बच्चों का गुल्ली-डंडा खेल व बबुआ रे बबुआ ललल डबुआ अखियां लाल पियर हो लाओ रे बबुआ, मइया तोहर कठोर रे बबुआ प्रथा विलोपित

लखीसराय : ज्यों-ज्यों हमलोग आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं और 21वीं सदी में प्रवेश कर रहे हैं, वैसे-वैसे हम अपनी सांस्कृतिक प्रथा को भूलाते जा रहे हैं. सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है. जिसको हमलोग बच्चों को कहानी सुनाते हैं. दो दशक पहले गणेश चतुर्थी पर्व पर सभी प्रारंभिक विद्यालयों में […]
लखीसराय : ज्यों-ज्यों हमलोग आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं और 21वीं सदी में प्रवेश कर रहे हैं, वैसे-वैसे हम अपनी सांस्कृतिक प्रथा को भूलाते जा रहे हैं. सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है. जिसको हमलोग बच्चों को कहानी सुनाते हैं. दो दशक पहले गणेश चतुर्थी पर्व पर सभी प्रारंभिक विद्यालयों में बच्चों द्वारा अपने अपने विद्यालय में एक सप्ताह पूर्व से ही सिंघासन का निर्माण कराकर उसको खूब सूरत सजवाट कर तैयार करते थे. चक चंदा दिन यानि गणेश चतुर्थी पर बच्चों अपने अपने विद्यालय गुल्ली डंडा लेकर पहुंचते थे.
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