकविश्वास का ऐसा संगम है, जहां हर दिन सैकड़ों लोग उम्मीद और विश्वास के साथ पहुंचते हैं.

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प्रत्युष प्रशांत

लेखक के बारे में

By प्रत्युष प्रशांत

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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