बच्चों का गुल्ली-डंडा खेल व बबुआ रे बबुआ ललल डबुआ अखियां लाल पियर हो लाओ रे बबुआ, मइया तोहर कठोर रे बबुआ प्रथा विलोपित

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लखीसराय : ज्यों-ज्यों हमलोग आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं और 21वीं सदी में प्रवेश कर रहे हैं, वैसे-वैसे हम अपनी सांस्कृतिक प्रथा को भूलाते जा रहे हैं. सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है. जिसको हमलोग बच्चों को कहानी सुनाते हैं. दो दशक पहले गणेश चतुर्थी पर्व पर सभी प्रारंभिक विद्यालयों में […]

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लखीसराय : ज्यों-ज्यों हमलोग आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं और 21वीं सदी में प्रवेश कर रहे हैं, वैसे-वैसे हम अपनी सांस्कृतिक प्रथा को भूलाते जा रहे हैं. सिर्फ इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है. जिसको हमलोग बच्चों को कहानी सुनाते हैं. दो दशक पहले गणेश चतुर्थी पर्व पर सभी प्रारंभिक विद्यालयों में बच्चों द्वारा अपने अपने विद्यालय में एक सप्ताह पूर्व से ही सिंघासन का निर्माण कराकर उसको खूब सूरत सजवाट कर तैयार करते थे. चक चंदा दिन यानि गणेश चतुर्थी पर बच्चों अपने अपने विद्यालय गुल्ली डंडा लेकर पहुंचते थे.

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बच्चे आपस में गुल्ली-डंडा खेल कर सिंघासन पर गणेश जी को बैठाकर बच्चे माथा पर उठाकर बच्चे के घर गुल्ली-डंडा खेलते पहुंचते थे, जिस घर पर जाते थे उस बच्चे को सभी बच्चों आंख बंद करके गाते थे बबुआ रे बबुआ ललल डबुआ अखियां लाल पियर हो लाओ रे बबुआ, मैया तोहर कठोर रे बबुआ जब तक उधर से बच्चे की मां साड़ी अनाज रुपये गुरुजी देते नहीं थे तब तक आंख बंद रखे हुए रहता था.
जब मां गुरु जी को दान देते थे फिर बच्चों गुल्ली-डंडा खेलते हुए दुसरे घर के बच्चे के पास गाते घर में रखोगे चोर ले जाए ,छप्पर पर रखोगे तो कौआ ले जाय गुरूजी को दे दो दान हो जाय गाते पहुंच जाता था. यह सिलसिला 15 दिनों तक चलता था. जैसे मुंबई में गणेश चतुर्थी पूजा चलता है वैसे ही गुल्ली-डंडा खेल के माध्यम से चलता था. लेकिन यह प्रथा अब विलुप्त हो गया, सिर्फ कहानी बनकर रह गया है.
बोले सेवानिवृत्त शिक्षक
सेवानिवृत्त शिक्षक 70 वर्षीय वृद्ध चंद्रिका प्रसाद सिंह उर्फ नाको गुरुजी ने बताया कि वह जमाना वर्तमान जमाना याद आकर आंख आंसू से डबडबा आया और कहा कम साधन रहने के बावजूद बच्चे खुश रहते और पढ़ाई और खेल के प्रति उत्साह रहता था.
गणेश चतुर्थी पूजा दिन बच्चे सिंघासन पर गणेश जी को बैठाकर गुल्ली-डंडा खेलते-खेलते बच्चे सभी बच्चों के घर जाते थे. उनकी माता साड़ी, धोती, अनाज रुपये देते थे. यह 15 दिनों तक चलता था, काफी मनोरंजन होता था, लेकिन दुर्भाग्यवश अब वह बच्चों का गुल्ली-डंडा खेल और बाबू अरे बाबुआ ललल डबुआ आवाज इतिहास बनकर इतिहास के पन्नों में सिमट गयी, सिर्फ कहानी बनकर रह गयी, जिसका काफी आह आती है.
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