152वें मर्यादा महोत्सव का समागम स्थल बना
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :15 Feb 2016 5:47 AM (IST)
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तेरापंथ शासन में आज्ञा महत्वपूर्ण: आचार्य आचार्यश्री ने 213 वर्ष पुराने पत्र का किया वाचन साधु-साध्वियां, समण-समणियों सहित श्रावक-श्राविकाओं को बताये मर्यादा के नियम श्रद्धालुओं से पटा पंडाल, बाहर तक खड़े थे लोग किशनगंज : मर्यादा महोत्सव के सबसे महत्वपूर्ण दिवस माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि इसका आधार माना जाता है. इस […]
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तेरापंथ शासन में आज्ञा महत्वपूर्ण: आचार्य
आचार्यश्री ने 213 वर्ष पुराने पत्र का किया वाचन
साधु-साध्वियां, समण-समणियों सहित श्रावक-श्राविकाओं को बताये मर्यादा के नियम
श्रद्धालुओं से पटा पंडाल, बाहर तक खड़े थे लोग
किशनगंज : मर्यादा महोत्सव के सबसे महत्वपूर्ण दिवस माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि इसका आधार माना जाता है. इस धर्मसंघ के अधिष्ठाता आचार्य भिक्षु द्वारा 213 वर्ष पूर्व लिखे गये पत्र का रविवार को मर्यादा महोत्सव के मंच पर करीब 12 बजे पधारे जैन श्वेतांबर तेरापंथ के 11वें अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने वाचन किया.
उनके आगमन के साथ ही ‘जय-जय शासन, जय मर्यादा’ ‘संघ पुरुष दीर्घायु हो’ के गगन भेदी जयघोष से पूरा वातारण गूंजायमान हो उठा. पिछले दो दिनों की तरह रविवार को भी नमस्कार महामंत्र से आरम्भ हुआ कार्यक्रम कई नयी घोषणा, अलंकरण, चतुर्मास, वर्धमान महोत्सव सहित विभिन्न नवीन मर्यादाओं को अपने आप में समाहित करता चला गया.
213 वर्ष पुराने पत्र का किया वाचन : मर्यादा महोत्सव का शुभारंभ करने के बाद आचार्यश्री ने कहा कि परम आराध्य भगवान महावीर से जुड़ा जैन धर्म व उसका एक संप्रदाय तेरापंथ धर्मसंघ है. यह मर्यादा महोत्सव है. इससे पहले 151 मर्यादा महोत्सव मनाया जा चुका है. आज 152वां मर्यादा महोत्सव मनाया जा रहा है. इसके प्रणेता थे आचार्यश्री जयाचार्यजी. माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाये जाने के आधार का वर्णन करते हुए कहा कि इसका आधार धर्मसंघ के प्रथम आचार्य भिक्षु स्वामी के हाथ लिखा हुआ लगभग 213 साल पुराना पत्र है.
मूलत: राजस्थानी भाषा के इस पत्र को आचार्यश्री ने पढ़ कर सुनाया और कहा कि इसका भले ही अनुवाद किसी भी भाषा में हो, लेकिन इसका मूल भाषा में उच्चारण महत्वपूर्ण है. अब तक हमारे धर्मसंघ में 10 आचार्य हो चुके हैं, जिन्होंने अपने सामर्थ्य के आधार पर संघ को इस स्तर तक पहुंचाया है.
मौके पर स्वरचित गीत को जब आचार्य श्री ने गया तो सभी ने इसमें अपना स्वर मिलाया. तेरापंथ के इस धर्मसंघ में आज्ञा को महत्वपूर्ण तत्व बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि यदि आचार्य की आज्ञा हो जाये, तो बिना किसी तर्क के उसका अनुपालन होना इस संघ का महत्व है. आचार्यश्री ने सभी को मर्यादा का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि आचार्य के प्रति पूरी निष्ठा और समर्पण का भाव रखें तो संघ की मर्यादा कायम रह सकती है.
पांच निष्ठा का किया वर्णन : आत्म निष्ठा, संघ निष्ठा, आज्ञा निष्ठा, आचार निष्ठा व मर्यादा निष्ठा इन पांच निष्ठाओं का वर्णन करते हुए आचार्यश्री ने सभी साधु-साध्वियां, समण-समणीवृंद को पूर्ण निष्ठावान होकर प्रगति के पथ पर अग्रसर होने की बात कही.
2018 का मर्यादा महोत्सव का आयोजन कटक में :2018 का मर्यादा महोत्सव कटक में करने की घोषणा आचार्यश्री ने की, तो पूरा पंडाल ओम अर्हम के जयघोष से गूंज उठा. 2017 में अक्षय तृतीया का कार्यक्रम भागलपुर व 2017 का चतुर्मास राजरहाट कोलकता में करने की घोषणा भी आचार्यश्री ने की.
दो साध्वियों को मिली शासन श्री की उपाधि : आचार्यश्री ने साध्वी जिनप्रभाजी व साध्वी विद्यावती जी को शासन श्री की उपाधि से अलंकृत किया.
पंक्तिबद्ध होकर लिया संकल्प, खिल उठे चेहरे :देश-विदेश में फैले सभी साधु-साध्वियां, समण-समणियों के लगभग 200 सिंघाड़े को उनके अगले चतुर्मास व विहार के निर्देश आचार्यश्री ने दिये. अपनी हाजरी देने के लिए जब साधु-साध्वियां, समण-समणियां पंडाल में पंक्तिबद्ध हुए, तो पूरे पंडाल का स्वरूप ही बदल गया. हाजरी लेते हुए आचार्यश्री ने सभी को संघ के प्रति संपूर्ण निष्ठा, आस्था व उसके प्रति विश्वास रखने का संकल्प दिलाया. सभी ने एक स्वर से सभी संकल्पों को स्वीकार किया. इस समारोह में कुल 176 साधु-साध्वियां व समण-समणियां उपस्थित रहे.
कई नये नियम आचार्यश्री ने किये निर्धारित : आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों, समण-समणियों सहित सभी श्रावक-श्राविकाओं के लिए कई नये नियम बताये.
गीतों की प्रस्तुति पर झूम उठा पंडाल : महोत्सव का शुभारंभ करते हुए समणीवृंद ने ‘गण की महिमा गाएं गण के नाथ की, पावन परम्परा के सुप्रभात की प्रस्तुति की तो पूरा पंडाल झूम उठा. साध्वीवृंद व साधु समाज ने भी ‘भिक्षु का यह शासन, सत्यम, शिवम सुंदरम’ की प्रस्तुति देकर सभी श्रद्धलुओं को पुलकित कर दिया. दक्षिण की यात्रा चेन्नई के लिए धर्मचंद जी लुंकड़ तो बैंगलूरू के लिए मूलचंद जी नाहर को अध्यक्ष मनोनीत किया गया.
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