खपत 1000 एमटी की, खरीद सिर्फ 400 एमटी दिखाने पर सवाल

जिले के विभिन्न प्रखंडों में संचालित ईंट भट्टों की उत्पादन क्षमता और कागजों पर दिखाई जा रही कोयला खरीद के आंकड़ों का मिलान करने पर भारी अंतर सामने आने की बात कही जा रही है.
-किशनगंज में गायब कोयले और अवैध सप्लाई नेटवर्क की चर्चा तेज
ठाकुरगंजजिले में ईंट भट्टों और कोयला कारोबार को लेकर उठे सवाल अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं. पिछले कुछ दिनों में सीमावर्ती इलाकों में कोयला लदे ट्रकों की जप्ती, संदिग्ध ई-वे बिल, रद्द जीएसटीआईएन के इस्तेमाल और परिवहन दस्तावेजों में सामने आई विसंगतियों ने कोयला कारोबार के बड़े नेटवर्क की आशंका को और मजबूत कर दिया है. जिले के विभिन्न प्रखंडों में संचालित ईंट भट्टों की उत्पादन क्षमता और कागजों पर दिखाई जा रही कोयला खरीद के आंकड़ों का मिलान करने पर भारी अंतर सामने आने की बात कही जा रही है. जानकारों का दावा है कि यह अंतर केवल रिकॉर्ड की त्रुटि नहीं, बल्कि अंडर-इनवॉइसिंग, कम खरीद दिखाने और बिना वैध दस्तावेज कोयला खपाने के संगठित खेल की ओर इशारा करता है.
सरकारी मानक बनाम जमीनी हकीकत
सरकारी मानकों के अनुसार 1 लाख ईट उत्पादन पर औसतन 18 एमटी कोयले की खपत मानी जाती है. लेकिन किशनगंज जिले की भौगोलिक और मौसम संबंधी परिस्थितियां इस मानक को चुनौती देती हैं. जिले में अधिक नमी, गीली मिट्टी और मिट्टी में कार्बनिक तत्वों की मात्रा ज्यादा होने के कारण ईंट पकाने में अधिक तापमान और समय लगता है. स्थानीय भट्टा संचालकों और तकनीकी जानकारों के अनुसार वास्तविक खपत 22 से 25 एमटी प्रति 1 लाख ईंट तक पहुंच जाती है. इसी आधार पर यदि एक औसत भट्टे में पूरे सीजन के दौरान 40 से 50 लाख ईट का उत्पादन माना जाए, तो एक भट्टे में लगभग 1000 से 1100 एमटी कोयले की जरूरत पड़ती है. लेकिन कई मामलों में पूरे सीजन की खरीद रिकॉर्ड पर केवल 350 से 400 एमटी तक दिखाई जा रही है. यही अंतर अब पूरे जिले में जांच और चर्चा का विषय बना हुआ है.
गायब कोयले पर बढ़े सवाल
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि वास्तविक खपत और रिकॉर्डेड खरीद के बीच इतना बड़ा अंतर है, तो बाकी कोयले का स्रोत भी जांच का विषय बनना चाहिए. संभावित तौर पर जिन बिंदुओं पर सवाल उठ रहे हैं, उनमें अवैध खनन से निकला कोयला बिना चालान या संदिग्ध दस्तावेजों के परिवहन, ओवरलोड ट्रकों के जरिए सप्लाई, फर्जी या डमी फर्मों से बिलिंग, रद्द जीएसटीआईएनपर ई-वे बिल जनरेट होना, सीमावर्ती रूट से अनियमित आपूर्ति जैसे मामले शामिल हैं.
हालिया कार्रवाई से बढ़ी हलचल
हाल के दिनों में जिले और सीमावर्ती इलाकों में कई कोयला लदे ट्रकों की जप्ती ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है. कई मामलों में माइनिंग दस्तावेज, ई-वे बिल और जीएसटी रिकॉर्ड में मेल नहीं मिलने की बात सामने आई . इसके बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या जिले में वास्तविक खपत से कम खरीद दिखाकर बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी और अवैध कोयला खपाने का नेटवर्क चल रहा है.
करोड़ों के राजस्व नुकसान की आशंका
यदि जांच में खपत और खरीद के बीच का अंतर सही पाया जाता है, तो यह मामला केवल जीएसटी चोरी तक सीमित नहीं रहेगा. इससे राज्य सरकार को राजस्व नुकसान, अवैध खनन, परिवहन नियम उल्लंघन और माइनिंग एक्ट के संभावित उल्लंघन जैसे गंभीर पहलू भी जुड़ सकते हैं. स्थानीय लोगों और कारोबार से जुड़े जानकारों का मानना है कि जिले के सभी ईंट भट्टों के उत्पादन आंकड़े, जीएसटी रिटर्न, ई-वे बिल, कोयला खरीद रिकॉर्ड और परिवहन दस्तावेजों की संयुक्त जांच कराई जाए तो बड़े पैमाने पर चल रहे अवैध कारोबार का खुलासा हो सकता है.
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