अस्पतालों में जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली का हो पूर्ण पालन

Published by : AWADHESH KUMAR Updated At : 18 May 2026 5:45 PM

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अस्पतालों, जांच केंद्रों और नर्सिंग होम से निकलने वाले जैव चिकित्सा अपशिष्टों का सुरक्षित एवं समयबद्ध निस्तारण जनस्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है

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-समय पर जैव कचरे का निस्तारण नहीं होने पर पर्यावरण और जनस्वास्थ्य दोनों पर बढ़ता है खतरा-निजी संस्थानों की निगरानी तेज करने एवं नियमित निरीक्षण के लिए तीन सदस्यीय दल गठित करने का निर्देश

किशनगंज

अस्पतालों, जांच केंद्रों और नर्सिंग होम से निकलने वाले जैव चिकित्सा अपशिष्टों का सुरक्षित एवं समयबद्ध निस्तारण जनस्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है. इसी उद्देश्य को लेकर समाहरणालय स्थित सभाकक्ष में जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली-2016 के प्रावधानों की समीक्षा हेतु जिलास्तरीय अनुश्रवण समिति की बैठक आयोजित की गई. बैठक की अध्यक्षता जिलाधिकारी विशाल राज ने की. बैठक में जिले के सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य संस्थानों में जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति, निबंधन, लाइसेंस, निरीक्षण तथा अपशिष्ट उठाव व्यवस्था की विस्तृत समीक्षा की गई.

जैव चिकित्सा अपशिष्ट नियमों के अनुपालन पर दिया गया जोर

बैठक के दौरान जिलाधिकारी ने सिविल सर्जन डॉ राज कुमार चौधरी को निर्देश दिया कि जिले के सभी सरकारी अस्पतालों, निजी नर्सिंग होम, पैथोलॉजी लैब एवं स्वास्थ्य संस्थानों में जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली-2016 का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए. उन्होंने कहा कि अस्पतालों से निकलने वाला संक्रमित कचरा यदि सही तरीके से पृथक्करण, संग्रहण और निस्तारण नहीं किया जाए तो यह संक्रमण फैलाने के साथ-साथ पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. जिलाधिकारी ने नियमित निगरानी के लिए तीन सदस्यीय दल गठित कर लगातार निरीक्षण अभियान चलाने का निर्देश दिया.

जैव कचरे की श्रेणियों के अनुसार अलग-अलग उपचार व्यवस्था

बैठक में सिविल सर्जन डॉ राज कुमार चौधरी ने जैव चिकित्सा अपशिष्ट की विभिन्न श्रेणियों और उनके वैज्ञानिक निपटान की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि येलो श्रेणी के अपशिष्टों का निस्तारण भस्मीकरण, प्लाज्मा पायरोलिसिस अथवा गहरे गड्ढे में दफनाकर किया जाता है. वहीं रेड श्रेणी के अपशिष्टों का उपचार ऑटोक्लेविंग, माइक्रोवेविंग एवं रासायनिक कीटाणुशोधन द्वारा किया जाता है.उन्होंने बताया कि व्हाइट श्रेणी के नुकीले अपशिष्ट जैसे सुई एवं ब्लेड आदि का कीटाणुशोधन और कतरन के बाद सुरक्षित दफन या रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया अपनाई जाती है. वहीं ब्लू श्रेणी के कांच संबंधी अपशिष्टों को धुलाई एवं कीटाणुशोधन के बाद पुनर्चक्रण की प्रक्रिया में भेजा जाता है.

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लाइसेंस लेना होगा अनिवार्य

जिलाधिकारी विशाल राज ने कहा कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुरूप सभी स्वास्थ्य संस्थानों को जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन की समुचित व्यवस्था करनी होगी. उन्होंने कहा कि अस्पतालों में उत्पन्न चिकित्सकीय कचरा आम लोगों, पशु-पक्षियों तथा पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. इसलिए प्रत्येक संस्थान को अपशिष्ट पृथक्करण, सुरक्षित भंडारण, परिवहन और अंतिम निस्तारण की वैज्ञानिक व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी.सिविल सर्जन ने बताया कि अब सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता जांच जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन के मानकों पर भी की जाएगी. सभी संस्थानों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य होगा तथा प्रत्येक अस्पताल में एक नोडल अधिकारी नामित किया जाएगा. नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी होगी कि वे लाइसेंस प्राप्त करने, समिति गठन और अपशिष्ट प्रबंधन की नियमित निगरानी सुनिश्चित करें. उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेशानुसार नियमों के उल्लंघन पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के रूप में प्रतिमाह एक करोड़ रुपये तक की वसूली की जा सकती है.

जिला गुणवत्ता एवं यकीन समिति की बैठक में भी लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय

बैठक के दौरान जिला गुणवत्ता एवं यकीन समिति की समीक्षा भी की गई. इसमें परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत महिला नसबंदी सेवा के लिए 04 निजी चिकित्सकों को इंपैनल करने का निर्णय लिया गया. साथ ही चार निजी संस्थानों के निरीक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिया गया.बैठक में सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी, डीपीएम स्वास्थ्य डॉ. मुनाजिम डीपीसी विश्वजीत कुमार ,डीक्यूएसी सुमन सिन्हा सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे.

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