रेलवे कैंटीन की हालत बदहाल, बंद होने के कगार पर पहुंचा

रेलवे कैंटीन की हालत बदहाल, बंद होने के कगार पर पहुंचा
10 रुपये में अंडा करी, 15 रुपये में मछली, छह रुपये में समोसा और पांच रुपये में चाय मिलती थी कैंटीन में बाजार से कीमत कम रहने पर इन कैंटीन में रहती थी रेल कर्मियों एवं अन्य लोगों की खासी भीड़, कर्मी के कारण कैंटीन बंदी के कगार पर कटिहार डीआरएम बिल्डिंग परिसर में स्थित रेलवे कैंटीन की हालत इन दिनों काफी बदहाल हो गई है, कभी रेलवे कर्मचारियों और आम लोगों के लिए सस्ते और बेहतर भोजन की व्यवस्था करने वाली यह कैंटीन अब लगभग बंद जैसी स्थिति में पहुंच गई है. पिछले करीब छह महीनों से कैंटीन में भोजन बनना बंद हो गया है और यहां आने वाले कर्मचारियों को सिर्फ चाय, बिस्कुट और नूडल्स के सहारे ही काम चलाना पड़ रहा है,. बताया जाता है कि एक समय ऐसा था जब इस कैंटीन में रेलवे के कर्मचारियों के साथ-साथ बाहर से आने वाले लोग भी भोजन करने के लिए पहुंचते थे. कैंटीन में सादा भोजन से लेकर शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के व्यंजन उपलब्ध होते थे. कर्मचारियों को बेहद कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण भोजन मिल जाता था, जिससे यह कैंटीन काफी लोकप्रिय थी. कैंटीन से जुड़े लोगों के अनुसार पहले यहां करीब 15 कर्मचारियों की नियुक्ति थी, इन कर्मचारियों की मदद से कैंटीन में नियमित रूप से खाना बनाया जाता था, और समय पर कर्मचारियों को भोजन उपलब्ध कराया जाता था. लेकिन धीरे-धीरे कर्मचारी सेवानिवृत्त होते गए और उनकी जगह नए कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं हो परिणामस्वरूप कर्मचारियों की संख्या लगातार घटती चली गई. वर्तमान समय में स्थिति यह है कि केवल तीन कर्मचारियों के भरोसे पूरी कैंटीन चल रही है, कर्मचारियों की भारी कमी के कारण पिछले छह महीनों से यहां भोजन बनना पूरी तरह बंद हो गया है. कैंटीन में सिर्फ चाय, बिस्कुट और नूडल्स ही उपलब्ध कराया जा रहा है, इससे रेलवे कर्मचारियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. रेलवे कर्मचारियों ने जताई नाराजगी पिछले 6 महीने से कैंटीन में भोजन नहीं मिलने पर रेलवे कर्मचारियों ने इसको लेकर जमकर नाराजगी जताई. रेलवे कर्मचारियों ने इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा कि रेलवे कैंटीन की यह हालत हम सभी के लिए काफी दुखद है. पहले जहां कम कीमत में पौष्टिक और अच्छा भोजन मिल जाता था, वहीं अब कर्मचारियों को बाहर जाकर महंगे दामों पर खाना खाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. ऐसे न केवल हमारे समय की बर्बादी होती है बल्कि बाहर भोजन करने में अधिक राशि भी खर्च करना पड़ता है. कैंटीन संचालन को लेकर रेलवे किया टेंडर इधर रेलवे प्रशासन ने कैंटीन की स्थिति को देखते हुए इसके संचालन के लिए टेंडर प्रक्रिया अपनाई है. जानकारी के अनुसार कैंटीन संचालक के चयन के लिए टेंडर निकाला गया है और जल्द ही इसकी प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी. टेंडर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जिस एजेंसी का चयन होगा, वह आगे कैंटीन का संचालन संभालेगी. हालांकि कैंटीन के निजी हाथों में जाने को लेकर रेलवे कर्मचारियों के बीच कई तरह की आशंकाएं भी सामने आ रही हैं. कर्मचारियों का साफ कहना है कि अभी तक कैंटीन का संचालन नो प्रॉफिट नो लॉस के आधार पर होता था, जिससे कर्मचारियों को बहुत कम कीमत में भोजन मिल जाता था. कैंटीन में मात्र 30 रुपये में सादा भोजन मिल जाता था, वहीं 10 रुपये में अंडा करी, 15 रुपये में मछली, छह रुपये में समोसा और पांच रुपये में चाय आदि उपलब्ध होती थी, इसी वजह से अधिकांश कर्मचारी कैंटीन में ही भोजन करना पसंद करते थे. रेलवे कर्मचारियों का कहना है कि यदि कैंटीन निजी हाथों में जाती है तो खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. उनका मानना है कि जहां पहले 30 रुपये में खाना मिल जाता था, वहीं निजी संचालन में इसकी कीमत 40 से 45 रुपये तक सही है. यदि इससे ज्यादा राशि निर्धारित की गई तो रेलवे कैंटीन का कोई औचित्य ही नहीं रह जाएगा. रेलवे कर्मचारियों ने रेलवे प्रशासन से मांग की है कि चाहे कैंटीन का संचालन किसी भी एजेंसी के माध्यम से हो, लेकिन कर्मचारियों को सस्ती दरों पर भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था जरूर सुनिश्चित की जानी चाहिए. उनका कहना है कि कैंटीन का मूल उद्देश्य कर्मचारियों को सुलभ और सस्ता भोजन उपलब्ध कराना है, इसलिए इसकी व्यवस्था को उसी भावना के साथ बनाए रखना जरूरी है.
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